भविष्य पुराण

वास्तु-मण्डलके निर्माण एवं वास्तु-पूजनकी संक्षिप्त विधि

सूतजी कहते हैं-ब्राह्मणो! अब मैं वास्तु-मण्डलका संक्षिप्त वर्णन कर रहा हूँ। पहले भूमिपर अङ्करोंका रोपण करके भूमिकी परीक्षा कर ले।

तदनन्तर उत्तम भूमिके मध्य में वास्तु-मण्डलका निर्माण करे। वास्तु-मण्डलके देवता पैंतालीस हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं-(१) शिखी, (२) पर्जन्य,

१-गोत्र-प्रवर-निर्णयपर 'गोत्र-प्रवर-निबन्ध-कदम्ब' आदि कई स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थ हैं। मत्स्यपुराणके अध्याय ११५-२०५ उकमें चिस्तारसे यह विषय आया है तथा स्कन्दपुराणके माहेश्वरखण्ड एवं ब्रह्मखण्ड में भी इसपर विचार किया गया है।

२-सबके लिये एकमात्र परमात्मा ही परमकल्याणार्थ ध्येय-ज्ञेय हैं और कश्यपनन्दन सूर्यके रूप में वे प्रत्यक्षरूपसे संसारका पालन, संचालन-उष्पा तथा प्रकाशके रूपमें, फिर चायु-प्राणके रूपमें समस्त प्राणियोंके जीवन बने हैं। इसलिये सभी वैष्णव और मयामी अपनेको अच्युत गोत्रीय हो मानते हैं। प्राचीन परम्परा के अनुसार वेदाध्ययनमें वैदिक शाखा. सूत्र, ऋषि, गौत्र और प्रवाका ज्ञान आवश्यक थी। यह विषय आपलायन गृहासूत्रमें भी निर्दिष्ट है।

३-शिस भूमियर मनुष्यादि प्राणी निवास करते हैं, उसे वास्तु कहा जाता है । इसके गृह, देवप्रासाद, ग्राम, नगर, पुर. दुर्ग मादि अनेक भेद है । इसपर वास्तुराजवल्लभ, समराङ्गणसूधार, बृहत्संहिता, शिल्पाल, गृहरनाषण, इयशोधघाहरात्र तथा कपिलपारच आदि ग्रन्या पूर्ण विचार किया गया है। पुराणों में मत्स्य, अग्नि तथा विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें भी यह महत्वपूर्ण विषय आया है। कल्याण के देवाय मी हास्तु-चक्रांदिके विषय में सामग्री संकलित की गयी है। वास्तुके आविर्भावके विषय में मत्स्यपुराणमें आया है कि अबकासुरके वधके समय भगवान् शंकरके ललाटमै जो स्वेदबिन्दु गिरे उनसे एक भयंकर आकृतिवाला पुरुष प्रकट हुआ। जब वह जिलोकोका भक्षण करने के लिये उद्यत हुला, तब शंका आदि देवताओंने उसे पृच्चीपर मुलाकर वास्तुदेवडा (वास्तुपुरुष) के रूपमें प्रतिद्धित किया और उसके शरीर में सभी

(३) जयन्त, (४) कुलिशायुध, (५) सूर्य, (६) सत्य, (७) वृष, (८) आकाश, (९) वायु, (१०) पूषा, (११) वितथ, (१२) गुहा, (१३) यम, (१४) गन्धर्व, (१५) मृगराज, (१६) मृग, (१७) पितृगण, (१८) दौवारिक, (१९) सुग्रीव, (२०) पुष्पदन्त, (२१) वरुण, (२२) असुर, (२३) पशु, (२४) पाश, (२५) रोग, (२६) अहि, (२७) मोक्ष, (२८) भल्लाट, (२९) सोम, (३०) सर्प, (३१) अदिति, (३२) दिति, (३३) अप्, (३४) सावित्र, (३५) जय, (३६) रुद्र, (३७) अर्यमा, (३८) सविता, (३९) विवस्वान्, (४०) विबुधाधिप, (४१) मित्र, (४२) राजयक्ष्मा, (४३) पृथ्वीधर, (४४) आपवत्स तथा (४५) ब्रह्मा ।

