भविष्य पुराण

कृष्णाजिन (मृगछाला)-दान-विधि

महाराज युधिष्ठिरने कहा-भगवन् ! अब आप मुझे कृष्णाजिनके दानकी विधि, समय और दान-प्रहणके योग्य ब्राह्मणके लक्षणको बतलायें, इसमें मुझे संदेह हो रहा है।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! युगादि तिथियों, सूर्य-चन्द्रग्रहण, संक्रान्ति, तिथिक्षय, माघी पूर्णिमा, ग्रहपीड़ा तथा दुःस्वप्न देखनेपर कृष्णाजिनका दान करना चाहिये, यह महादान कहलाता है। राजन्! जो अग्निहोत्री, वेदवेदाङ्गपारङ्गत तथा पुराणका ज्ञाता हो, ऐसे योग्य ब्राह्मणको यह दान देना चाहिये। जिस विधानसे यह दान देना चाहिये, उसे आप सुनें।

नर श्रेष्ठ! पवित्र स्थानको गोबरसे लीपकर उसपर ऊनी वस्त्र बिछा कर काले तिलोंसे उसपर मृगकी आकृति बनाये। सौंगके स्थानपर सोना तथा चाँदीका दाँत बनाये। मोतीकी मालासे पूंछ बनाये। तिलसे सिरका निर्माण कर उसे वस्त्रसे आच्छादित करे और सुवर्णसे अलंकृत कर पुष्प, गन्ध, फल, रत्न तथा नैवेद्यसे उसकी पूजा करनी चाहिये। चार दिशाओं में चार काँसेके पात्र यथाक्रमसे रखने चाहिये। वे घी, दूध, दही और मधुसे समन्वित हों। अनन्तर पुण्यकाल आ जानेपर इन मन्त्रों को पड़े-

कृष्णः कृष्णमालो वेष कृष्णाजिनामाया।

महामापासापापस्थ प्रीयतां मे नमो नमः।

प्रयस्विशत्सुराणां च आधारे त्वं व्यवस्थितः ॥

कृष्णोऽसि मूर्तिमान् साक्षात् कृष्णाणिन नमोऽस्तुते।

(उत्तापर्ष १८८।१०-१२)

'श्रेष्ठ कृष्णाजिन देव। आप पापोंके नाश करनेवाले विष्णुरूप हैं, आपके दान करनेसे मेरे समस्त पाप नष्ट हो जायें। आपको बारम्बार नमस्कार है। आप तैंतीस देवताओंके आधाररूपमें अवस्थित रहते हैं, आप मूर्तिमान् कृष्ण-विष्णु हैं, आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार प्रदक्षिणा कर बार-बार नमस्कार कर वेद-वेदाङ्गपारङ्गत ब्राह्मणको अपनी शक्तिके अनुसार अलंकृतकर कृष्णाजिनका दान करे। ब्रह्माजीने बताया है कि कृष्णाजिनकी पूँछ पकड़कर दान करना चाहिये। इस प्रकार इस विधिसे कृष्णाजिनदान करनेसे मानव भूमिदानके समग्र फलको प्रास कर लेता है और तीनों अवस्थाओंमें जो पाप अर्जित करता है, वह क्षणभरमें ही नष्ट हो जाता है। (अध्याय १८८)