सूतजी बोले-ब्राह्मणो! यज्ञक्रियाके उपयोगमें आनेवाली सुवाके निर्माणमें-श्रीपर्णी, शिशपा, क्षीरी (दूधवाले वृक्ष), बिल्व और खदिरके काष्ठ प्रशस्त माने गये हैं। याग-क्रियामें इनसे बने सुवाकें उपयोगसे सिद्धि प्राप्त होती है। देव-प्रतिष्ठामें आँवला, खदिर और केसरके वृक्षको भी सुवाके लिये शास्त्रज्ञोंने उत्तम कहा है। खुवा प्रतिष्ठाकार्यमें, सम्प्राशन तथा संस्कार-कर्ममें और यज्ञादि कार्योंमें प्रयुक्त होता है। सुवाफे निर्माणमें बिल्व-काष्ठ ग्रहण करना चाहिये, परंतु उसके ग्रहणके समय रिक्ता आदि तिथियाँ न हो। उस काष्ठको ग्रहण करनेवाला व्यक्ति पहले उपवास करे और मद्य, मांस आदि सभी वस्तुओंका परित्याग कर दे, स्त्री सम्पर्क से भी दूर रहे। एक काष्ठसे सुवा और नुक् दोनोंका निर्माण किया जा सकता है। इनका निर्माण शास्त्रोक्त विधिके अनुसार करना चाहिये। दर्वी अर्थात् करछुलका निर्माण स्वर्ण या ताँबेसे किया जाना चाहिये। यदि काष्ठसे करछुल बनानी हो तो गंभारी वृक्ष, तेंदूका वृक्ष और दूधवाले वृक्षके काष्ठसे बारह अङ्गुलको बनानी चाहिये। उसका नीचेका मण्डल दो अङ्गुलका होना चाहिये। यज्ञ-साधनमें यह उपयोगी है। ताँबेकी करछुल चालीस तोले, प्राय: आधा किलोको होतो है और उसका मण्डल पाँच अङ्गुलका तथा लम्बाई आठ हाथकी होती है। यही दवी (करछुल) पायस-निर्माण में उपयोगी है। आज्य-शोधनके लिये दस तोलेको तासमयी करछुल होती है। इसके अभावगे पीपलके काष्ठसे सोलह अङ्गुलके मापमें दों (करछुल) बनाये। आज्या स्थालो ताँबेकी या मिट्टीकी भी हो सकती है।
सूतजी बोले-ब्राह्मणो ! अब मैं पूर्णाहुतिकी विधि बतला रहा हूँ, इसके अनुष्ठानसे यज्ञ पूर्ण होता है। अतएव पूर्णाहुति विधिपूर्वक करनी चाहिये। पूर्णाहुतिके बाद यज्ञमें आवाहित किये गये देवताओंको अर्घ्य देना चाहिये। यदि यज्ञ अपूर्ण रहे तो यजमान श्रीविहीन हो जाता है और यज्ञ पूर्ण फलप्रद नहीं होता। सुवामें चरु रखकर भगवान् सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये। यज्ञ सम्पन्न हो जानेपर ब्राहाणोंको भोजन कराना चाहिये। तदनन्तर यजमान घरमें प्रवेश कर कुल-देवताओंकी प्रार्थना करे-प्रतिष्ठा-यागमें पूर्णाहुतिके समय 'सप्त ते०' (यजु० १७ । ७९), 'देहि मे०' (यजु० ३।५०), 'पूर्णा दर्वि०' (यजु० ३।४१) तथा 'पुनन्तु०' (यजु० १९।३९) इन मन्त्रोंका पाठ करे तथा नित्य-नैमित्तिक यागमें'पुनन्तु,' 'पूर्णा दर्वि', 'सप्त ते.' तथा 'देहि मे-का पाल करे। विद्वानोंको इनमें अपने कुल परम्पराका भी विचार करना चाहिये। पूर्णाहुति खड़ा होकर सम्पन्न करना चाहिये, बैठकर नहीं। ग्रहहोम तथा शतहोममें एक पूर्णाहुति देनी चाहिये। सहसयाग दो, अयुत होममें चार सहल पुष्पहोममें एक, मृतु पुण होममें एक, शत इा होम दो, सभाधान, अन्नप्राशन, सोमलोनयन संस्कारोग और प्राधिलादि कर्म तथा मित्तिक देव सागने एक पूर्णाहुति देने का विधान है।
मन्त्रोच्चारणमें ऋषि-छन्द, विनियोगादिका प्रयोग करना चाहिये। यदि इनका प्रयोग न किया जाय
तो फल-प्राप्तिमें न्यूनता होती है। 'सस ' इस ब्राह्मण-मन्त्रके कौण्डिन्य ऋषि, जगती छन्द और अग्नि देवता हैं। देहि मे' इस मन्त्रके प्रजापति ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और प्रजापति देवता हैं। 'पूर्णा दर्वि' इस मन्त्रके शतक्रतु ऋषि, अनुष्यप् छन्द एवं अग्नि देवता हैं। 'पुनन्तुः' इस मन्त्रके पवन ऋषि, जगती छन्द तथा देवता अग्नि हैं।
इस रीतिसे तत्तद् मन्त्रोंके उच्चारणके समय ऋषि, छन्द एवं देवताका स्मरण करना चाहिये। जप-कालमें मन्त्रोंकी संख्या अवश्य पूरी करनी चाहिये। निर्दिष्ट संख्याके बिना किया गया जप फलदायी नहीं होता। अयुत-होम, लक्ष होम और कोटि-होममें जिन ऋत्विक ब्राह्मणोंका वरण किया जाय, वे शान्त एवं काम-क्रोधरहित हों। ऋत्विजोंकी संख्या अभीष्ट होमानुसार करनी चाहिये। प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजाकर एवं दक्षिणा प्रदान कर उन्हें संतुष्ट करना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक याग-कर्म करनेवाला व्यक्ति वसु आदित्य और मरुद्गणोंके द्वारा शिवलोकमें पूजित होता है तथा अनेक कल्पोंतक वहाँ निवास कर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है। जो किसी कामनाके बिना अर्थात् निष्काम-भावपूर्वक ईश्वरार्पण-बुद्धिसे लक्ष-होम करता है, वह अपने अभीष्टको प्राप्त कर परमपद प्राप्त कर लेता है। पुत्रार्थी पुत्र, धनार्थी धन, भार्यार्थी भार्या और कुमारी शुभ पतिको, प्राप्त करती है। राज्यभ्रष्ट राज्य तथा लक्ष्मीकी कामनावाला व्यक्ति अतुल ऐश्वर्य प्राप्त करता है। जो व्यक्ति निष्कामभावपूर्वक कोटि-होम करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। ब्रह्माने स्वयं बतलाया है कि होटि- होम लक्ष-होमसे सौ गुना श्रेष्ठ है। ऋत्विज ब्राह्मणों के अभाव में आचार्य भी होता बन सकता है। आसनों में कुशासन प्रशस्त माना गया है। देवता पद्मासनपर स्थित रहते हैं और वास भी करते हैं, अत: पद्मासनस्थ होकर ही अन्य करनी चाहिये। 'देवो भूत्वा देवान् यजेत' इस न्यायके अनुसार पद्यासनस्थ देवताओंका अर्चन पद्मासनस्थ होकर ही करना चाहिये। यदि ऐसा न किया जाय तो सम्पूर्ण फल यक्षिणी हरण कर लेती है। (अध्याय १५-२१)
।।प्रथम भाग सम्भूर्ण ।