इन पैंतालीस देवताओंके साथ ही वास्तु-मण्डलके बाहर ईशानकोणमें चरकी, अग्निकोणमें विदारी, नैऋत्यकोणमें पूतना तथा वायव्यकोणमें पाचराक्षसीकी स्थापना करनी चाहिये। मण्डलके पूर्व दिशा में स्कन्द, दक्षिणमें अर्यमा, पश्चिममें जम्भक तथा उत्तरमें पिलिपिच्छकी स्थापना करनी चाहिये। इस प्रकार वास्तु मण्डलमें तिरपन देवी-देवताओंकी स्थापना होती है। इन सभीका अलग-अलग मन्त्रोंसे पूजन करना चाहिये। मण्डलके बाहर ही पूर्वादि दस दिशाओंमें दस दिक्पाल देवताओं-इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा तथा अनन्तकी भी यथास्थान पूजा कर उन्हें बलि (नैवेद्य) निवेदित करनी चाहिये । वास्तु-मण्डलको रेखाएँ धेत वर्णसे तथा मध्यमें कमल लाल वर्णसे अनुरक्षित करना चाहिये। शिखी आदि पैतालीस देवताओंक कोष्ठकोंको रक्तादि रंगोंसे अनुरक्षित करना चाहिये। गृह, देवमन्दिर, महाकूप आदिके निर्माणमें तथा देव-प्रतिष्ठा आदिमें वास्तु-मण्डलका निर्माण कर वास्तुमण्डलस्थ देवताओंका आवाहन कर उनका पूजन आदि करना चाहिये। पवित्र स्थानपर लिपी-पुती डेढ़ हाथके प्रमाणकी भूमिपर पूर्वसे पश्चिम तथा उत्तरसे दक्षिण दस-दस रेखाएँ खींचे। इससे इक्यासी कोष्ठकके वास्तुपद-चक्रका निर्माण होगा। इसी प्रकार १-१ रेखाएँ खीचनेसे चौंसठ पदका वास्तुचक्र बनता है।

वास्तु मण्डलमें जिन देवताओंका उल्लेख किया गया है, उनका ध्यान और पूजन अलग-अलग मन्त्रसे किया जाता है। उल्लिखित देवताओंकी तुष्टिके लिये विधिके अनुसार स्थापना तथा पूजा करके हवन-कार्य सम्पन्न करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणोंको सुवर्ण आदि दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिये।

वास्तु-यागोदिमें एक विस्तृत मण्डलके अन्तर्गत योनि तथा मेखलाओंसे समन्वित एक कुण्ड और वास्तु-वेदीका विधिके अनुसार निर्माण करना चाहिये। मण्डलके ईशानकोणमें कलश स्थापित कर गणेशजीका एवं कुण्डके मध्यमें विष्णु, दिक्पाल और ब्रह्मा आदिका तत्तद् मन्त्रोंसे पूजन करना चाहिये। प्राणायाम करके भूतशुद्धि करे। तदनन्तर वास्तुपुरुषका ध्यान इस प्रकार करे- वास्तुदेवता श्वेतवर्णके चार भुजावाले शान्तस्वरूप और कुण्डलोसे अलंकृत हैं। हाथों पुरतक, अक्षमाला, वरद एवं अभय मुद्रा धारण किये हुए

