ब्राह्माजी बोले-मुनीश्वरो! जो कन्या माताकी सपिण्ड अर्थात् माताकी सात पीढ़ीके अन्तर्गतकी न हो तथा पिताके समान गोत्रकी न हो, वह द्विजातियों के विवाह-सम्बन्ध तथा संतानोत्पादनके लिये प्रशस्त मानी गयी है। जिस कन्याके भाई न हो और जिसके पिताके सम्बन्धमें कोई जानकारी न हो, ऐसी कन्यासे पुत्रिका-धर्मकी आशंकासे बुद्धिमान् पुरुषको विवाह नहीं करना चाहिये। धर्मसाधनके लिये चारों वर्गों को अपने-अपने वर्णकी कन्यासे विवाह करना श्रेष्ठ कहा गया है।
चारों वर्णांके इस लोक और परलोकमें हिताहितके साधन करनेवाले आठ प्रकारके विवाह कहे गये हैं, जो इस प्रकार हैं-
ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस तथा पैशाचं । अच्छे शील-स्वभाववाले उत्तम कुलके वरको स्वयं बुलाकर उसे अलंकृत और पूजित कर कन्या देना 'ब्राहा-विवाह' है। यज्ञ में सम्यक् प्रकारसे कर्म करते हुए ऋत्विको अलंकृत कर कन्या देनेको 'दैव-विवाह' कहते हैं। बरसे एक या दो जोड़े गाय बैल धर्मार्थ लेकर विधिपूर्वक कन्या देनेको अर्ग-विवाह' कहते हैं। 'तुम दोनों एक साथ गृहस्थ धर्मका पालन करो यह कहकर पूजन करके जो कन्यादान किया जाता है, वह 'प्राजापत्य-विवाह' कहलाता है। कन्याके पिता आदिको और कन्याको भी यथाशक्ति धन आदि देकर स्वच्छन्दतापूर्वक कन्याका गृहण करना आसुर-विवाह' है। कन्या और वरको परस्पर इच्छासे जो विवाह होता है, उसे 'गान्धर्व-विवाह' कहते हैं। मार-पीट करके रोती चिल्लाती कन्याका अपहरण करके लाना 'राक्षस-विवाह' है। सोयी हुई, मदसे मतवाली या जो कन्या पागल हो गयी हो उसे गुप्तरूपसे उठा ले आना यह 'पैशाच' नामक अधम कोटिका विवाह है।
ब्राह्म-विवाहसे उत्पन्न धर्माचारी पुत्र दस पीढ़ी आगे और दस पीढ़ी पीछेके कुलोंका तथा इक्कीसवाँ अपना भी उद्धार करता है। दैव-विवाहसे उत्पन्न पुत्र सात पीढ़ी आगे तथा सात पीढ़ी पीछे इस प्रकार चौदह पीढियोंका उद्धार करनेवाला होता है। आर्ष-विवाहसे उत्पन्न पुत्र तीन अगले तथा तीन पिछले कुलोंका उद्धार करता है तथा प्राजापत्य- विवाहसे उत्पन्न पुत्र छ: पीछेके तथा छ: आगेके कुलोंको तारता है। ब्राह्मादि आद्य चार विवाहोंसे उत्पन्न पुत्र ब्रह्मतेजसे सम्पन्न, शीलवान, रूप, सत्त्वादि गुणोंसे युक्त, धनवान, पुत्रवान्, यशस्वी, धर्मिष्ठ और दीर्घजीबी होते हैं। शेष चार विवाहोंसे उत्पन्न पुत्र क्रूर स्वभाव, धर्मद्वषी और मिथ्यावादी होते हैं। अनिन्दित विवाहोंसे संतान भी अनिन्द्य ही होती है और निन्दित विवाहोंकी संतान भी निन्दित होती है। इसलिये आसुर आदि निन्दित विवाह नहीं करना चाहिये। कन्याका पिता वरसे यत्किचित् भी धन न ले। वरका धन लेनेसे वह अपत्यविक्रयी अर्थात् संतानका बेचनेवाला हो जाता है। जो पति या पिता आदि सम्बन्धी वर्ग मोहवश कन्याके धन आदिसे अपना जीवन चलाते हैं, वे अधोगतिको प्रास होते हैं। आर्ष-विवाहमें जो गो मिथुन लेनेकी बात कही गयी है, वह भी टीक नहीं है, क्योंकि चाहे थोड़ा ले या अधिक, वह कन्याका मूल्य ही गिना जाता है, इसलिये
असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः।
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैधुने।।
पिता जिसके पुत्रसे अपने पिण्ड-पानीकी आशा करता है उसे पुत्रिका कहते हैं।
वरसे कुछ भी लेना नहीं चाहिये। जिन कन्याओंके निमित्त वर-पक्षसे दिया हुआ वस्त्राभूषणादि पिता- भ्राता आदि नहीं लेते, प्रत्युत कन्याको ही देते हैं, वह विक्रय नहीं है। यह कुमारियोंका पूजन है, इसमें कोई हिंसादि दोष नहीं है। इस प्रकार उत्तम विवाह करके उत्तम देशमें निवास करना चाहिये, इससे बहुत यशकी प्राप्ति होती है।
ऋषियोंने पूछा-ब्रह्मन्! वह कौन-सा देश है, जहाँ निवास करनेसे धर्म और यशकी वृद्धि होती है?
