भविष्य पुराण

रथयात्रामें विघ्र होनेपर एवं गोचरमें दुष्ट ग्रहोंके आ जानेपर शान्तिका विधान और तिलकी महिमा

भगवान् रुद्रने पूछा- ब्रह्मन्! आप पुनः रथयात्राका वर्णन करें।

ब्रह्माजीने कहा- रुद्र ! रथको धीरे-धीरे इन सममार्गपर चलाया जाय, जिससे रथको धक्का अ आदि न लगने पाये। मार्गको शुद्धिके लिये प्रथम प्रतीहार और दण्डनायक उस मार्ग जायें।  पिंगल, रक्षक, द्वारक, दिण्डी तथा लेखक-ये भी रथके साथ-साथ चलें। इतनी सतर्कता और कुशलतासे रथको ले जाया जाय कि रथका कोई अङ्ग-भङ्ग न हो। रथका ईषादण्ड टूटनेपर ब्राह्मणोंको, अक्ष टूटनेपर क्षत्रियोंको, तुला टूटनेपर वैश्योंको, शय्याके टूटनेपर शूद्रोंको भय होता है। युगके भङ्गसे अनावृष्टि, पोटके भङ्गसे प्रजाको भय, रथका चक्र टूटनेसे शत्रुसेनाका आगमन, ध्वजाके गिरनेसे राज-भङ्ग तथा प्रतिमा खण्डित होनेसे राजाको मृत्यु होती है। छत्रके टूटनेपर युवराजको मृत्यु होती है। इनमेंसे किसी भी प्र प्रकारका उत्पात होनेपर उसकी शान्ति अवश्य करानी चाहिये तथा ब्राह्मणको भोजन और दान देना चाहिये एवं विधिपूर्वक ग्रह-शान्ति करानी  चाहिये। रथके ईशानकोणमें वेदो अथवा कुण्ड

बनाकर घृत और समिधाओंसे देवता तथा ग्रहोंकी प्रसन्नताके लिये हवन करना चाहिये और इन नाम-मन्त्रोंसे आहुति देनी चाहिये-'ॐ अग्नये स्वाहा, ॐ सोमाय स्वाहा, ॐ प्रजापतये स्वाहा।' इत्यादि । अनन्तर शान्ति एवं कल्याणके लिये इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-

स्वस्त्यस्त्विह च विप्रेभ्यः स्वस्ति राज्ञे तथैव च।

गोभ्यः स्वस्ति प्रजाभ्यश्च जगत: शान्तिरस्तु वै॥

शं नोऽस्तु द्विपदे नित्यं शान्तिरस्तु चतुष्पदे।

शं प्रजाभ्यस्तथैवास्तु शं सदात्मनि चास्तु वै॥

भूः शान्तिरस्तु देवेश भुवः शान्तिस्तथैव च ।

स्वश्चैवास्तु तथा शान्तिः सर्वत्रास्तु तथा रवेः॥

त्वं देव जगतः स्मष्टा पोष्टा व त्वमेव हि।

प्रजापाल गृहेशान शान्तिं कुरु दिवस्पते॥

(ब्राहापर्व ५६।१६-१९)

अपनी जन्मराशिसे दुष्ट स्थानमें स्थित ग्रहोंकी प्रसन्नता तथा शान्तिके लिये ग्रह-समिधाओंसे हवन करना चाहिये। ये समिधाएँ प्रादेशमात्र लम्बी होनी चाहिये। सूर्यके लिये अर्कको, चन्द्रमाके लिये पलाशकी, मङ्गलके लिये खदिरकी, बुधके लिये अपामार्गकी, गृहरगतिके लिये पीपलकी, शुक्रके