देवताओंने वास किया। इसीलिये वह जास्तुदेवता कहलाया। देवताओं ने उसे पूजित होने का वर भी प्रदान किया । वास्तुदेवताको पूजाके लिये वास्तुप्रतिमा तथा वास्तुचक्र बनाया जाता है । वास्तुचक्र प्रायः ४१ से लेकर एक सहल पदात्मक होता है । भिन्न-भित्र अवसरोपर भिन्न-भित्र वास्तुचक्रोंका निर्माण कर उनमें देवताओय आचाइन, स्थापन एवं पूजन किया जाता है। चौंसठ पदात्मक तथा इक्यासी प्रदात्मक वास्तुचक्रके पूजनको परम्पर विशेषरूपसे प्रचलित है। इस सभी वास्तु के भेदों में प्रायः इन्द्रादि दस दिवपालोके साथ शिखौ आदि पैंतालीस देवरीका पूजन किया जाता है तथा उन्हें पायमान्न वल्लि प्रदान की जाती है। वास्तुकलशमें वास्तुदेवता (आस्तोष्यति) की पूजा कर उनमें सर्वविध शान्ति एवं कल्याणकी प्रार्थना की जाती हैं

हैं। पितरों और वैश्वानरसे युछ है तथा कुटिल भूसे सुशोभित है। उनका मुख भयंकर है। हाथ जानुपर्यन्त लम्बे हैं। ऐसे वास्तुपुरुषका विधिके अनुसार पूजन कर उन्हें स्नान कराये। वास्तोव्यते. यह वास्तुदेवताके पूजनका मुख्य मन्त्र है। पूजाको जितनी सामग्री है, उसे प्रोक्षणद्वारा शुद्ध कर ले। आसनकी शुद्धि कर गणेश, सूर्य, इन्द्र और आधारशक्तिरूप पृथ्वी तथा ब्रह्माका पूजन करें। तदनन्तर हाथमें श्वेत चन्दनयुक्त श्वेत पुष्प लेकर विष्णुरूप वास्तुपुरुषका ध्यान कर उन्हें आसन, पाद्य, अय, मधुपर्क आदि प्रदान करे और विविध उपचारोंसे उनकी पूजा करे। विद्वान् ब्राह्मणको चाहिये कि कुण्ड और वास्तुवेदीके मध्यमें कलशकी स्थापना करे। कलशमें पर्वतके शिखर, गजशाला, वल्मीक, नदोसंगम, राजद्वार, चौराहे तथा कुशके मूलकी-यह सात प्रकारकी मिट्टी छोड़े। साथ हो उसमें इन्द्रवल्ली (पारिजात), विष्णुकान्ता (कृष्णा शङ्खपुष्पी), अमृती (आमलकी), पुष (खीरा), मालती, चम्पक तथा ऊर्वारुक (ककड़ी)-इन वनस्पतियोंको छोड़े। पारिभद्र (नीम)-के पत्रोंसे कलशके कण्ठका परिवेष्टन करे और कलशके मुख में फणाकाररूपमें पञ्चपल्लवोंकी स्थापना करे। उसके ऊपर श्रीफल, बीजपूर, नारिकेल, दाडिम, धात्री तथा जम्बूफल रखे। कलशमें सुवर्णादि पञ्चरत्न छोड़े। गन्ध-पुष्पादि पञ्चोपचारोंसे कलशका पूजन करे। कलशमें वरुणका आवाहन करे। कलशका स्पर्श करते हुए उसमें समस्त समुद्रों, तीर्थों, गङ्गादि नदियों तथा पविन्न जलाशयों आदिके पवित्र जलकी भावना कर, उनका आवाहन करे। कलश स्थापनके अनन्तर तिल, चावल, मध्याज्य तथा दही, दूध आदिसे यथाविधि बास्तु-होम करे । वास्तु हवनके समय वास्तु-देवताके मन्त्रका. जप करे। अनन्तर वास्तु-मण्डलके समस्त देवताओंको पायसान्न, कृशरान आदि पृथक-पृथक् क्रमश: बलि निवेदित करे । सभी देवताओंको उन्हींके अनुरूप पताका भी प्रदान करे। अपनी सामर्थ्यके अनुसार मन्त्र-जप और वास्तुपुरुषस्तवका पाठ करे। भगवान्

