भविष्य पुराण

शय्यादान एवं मृतशय्यादान-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - पाण्डुकुलोद्भव! अब मैं शय्यादानकी विधि बता रहा हूँ, जिससे व्यक्ति इस लोकमें और परलोकमें सुखभागी होता है, यह जीवन अनित्य है, इसलिये शय्यादान करना चाहिये। मृत्युके अनन्तर यह दान कैसे हो पायेगा, इसलिये अपने जीवन में ही कर लेना चाहिये। भारत ! जबतक जीवन रहता है, सभोतक मनुष्य भाई, पिता, बन्धु आदिका स्नेह प्राप्त करता है, पुनः उसीको मर गया समझकर सबका स्नेह छूट जाता है। इसलिये शय्या, भोजन तथा जल आदिका स्वयं दान कर लेना चाहिये, क्योंकि यह मनमें निश्चित ध्यान रखना चाहिये कि आत्मा ही मेरा बन्धु है अर्थात् स्वयं ही स्वयंका बन्धु है। जिसने दान तथा भोगादिके द्वारा अपनी आत्माको संतुष्ट नहीं कर लिया, उसके लिये स्वयंसे बड़ा और कौन अहितकर होगा? मर जानेपर कौन उसकी पूजा करेगा? इसलिये मानवको चाहिये कि श्रेष्ठ काष्ठकी एक दब शय्याका निर्माण करे, उसे हाथी-चौत और हेमपत्रसे अलंकृतकर सुशोभित करे। गछा, चादर तथा तकियेसे संयुक्त कर गन्ध तथा धूपसे अधिवासित करे। ऐसी उस उत्तम शप्पापर लक्ष्मीसमन्वित भगवान् श्रीहरिकी सुवर्णकी प्रतिमाकी स्थापना करे और शय्याके सिरहाने कलश स्थापित करे। विद्वान् व्यक्तिको यह समझना चाहिये कि शय्यापर भगवान् निद्रामें स्थित है। शय्याके समीप ही कुंकुमचूर्ण, कर्पूर, अगरु, चन्दन, ताम्बूल, दीपक, जूता, छाता, चामर, आसन, भोजन तथा सप्तधान्यको यथाशक्ति स्थापित करे। अन्य भी उपकारक वस्तुओंको वहाँ स्थापित करे। वितानसे शय्याको सुशोभित कर ले। इस प्रकार उपस्कारोंसे मण्डित शय्याकी सपत्रीक ब्राह्मणकी विधिपूर्वक पूजाकर प्रदान कर दे और इस मन्त्रको पढ़े-

नमस्ते सर्वदेवेश शय्यादानं कृतं मया।

देहि तस्माच्छान्तिफलं नमस्ते पुरुषोत्तम ॥

यथा न कृष्ण शयनं शून्यं सागरजातया।

शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथा जन्मनि जन्मनि॥

(उत्तरपर्व १८४|१३-१४)

'सर्वदेवेश! मैंने शय्यादान किया है, आपको नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आप मुझे शान्ति प्रदान करें, आपको नमस्कार है। भगवन्। जैसे आपकी शय्या लक्ष्मीसे शून्य नहीं रहती, वैसे ही जन्म- जन्मान्तरमें मेरी शय्या भी शून्य न रहे। इस प्रकार उस सुन्दर पवित्र शय्याका दान कर विसर्जन करे। व्यक्तिके मर मानेपर एकादशाहमें भी शय्यादानमें प्रायः यही विधि कही गयी है। बान्धवके मरनेपर धर्मके लिये यदि शय्यादान करता है तो उसे विशेष शान्ति मिलती है। राजेन्द्र! इसमें कुछ विशेष बातें भी मैं आपसे कह रहा हूँ, आप सुनें। मृत व्यक्तिने अपने जीवनकालमें जिन वस्तुओंका उपयोग किया था, जैसे कपड़े पहने थे, जैसा उसका वाहन था, जो वस्तु खाता था, जो वस्तु उसे प्रिय लगती थी, उन सबका भी शय्याके साथ दान करना चाहिये। इसे 'मृतशय्यादान' कहा जाता है। मृत व्यक्तिकी सुवर्णकी प्रतिमा भी वहाँ स्थापित करनी चाहिये। अनन्तर पूजा करके वह मृतशय्या प्रदान करनी चाहिये। इस प्रकार इस शय्यादानके प्रभावसे वह मृत जीव स्वर्गलोक, इन्द्रलोक तथा सूर्यलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है। भयंकर मुखवाले यमराजके दूत उसे कष्ट नहीं दे पाले। धूप और शीतसे उसे कभी भी कष्ट नहीं होता। वह स्वर्गलोकमें पूजित होता है तथा प्रलयपर्यन्त वहाँ सुखपूर्वक निवास करता है। (अध्याय १८४)