भविष्य पुराण

ब्राह्मपर्व-श्रवणका माहात्म पुराण-श्रवणकी विधि पुराणों तथा पुराणवाचक व्यासकी महिमा

सुमन्तुजीने कहा-राजन् ! भविष्यपुराणके इस प्रथम ब्राह्मपर्वके सुननेसे मानव सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा सहस्रों अश्वमेध, वाजपेय एवं राजसूय यज्ञों, सभी तीर्थ-यात्राओं, वेदाभ्यास तथा पृथ्वीदान करनेका फल प्राप्त कर लेता है। इतिहास- पुराणके श्रवणके अतिरिक्त ऐसा कोई साधन नहीं है, जो सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर सके। पुराण-श्रवणका जो फल बतलाया गया है, वही फल पुराणके पाठसे भी होता है, इसमें कोई संदेह नहीं ।

शतानीकने पूछा- भगवन्! महाभारत, रामायण एवं पुराणोंका श्रवण तथा पठन किस विधानसे करना चाहिये? पुराण वाचकके क्या लक्षण हैं? भगवान् खखोल्कका क्या स्वरूप है? वाचकको विधिवत् पूजा करनेसे क्या फल होता है? पर्वको समातिपर वाचकोंको क्या देना चाहिये? इसे आप बतानेकी कृपा करें।

सुमन्तुजी बोले-राजन्! आपने इतिहास-पुराणके सम्बन्धमें अच्छी जिज्ञासा को है। महाबाहो। इस सम्बन्ध पूर्वकालमें देवगुरु बृहस्पति तथा ब्रह्माजीके मध्य जो संवाद हुआ था, उसे आप श्रवण करें। मानव विशेष भक्तिपूर्वक इतिहास और पुराणका श्रवण कर ब्रह्महत्यादि सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। पवित्र होकर प्रातः, सायं तथा रात्रिमें जो पुराणका श्रवण करता है, उस व्यक्तिसे ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश संतुष्ट हो जाते हैं। प्रात:काल भगवान् ब्रहा, सायंकाल विष्णु और रात्रिमें महादेव प्रसन्न होते हैं। राजन् !अब वाचकके विधानको सुनिये। पवित्र वस्त्र पहनकर शुद्ध होकर प्रदक्षिणापूर्वक जब वाचक आसनपर बैठता है तो वह देवस्वरूप हो जाता है। आसन न बहुत ऊँचा हो, न बहुत नीचा। वाचकके आसनकी सदा वन्दना की जानी चाहिये। वाचकके आसनको व्यासपीठ कहा जाता है। पीठको गुरुका आसन समझना चाहिये। वाचकके आसनपर सुननेवालेको कभी भी नहीं बैठना चाहिये। देवताओंकी अर्चना करके विशेषरूपसे ब्राहाणको पूजा करनी चाहिये। सभी समागत व्यक्तियों को साथ में लेकर पुराण-ग्रन्थ वाचकके लिये प्रदान

१-यहाँ भविष्यपुराणका पाठ कुछ त्रुटित प्रतीत होता है । सात सप्तमी-व्रतामसे अवशिष्ट अनौदना, विजय तथा कामिका-सप्तमी व्रत छूट गये हैं। चतुर्वर्ग-चिन्तामणि (हेमाद्रि) के प्रतखण्डमें भविष्यपुराके नामसे इन ब्रोंका विस्तारसे वर्णन आता है। वैशाख शुक्ला सप्तमी अनोदना-सक्षमी, माघ शुक्ला सामो चिजया-सप्तमी तथा फाल्गुन शुक्ला स्मामी कामिका-सहमी कही गयी है। विजया-समोमें सूर्यहननाम स्तोत्र भी पढ़ा गया है। इससे लगता है कि हेमाद्रि के पास भविष्यपुराणको प्रामाणिक एवं पूर्ण शुद्ध प्रति सुरक्षित यौ। पुराणों को उपेक्षासे ही इस समयकी प्रतिमें बह अंश खण्डित हो गया है।

