सुमन्तुजीने कहा-हे वीर! मैंने तुमको अर्कसम्पुटिका-व्रतकी संक्षिप्त विधि बतलायी। अब मरिच-सप्तमीका वर्णन कर रहा हूँ, इसमें मरिचका भक्षण किया जाता है। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठी तिथिको उपवास रहकर सौर- धर्मकी विधिके अनुसार भक्तिपूर्वक भगवान् भास्करकी पूजा करनी चाहिये।'ॐ वं फट्' यह महाबलशाली मन्त्र साक्षात् सूर्यस्वरूप ही है। इसका बारम्बार स्मरण एवं जप करनेसे मानव एक वर्षमें ही देवेश भगवान् भास्करका दर्शन प्रास कर लेता है और अन्तमें व्याधि तथा मृत्युसे मुक्त हो सूर्यलोकको प्राप्त करता है। व्रती आत्मशुद्धयर्थ मरिच-ससमीके दिन सौर-मन्त्रों एवं मुद्राओंसे हृदयादि अङ्गन्यास कर प्राणायाम आदि करे। भगवान्को अर्घ्य प्रदान करे। विविध पुष्पोंको अर्पित करे। स्नान कराये, नैवेद्य अर्पित करे। संयत होकर सूर्यमन्त्रोंका जप करे। व्योममुद्रा दिखाकर प्रदक्षिणा करे, हवन करे और हदयमुद्रासे भगवानका विसर्जन करे। भगवान्के पूजन आदि कर्मों में तत्तद् मुद्राओंको दिखाये। मुद्राओंके नाम इस प्रकार हैं-किंकिणी, व्योम, अस्त्र, पट्रिनो, अर्किणी, ज्वालिनी, तेजनी, गभस्तिनी, शंखिनी, सूर्यवक्त्रा, सहस्रकिरणा, उदया, मध्यमा, अस्तमनी, मालिनी, तर्जनी तथा कुम्भमुद्रा। इन मुद्राओंके साथ जो भगवान् सूर्यको पूजा करता है, उससे वे प्रसन्न हो जाते हैं। इस विधिसे ब्रह्माने भगवान् सूर्यकी पूजा की थी। राजन्! तुम भी इस विधिसे भास्करकी पूजा करो। इस विधिसे जो सदा रविकी पूजा करता है, वह भगवान् सूर्यदेवके दिव्य धामको प्राप्त कर लेता है। नृप ! इस विधिसे देवेशको पूजा कर यथाशक्ति ब्राह्मणको विधिपूर्वक भोजन कराकर सप्तमीकै दिन मन्त्रपूर्वक सूर्यका स्मरण करते हुए मौन होकर भोजन करे और भोजनसे पहले मरिचकी इस प्रकार प्रार्थना करे- ॐ खखोल्काय स्वाहा। प्रीयतां प्रियसङ्गदो भव स्वाहा ॥ ऐसा करनेसे व्रतीको प्रिय व्यक्तिका समागम उसी क्षण प्राप्त हो जाता है। यह मरिच-सप्तमी प्रियसंगमदायिनी और पुण्यको प्रदान करनेवाली तथा कामनाओंकी पूर्ति करनेवाली है। एक वर्षतक इस सप्तमी-व्रतका पालन करनेसे पुत्रादिकोंसे वियोग नहीं होता। इसलिये महाबाहो! इस प्रियदायिनी ससमीको तुम भी करो। देवराज इन्द्र ने इस मरिच- सप्तमीको उपवास कर महाराज्ञी शचीका सङ्ग प्राप्त किया था। महाबलशाली राजा नलने भी इस सप्तमीको उपवास कर दमयन्तीको प्राप्त किया था और श्रीरामने भी इस सप्तमीके दिन उपवास कर भगवती सौताको प्राप्त किया था। (अध्याय २१२-२१४)