भविष्य पुराण

श्रीसूर्यनारायणके नित्यार्चनका विधान

भगवान् श्रीकृष्णने कहा-साम्ब ! अब हम सूर्यनारायणके पूजनका विधान बताते हैं, जिसके करनेसे सम्पूर्ण पाप और विघ्न नष्ट हो जाते हैं तथा सभी मनोरधोंकी सिद्धि होती है और पुण्य भी प्राप्त होता है। प्रातःकाल उठकर शौच आदिसे निवृत्त हो नदीके तटपर जाकर आचमन करे तथा सूर्योदयके समय शुद्ध मृत्तिकाका शरीरपर लेपन कर स्नान करे। पुनः आचमन कर शुद्ध वस्त्र धारण करे और सप्ताक्षर-मन्त्र ॐखखोल्काय स्वाहा' से सूर्यभगवान्को अर्घ्य दे तथा हृदयमें मन्त्रका ध्यान करे एवं सूर्य-मन्दिरमें जाकर सूर्यकी पूजा करे। सर्वप्रथम श्रद्धापूर्वक पूरक, रेचक और कुम्भक नामक प्राणायाम कर वायवी, आग्नेयी,माहेन्द्री तथा वारुणी धारणा करके भूतशुद्धिकी रीतिसे शरीरका शोषण, दहन, स्तम्भन एवं प्लावन करके अपने शरीरकी शुद्धि कर ले। अपने शुद्ध हृदयमें भगवान् सूर्यको भावना कर उन्हें प्रणाम करे। स्थूल, सूक्ष्म शरीर तथा इन्द्रियों को अपने-अपने स्थानोंमें उपन्यस्त करे। 'ॐ खः स्वाहा हृदयाय नमः, ॐ खं स्वाहा शिरसे स्वाहा, ॐ उल्काय स्वाहा शिखायै वषट्, ॐ याय  स्वाहा कवचाय हुम्, ॐ स्वाँ स्वाहा नेत्रत्रयाय है बौषद्, ॐ हाँ स्वाहा अस्त्राय फट् ।'

-इन मन्त्रोंसे अङ्गन्यास कर पूजन-सामग्रीका मूल मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलद्वास प्रोक्षण करें। फिर  सुगन्धित पुष्पादि उपचारोंसे सूर्यभगवान्का पूजन करे। सूर्यनारायणकी पूजा दिनके समय सूर्य-मूर्तिमें  और रात्रिके समय अग्रिमें करनी चाहिये।  प्रभातकालमें पूर्वाभिमुख, सायंकालमें पश्चिमाभिमुख व तथा रात्रिमें उत्तराभिमुख होकर पूजन करनेका  विधान है।'ॐ खखोल्काय स्वाहा' इस सप्ताक्षर है मूल मन्त्रसे सूर्यमण्डलके बीच पट्दल कमलका ध्यान कर उसके मध्य में सहन किरणोंसे देदीप्यमा भगवान् सूर्यनारायणकी मूर्तिका ध्यान करे। फिर रक्त चन्दन, करवीर आदि रक्त पुष्पों, धूप, दीप अनेक प्रकारके नैवेध, वस्त्राभूषण आदि उपचारों पूजन करे अथवा रक्त चन्दनसे ताम्रपात्रमें घट्दला कमल बनाकर उसके मध्यमें सभी उपचारोंसे भागया सूर्यनारायणका पूजन करे। छहों दलोंमें पहङ्ग पूजन कर उत्तर आदि दिशाओंमें सोमादि ग्रहोंका अर्चन करे और अष्टदिक्पालों तथा उनके आयुधोंका भी तत्तद् दिशाओंमें पूजन करे। नामके आदिमें 'प्रणव' लगाकर नामको चतुर्थी-विभक्तियुत्त करके अन्त में 'नमः' कहे-जैसे 'ॐ सोमाय नमः इत्यादि । इस प्रकार नाममन्त्रोंसे सबका पूजन करे

अनन्तर व्योम-मुद्रा, रवि मुद्रा, पदा-मुद्रा, महाश्वेत- मुद्रा और अस्त्र-मुद्रा दिखाये। ये पाँच मुद्राएँ पूजा जप, ध्यान, अर्घ्य आदिके अनन्नार दिखानी चाहिये इस प्रकार एक वर्षतक भक्तिपूर्वक तन्मयताके साथ भगवान् सूर्यनारायणका पूजान करनेसे अभीष्ट गानोरथों की प्राप्ति होती है और बादमें मुक्ति भी प्राप्त होती है। इस विधिसे पूजन करनेपर रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है, धनहीन धन प्राप्त करता है, राज्यभष्टको राज्य मिल जाता है तथा पुत्रहीन पुत्र प्रारा करता है। सूर्यनारायणका पूजन करनेवाला पुरुष प्रक्षा, मेधा तथा सभी समृद्धियोंसे सम्पन्न होता हुआ चिरंजीवी होता है। इस विधिसे पूजन करने पर कन्याको उत्तम वरको, कुरूपा स्त्रीको उत्तम सौभाग्यकी तथा विद्यार्थीको सद्विद्याकी प्राप्ति होती है। ऐसा सूर्य भगवान्ने स्वयं अपने मुखसे कहा है। इस प्रकार सूर्यभगवान्का पूजन करनेसे पन, चाया, 'संतान, पशु आदिकी नित्य अभिवृति होती है। मनुष्य निष्काम हो जाता है तथा अन्तमें से राति प्राप्त होती है। (अयाय ४५)