२-इतिहासपुराणाभ्यां न त्यन्यन् पाप नृणाम् ।

येषा प्रषणमात्रेण मुख्यते सर्वकिल्विषैः ।।

विधिना राजशार्दूल पृष्यतां यत्फलं किल ।

यधोतं नात्र संदेहः पठतां च विशायने ।।

इतिहासपुराणानि शुल्या भक्त्या विशेषतः ।

मुच्यते सर्वचापेभ्यो ब्रह्महत्यादिभिनिभो॥

सायं प्राहस्तया रात्री सुचि त्या भूमोति।

तस्य विस्तथा ब्रह्मा तुष्टी शंकरस्तथा ।।

प्रत्यूपे भाववान् ब्रह्मा दिनान्ते तुष्यते हरिः ।

महादेशम्नश्मा मानने न्यतां शुष्मने

(बाह्यपर्व २१६ 1४३-३५)

करे। उस ग्रन्थको नतमस्तक हो प्रणाम करे। तब शान्तचित्त होकर श्रवण करे।

ग्रन्थका सूत्र (धागा) वासुकि कहा गया है। ग्रन्थका पत्र भगवान् ब्रह्मा, उसके अक्षर जनार्दन, सूत्र शंकर तथा पंक्तियाँ सभी देवता हैं। सूत्रके मध्यमें अग्नि और सूर्य स्थित रहते हैं। इनके आगे सभी ग्रह तथा दिशाएँ अवस्थित रहती हैं। शंकुको मेरु कहा गया है। रिक्तस्थानको आकाश कहा गया है। ग्रन्थके ऊपर तथा नीचे रहनेवाले दो काष्ठफलक द्यावा-पृथिवीरूपमें सूर्य और चन्द्रमा हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थ देवमय है और देवताओंद्वारा पूजित है। इसलिये अपने कल्याणकी कामनासे इतिहास-पुराणादि श्रेष्ठ ग्रन्थों को अपने घरमें रखना चाहिये, उन्हें नमस्कार करना चाहिये तथा उनकी पूजा करनी चाहिये*।

राजन्! वाचक ग्रन्थको हाथमें ग्रहण कर ब्रह्मा, व्यास, वाल्मीकि, विष्णु, शिव, सूर्य आदिको भक्तिपूर्वक प्रणाम करके ब्रद्धासमन्वित होकर ओजस्वी स्वरमें अक्षरोंका स्पष्ट उच्चारण करते हुए तथा सात स्वरोंसे युक्त यथासमय यथोचित रस एवं भावोंको प्रकट करते हुए ग्रन्थका पाठ करे। इस प्रकार वाचकके मुखसे जो श्रोता नियमतः श्रद्धापूर्वक इतिहास-पुराण और रामचरितको सुनता है, वह सभी फलोंको प्राप्त कर सभी रोगोंसे मुक्त हो जाता है और विपुल पुण्यको प्राप्त कर भगवान्के उत्तम और अद्भुत स्थानको प्राप्त करता है।

श्रोताको चाहिये कि वह स्नानादिसे पवित्र होकर वाचफको प्रणाम करके उसके सम्मुख आसनपर बैठे और वाणोको संयत कर सुसमाहित हो वाचककी बातोको सुने।

महाबाहो! व्यासस्वरूप वाचकको नमस्कार करनेपर संशयके बिना अन्य कुछ भी नहीं बोलना चाहिये । कथा-सम्बन्धी धार्मिक शंका या जिज्ञासा उत्पन्न होनेपर वाचकसे नम्रतापूर्वक पूछना चाहिये, क्योंकि व्यासस्वरूप वक्ता उसका गुरु और धर्मबन्धु है। वाचकको भी भलीभाँति उसे समझाना चाहिये, क्योंकि वह गुरु है, इसीलिये सबपर अनुग्रह करना उसका धर्म है। उत्तरके अनन्तर 'तुम्हारा कल्याण हो' यह कहकर पुन: आगेकी कथा सुनानी चाहिये। श्रोताको अपनी वाणीपर नियन्त्रण रखना चाहिये। वाचक ब्राह्मणको ही होना चाहिये। प्रत्येक मासमें पारण करे तथा वाचककी पूजा करे, महीनाके पूर्ण होनेपर वाचकको स्वर्ण प्रदान करे।