१-श्वेतं चतुर्भुजं शान्तं कुण्डलारिलंकृतम् ।

पुस्तकं चाक्षमालां च वराभयकरं परम्॥

पितृवैश्वानरोपेतं कुटिलभूपशोभितम् ।

करालवदनं चैव आजानुकरलम्बितम् ॥

(मध्यमपर्व २।११।११-१२)

२-पूरा मन्त्र इस प्रकार है-

बास्तोश्यते प्रति जानीड़ास्मात्स्वावेशो अनमीवो भवानः ।

यत् रमहे प्रति क्यो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदै॥

(३७/५४)

हे वास्तुदेव हन आपके सलो उपासक हैं, इसपर आप पूर्ण विश्वास करें और हमारी स्तुति-प्रार्थनाओंको सुनकर हम सभी उपासकोंको आधि-व्याधिमुक्त कर दें तथा जो हम अपने धन-ऐ वयंको कामना करते हैं, आप उसे भी परिपूर्ण कर दें, साथ ही इस वास्तुक्षेत्र या गृहमें निवास करनेवाले हमारे स्त्री-पुत्रादि-परिचर-परिजनों के लिये कल्याणकारक हों एवं हमारे अधीनस्थ गौ, अधादि सभी चतुष्पद प्राणियों का भी कल्याण करें।

३- भगवान् शंकरके द्वारा की गयी 'ब्रह्मस्तव' नामको विष्णु-स्तुति इस प्रकार है-

विष्णुर्जिणुविभुर्यज्ञो यज्ञियो यज्ञपालकः ।

नारायणों नरो हंसो विश्वम्मेनो हुताशनः ।।

यजेशः पुण्डरीकाक्षः कृष्णः सूर्यः सुराचितः ।

आदिदेवो जगत्कर्ता मण्डलेशो महीपरः ॥

पद्यनाथो हपोकेशी दाता दामोदरो हरिः ।

त्रिविक्रमस्त्रिलोकेशो

भक्तप्रियो ऽच्युतः सत्यः सत्यवाक्यो धुवः शुचिः ।

संन्यासी शास्वतत्त्वज्ञस्विपशाशगुणात्मकः ॥

विदारी विनयः शान्तस्तपस्वी वैद्युतप्रभः ।

यज्ञस्त्वं हि वषट्कारस्चयोंकारस्त्वमग्नयः ।।

त्वं स्वधा त्वं हि स्वाहा त्वं सुधा च पुरुषोत्तमः ।

शंकरने भगवान् विष्णुस्वरूप वास्तोष्पतिकी इस स्तुतिको कहा है। इसका जो प्रयत्नपूर्वक निरन्तर पाठ करता है, उसे अमरता प्राप्त हो जाती है और जो हत्कमलके मध्य निवास करनेवाले भगवान् अच्युत-विष्णुका ध्यान करता है, वह वैष्णवी सिद्धि प्राप्त करता है। यज्ञकर्मकी पूर्णतामें आचार्यको पयस्विनी गौ तथा सुवर्ण दक्षिणामें दे, अन्य ब्राह्मणों को भी सुवर्ण प्रदान करे। प्राजापत्य और स्विष्टकृत् हवन करे। आचार्य और ऋत्विज् मिलकर यजमानपर कलशके जलसे अभिषेक करें। पूर्णाहुति देकर भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। ब्राह्मणों को आज्ञा लेकर यजमान घरमें प्रवेश करे, अनन्तर ब्राह्मण-भोजन कराये। दीन, अन्ध और कृपोंका अपनी शक्तिके अनुसार सम्मान करे। फिर अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वयं भोजन करे। उस दिन भोजनमें दूध, कसैले पदार्थ, भुने हुए शाक तथा करेला आदि निषिद्ध पदार्थों का उपयोग न करे। शाल्यन्न, मूली, कटहल, आम, मधु, घी, गुड़, सेंधा नमकके साथ मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), बदरीफल, धात्रीफल एवं तिल और मरिच आदिसे बने पदार्थ भोजनमें प्रशस्त कहे गये हैं। ( अध्याय १०-१३)