ब्रह्माजी बोले- मुनीश्वरो! जिस देशमें धर्म अपने चारों चरणों के साथ रहे, जहाँ विद्वान् लोग निवास करते हों और सारे व्यवहार शास्त्रोक्त- रीतिसे सम्पन्न होते हों, वही देश उत्तम और निवास करने योग्य है।
ऋषियोंने पूछा- महाराज! बिद्वान जिस शास्त्रोक्त आचरणको ग्रहण करते हैं और धर्मशास्त्रमें जैसी विधि निर्दिष्ट की गयी है उसे हमें बतलायें, हमें इस विषयमें महान् कौतूहल हो रहा है।
ब्रह्माजी बोले-राग-द्वेषसे रहित सजन एवं विद्वान् जिस धर्मका नित्य अपने शुद्ध अन्त:करणसे आचरण करते हैं, उसे आप सुनें-
इस संसारमें किसी वस्तुकी कामना करना श्रेष्ठ नहीं है। वेदोंका अध्ययन करना और वेदविहित कर्म करना भी काम्य है। संकल्पसे कामना उत्पन्न होती है। वेद पढ़ना, यज्ञ करना, व्रत-नियम, धर्म आदि कर्म सब संकल्पमूलक ही हैं। इसीलिये सभी यज्ञ, दान आदि कर्म संकल्पपठनपूर्वक किये जाते हैं। ऐसी कोई भी क्रिया नहीं है, जिसमें काम न हो। जो कोई भी जो कुछ करता है वह इच्छासे ही करता है।
श्रुति, स्मृति, सदाचार और अपने आत्माकी प्रसन्नता-इन चार बातोंसे धर्मका निर्णय होता है। श्रुति तथा स्मृतिमें कहे गये धर्मके आचरणसे इस लोकमें बहुत यश प्राप्त होता है और परलोकमें इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है। श्रुति वेदको कहते हैं और स्मृति धर्मशास्त्रका नाम है। इन दोनोंसे सभी बातोंका विचार करें, क्योंकि धर्मको जड़ ये ही हैं, जो धर्मके मूल इन दोनों का तर्क आदिके द्वारा अपमान करता है, उसे सत्पुरुषोंको तिरस्कृत कर देना चाहिये, क्योंकि वह वेदनिन्दक होनेसे नास्तिक ही है।
जिनके लिये मन्त्रीद्वारा गर्भाधानले शमशानतक संस्कारकी विधि कही गयी है, उन्हीं लोगों को वेद तथा जयमें अधिकार है। सरस्वती तथा दृषद्वती-इन दो देवनदियों के बीचका जो देश है वह देवताओंद्वारा बनाया गया है, उसे ब्रह्मावर्त कहते हैं। उस देशमें चारों वर्ण और उपवों में जो आचार परम्परासे चला आया है, उसका नाम सदाचार है। कुरुक्षेत्र, मलयदेश, पाशाल और शूरसेन देश (मथुरा)-ये ब्रहाधियोंके द्वारा सेवित हैं, परन्तु ब्रह्मावर्तसे कुछ न्यून हैं। इन देशोंमें
१- कामकी गणना चार पुरुषार्थोमें है। भोगको कामनाके विरुद्ध योग, रज्ञ, जप-तप, धर्मसंस्थापन और गति मुक्तिको कामना ही शुभ कामना है। गीता (७।११) में भी भगवान् 'धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।' कहकर मनको इन्हों सत्कर्मोकी और प्रेरित करनेकी आज्ञा देते हैं। यह एक प्रकार से निष्कामताको जननी है । पेदिक कर्मयोगको भी भविष्यपुराणमें सकाम कहनेका यही भाव है।
निगमो धर्ममूल स्थात् स्मृतिशीले नथैव च ।
तथाचारच साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च।।
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिन् सदा नरः ।
प्राप्य चेह परां कीर्ति याति शक्रसलोकताम् ।
श्रुतिक्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ।
ते सर्वार्थषु मीमारतो ताभ्यां धर्मो हि निर्वभौ ।
योलमन्येत हे दोभ हेतुशास्त्राप्रपाद् द्विजः ।
स साधुभिहिष्कार्यों नास्तिको वेदानन्दक
वेद- स्मृति: सदाचार: स्वस्य च प्रियमात्मनः ।
एतच्चतुर्विध विषाः साक्षागरय लक्षणम् ॥
(ब्रह्मपर्व ७१५२, ५३-६३)
उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंसे सब देशके मनुष्य अपना-अपना आचार सीखते हैं। हिमालय और विध्यपर्वतके बीच, विनशनसे पूर्व और प्रयागसे पश्चिम जो देश है उसे मध्यदेश कहते हैं। इन्हीं दोनों पर्वतोंके बीच पूर्व समुद्रसे पश्चिम समुद्रतक जो देश है वह आर्यावर्त कहलाता है। जिस देशमें कृष्णसार मृग अपनी इच्छासे नित्य विचरण करें, वह देश यज्ञ करने योग्य होना है। इन शुभ देशोंमें ब्राह्मणको निवास करना चाहिये। इससे भिन्न म्लेच्छ देश हैं। हे मुनीश्वरो ! इस प्रकार मैंने यह देशव्यवस्था आप सबको संक्षेपमें सुनायी है। (अध्याय ७)
Summary of chapter 6 of the Bhavishya Purāṇa is as follows:
The gṛhastha āśrama and its complete dharma are expounded. The proper earning and use of wealth (artha) without adharma, the daily routine of a householder, and the five mahāyajñas that constitute the religious skeleton of householder life are taught: Brahma-yajña (daily Vedic study), Deva-yajña (fire offerings), Pitṛ-yajña (water libations), Bhūta-yajña (offerings to all beings), and Manuṣya-yajña (hospitality to guests). The householder who performs these five daily without fail is declared equivalent to one who has completed all the great sacrifices.