प्रधम पारणा वाचककी अपनी शक्तिके अनुसार पूजा करनेपर अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त होता है। कार्तिकसे आरम्भकर आश्विनतक प्रत्येक मासमें एक-एक पारणापर पूजन करनेसे क्रमश: अग्निष्टोम, गोसव, ज्योतिष्टोम, सौत्रामणि, वाजपेय, वैष्णव, माहेश्वर, ब्राह्म, पुण्डरीक, आदित्य, राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञोंका फल प्रास होता है। इस प्रकार यज्ञ-फलोंकी प्राप्ति कर वह नि:संदेह उत्तम लोकको प्राप्त करता है।

पर्वकी समाप्तिपर गन्ध, माला, विविध वस्त्र आदिसे वाचककी पूजा करनी चाहिये। स्वर्ण, रजत, गाय, काँसेका दोहन-पात्र आदि वाचकको प्रदान कर कथा श्रवणका फल प्राप्त करना चाहिये। वाचकसे बढ़कर दान देने योग्य सुपात्र और कोई नहीं है, क्योंकि उसकी जिहाके अराभागपर सभी शास्त्र विराजमान रहते हैं। जो श्रद्धापूर्वक वाचकको भोजन करता है, उसके पितर सौ वर्षातक तृप्त

*इत्थं देवमयं ह्रेतत् पुस्तकं देवपूजितम्।

नमस्यं पूजनीयं च गृहे स्थाप्यं विभूतये।।

रहते हैं। जैसे सभी देवोंमें सूर्य श्रेष्ठ हैं वैसे ही ब्राह्मणोंमें वाचक श्रेष्ठ है। वाचक व्यास कहा जाता है। जिस देश, नगर, गाँवमें ऐसा व्यास निवास करता है, वह क्षेत्र श्रेष्ठ माना जाता है। वहकि निवासी धन्य हैं, कृतार्थ हैं, इसमें संदेह नहीं। दाच्चकको प्रणाम करनेसे जिस फलकी प्रासि होती है, उस फलकी प्राप्ति अन्य कर्मोंसे नहीं होती।

जैसे कुरुक्षेत्रके समान कोई दूसरा तीर्थ नहीं, गङ्गाके समान कोई नदी नहीं, भास्करसे श्रेष्ठ कोई देवता नहीं, अश्वमेधके समान कोई यज्ञ नहीं, पुत्र-जन्मके तुल्य सुख नहीं, वैसे ही पुराणवाचक व्यासके समान कोई ब्राह्मण नहीं हो सकता। देवकार्य, पितृकार्य सभी कर्मोंमें यह परम पवित्र है।

राजन् ! इस प्रकार मैंने पुराणश्रवणकी विधि तथा वाचकके माहात्म्यको बतलाया। विधिके अनुसार ही पुराणादिका श्रवण एवं पाठ करना चाहिये। स्नान, दान, जप, होम, पितृपूजन तथा देवपूजन आदि सभी श्रेष्ठ कर्म विधिपूर्वक अनुष्ठित होने पर हो उत्तम फल प्रदान करते हैं। (अध्याय २१६)

।।भविष्यपुराणान्तर्गत ब्राह्मपर्व सम्पूर्ण।।

*कुरुक्षेत्रसम तीर्थ न द्वितीयं प्रचक्षते ।

र नदी गङ्गया तुल्या न देखो भास्कराद्वरः ॥

नाबामेशसम पुण्यं न पाएं अहहत्यथा ।

पुरजन्यमुखैस्तुल्यं न सुखं विरते यथा।

तथा माणसामी विणी न कमिशन प्राप्यते हुए ।

दैये कर्मणि पिये च पावनः परमो नृणाम् ।

(बाह्यपर्व २१६ । १०९-१११)