ब्रह्माजी बोले-जनार्दन ! देवलोकमें गौतमी और कौसल्याका सूर्यके विषयमें एक पुरातन संवाद प्रसिद्ध है। एक बार गौतमी ब्राह्मणीने स्वर्गमें अपने पतिके साथ अतिशय रमणीय कौसल्याको देखकर आश्चर्यचकित होकर पूछा- 'कौसल्ये! स्वर्गमें निवास करनेवाले सैकड़ों देवता, अनेक देवाङ्गनाएँ हैं, इसी प्रकार सिद्धगण और उनकी पलियाँ आदि भी हैं, किंतु उनमें न ऐसी गन्ध है, न ऐसी कान्ति है, न ऐसा रूप है। धारण किये हुए वस्त्र तथा आभूषण भी ऐसे नहीं - सुशोभित हो रहे हैं, जैसे कि आप दोनों स्त्री- पुरुषोंके हो रहे हैं। आप दोनोंने कौन-सा ऐसा तप, दान अथवा होमकर्म किया है, जिसका यह र फल है। आप इसका वर्णन करें।'
कौसल्या बोली-गौतमी। हम दोनोंने यज्ञेश्वर भगवान् सूर्यकी श्रद्धापूर्वक आराधना की है। सुगन्धित तीर्थ जलोंसे तथा घृतसे उन्हें खान कराया है। उन्हींकी कृपासे हमने स्वर्ग, निर्मल कान्ति, प्रसन्नता, सौम्यता और सुख प्राप्त किया है। हमलोगोंके पास जो भी आभूषण, वस्त्र, रस आदि प्रिय वस्तुएँ हैं, उन्हें भगवान् सूर्यको अर्पण करनेके बाद ही हम धारण करते हैं। स्वर्गप्राधिकी अभिलाषासे हम दोनोंने भगवान् सूर्यको आराधना की थी और उस आराधनाके फलस्वरुप ही हमलोग स्वर्ग सुख भोग रहे है। जो निष्कामभावसे भलीभाँति सूर्यकी उपासना करते हैं। त्रिलोक के सृष्टिकर्ता सविताकी तृप्तिसे ही सब कुछ प्राप्त होता है।
ब्रह्माजी बोले- विष्णो ! मार्तण्ड भगवान् सूर्यकी आराधनासे मैंने भी अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त किया है, जो अनन्तकालतक रहनेवील हैं। चन्दन, अगुरु, कपूर, कुंकुम तथा उशीरसे जो भगवान् सूर्यकी अनुलिप्त करता है, प्रसन्न होकर भगवान् सूर्य उसे लक्ष्मी प्रदान करते हैं, कालेयक(काला चन्दन), तुरुष्क(एक गन्ध-द्रव्य) रत्क चन्दन गन्ध विजयधूप तथा और भी जो अपनेको इष्ट पदार्थ हों, उन्हें भगवान् सूर्यको निवेदित करना चाहिये। मालती, मल्लिका, जूही अतिमुत्त्कक, पाटला, करवीर, जपा, कुंकुम तगर, कर्णिका, चम्पक केतक अगस्ति, पलाश आदि भगवान् सूर्यको प्रिय हैं। अतः उन्हें अर्पण करना चाहिये। कृष्णा तुलसी,केतकीके पुष्प और पत्र तथा रक्त चन्दनके अर्पण करनेसे भगवान् सूर्य
सद्यः प्रसन्न होते हैं। नील कमल, श्वेत कमल और अनेक सुगन्धित पुष्प भगवान् सूर्यको चढ़ाने चाहिये, किंतु कुटज, शाल्मलि और गन्धरहित पुष्प सूर्यको नहीं चढ़ाने चाहिये, इन्हें चढ़ानेसे दारिद्य, भय और रोगकी प्राप्ति होती है। जिनका निषेध न हो वे ही पुष्प भगवान्को चढ़ाने चाहिये। उत्तम धूप, मुरा, माँसी, कपूर, अगरु, चन्दन तथा दूसरे सुन्दर पदार्थोंसे भगवान् वनमालीकी अर्चना करनी चाहिये। विविध रेशमी तथा कपासद्वारा निर्मित उत्तरीय आदि वस्त्र तथा जो अपनेको भी प्रिय है ऐसा वस्त्र सूर्यभगवान्को चढ़ाना चाहिये। फल तथा नैवेद्यादि भी जो अपनेको प्रिय हों उन्हें देना चाहिये। सुवर्ण, चाँदी, मणि और मुक्ता आदि जो अपनेको प्रिय हों, उन्हें भी भगवान् सूर्यको निवेदित करना चाहिये। अपनेको भास्करके रूपमें मानकर सारी यज्ञ-क्रियाएँ अव्यक्तरूष भगवान् सूर्यको निवेदित करनी चाहिये । (अध्याय ११५)
Summary of chapter 72 of the Bhavishya Purāṇa is as follows:
The Uttara Parva is sealed with its phala-śruti — the declaration of the merit accruing to those who hear, read, preserve, or have this Parva recited. The complete transmission chain is recited once more — Pulastya to Priyavrata, Vyāsa to Sumantu, Kṛṣṇa to Yudhiṣṭhira — and the Parva is closed with the assurance that its full hearing delivers the fruit of all vratas performed and grants Bhagavān Śrī Kṛṣṇa's highest grace to the devoted listener. ---