लिये गूलरकी, शनिके लिये शमीकी, राहुके लिये दूर्वाकी और केतुके लिये कुशाकी समिधा ही हवनके लिये प्रयोग करना चाहिये। उत्तम गौ, शङ्ख, लाल बैल, सुवर्ण, वस्त्र युगल, श्वेत अश्व, काली गौ, लौहपात्र और छाग-ये क्रमशः नौ ग्रहोंकी दक्षिणा हैं। गुड़ और भात, घी-मिश्रित खीर, हविष्यान, क्षीरान्न, दही-भात, घृत, तिल और उड़दके बने पक्वात्र, गूदोंवाला फल, चित्रवर्णका भात एवं काँजी-ये क्रमश: नवग्रहोंके भोजन हैं। जैसे शरीरमें कवच पहन लेनेसे बाण नहीं लगते, वैसे ही ग्रहोंकी शान्ति करनेसे किसी प्रकारका उपघात नहीं होता। अहिंसक, जितेन्द्रिय, नियममें स्थित और न्यायसे धनार्जन करनेवाले पुरुषोंपर ग्रहोंका सदा अनुग्रह रहता है। यश, धन, संतानकी प्राप्तिके लिये, अनावृष्टि होनेपर, आरोग्य प्राप्तिके लिये तथा सभी उपद्रवोंकी शान्तिके लिये ग्रहोंकी सदा पूजा करनी चाहिये। संतानसे रहित, दुष्ट संतानवाली, मृतवत्सा, मात्र कन्या संतानवाली स्त्री संतानदोषकी निवृत्तिके लिये, जिसका राज्य नष्ट हो गया हो वह राज्यके लिये, रोगी पुरुष रोगकी शान्तिके लिये अवश्य ग्रहों की शान्ति करे, ऐसा मनीषियोंने कहा है। ग्रहों की प्रतिमा ताम्र, स्फटिक, रक्तचन्दन, सुवर्ण, चाँदी, लोहे और शीशे आदिकी बनवाकर अथवा इनके चित्रका निर्माण करा कर जिस ग्रहका जो वर्ण हो उसी रंगके वस्त्र एवं पुष्प उन्हें समर्पित करे । गुग्गुलका धूप सभीको अर्पित करना चाहिये।

'आ कृष्णेन0 ' (यजु० ३३ । ४३), 'हम देवा० (यजु०९।४०) इत्यादि नवग्रहोंके अलग-अलग मन्त्रोंसे एक-एक ग्रहके नामसे समिधा, घृत, शह और दहीकी एक सौ आठ अथवा अट्ठाईस आहुतिय दे तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराये। उन्हें यथाशचि दक्षिणा दे। जो ग्रह जिसके गोचर अथवा कुण्डलीम दुष्ट स्थानपर स्थित हो, उसे उस ग्रहकी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। महादेव! मैंने इन ग्रहोंकी ऐसा वर दिया है कि लोगोंद्वारा तुम सब पूजित होओगे। राजाओंका उत्थान और पतन तथा मनुष्योंका उदय और सम्पत्तियोंका नाश ग्रहोंके अधीन है। इसलिये ग्रहशान्ति अवश्य करनी चाहिये। ग्रह, गाय, राजा, गुरुजन तथा ब्राह्मण पूजन करनेवाले व्यक्तिको सब प्रकारका सुख प्रदान करते हैं। इनक अपमान करनेसे मनुष्यको अनेक प्रकारके दुःख मिलते हैं। यज्ञ करनेवाले, सत्यवादी, जप, होम, उपवास आदिमें तत्पर धर्मात्मा पुरुषोंकी सभी बाधाएं शान्त हो जाती हैं।

इस प्रकारसे शान्ति कर रथको पुनः चलाना चाहिये और शेष मार्गों में घुमाकर अपने स्थान पहुँच जानेपर रथ-स्थित देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। उत्पात होनेपर ग्रहोंकी शान्तिके समान ही रथमें स्थित सभी देवताओंकी भी पूजा करनी चाहिये, ऐसा करनेसे सभी तरहके उत्पातोंकी सब प्रकारसे शान्ति हो जाती है।

दुष्ट ग्रहोंकी शान्तिके लिये ब्राह्मणोंको दिल प्रदान करे अथवा धोके साथ तिलोंका हवन करे

यथा बाणप्रहाराणां वारणं कवचं स्मृतम् ।

                     तथा देयोपश्चातानां शान्तिर्भवति वारणम् ॥

अहिंसकस्य दान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च ।

नित्यं च नियमस्थल्प सदा सानुग्रहा ग्रहाः॥

ग्रहाः पूज्या सदा रुद्र इच्छता विपुलं यशः ।

श्री कामः शान्तिकामो वा ग्रहय समाचरेत् ॥

वृष्ट्यायुः पुष्टिकामो वा तयैवाभिचरन् पुनः ।

यानपत्या भवेत्रारी दुष्यजापि या भवेत् ।।

वाला यस्याः प्रप्रियन्ते या च कन्याप्रजा भवेत् ।

राज्यभ्रष्टो नृपो यस्तु दीर्घरोगी च यो भनेत् ॥

ग्रहयज्ञः स्मृतस्तेषां मानयाना मनीषिभिः ।

(आहापर्व ५६।३०-३५)

ग्रहा गानो नरेन्द्रा गुरवो ब्राह्मणास्तथा ।

                        पूजिताः पूरपन्त्येते निर्दहन्यपमानिताः॥

              यज्वनां सत्यवाक्यानां तथा नित्योपवासिनाम् ।

                       जपहोमपराणां च सर्व दुष्टं प्रशाम्यति ॥

(बाह्यपर्व ५६।४४, ४१)

और देवताओंको धूप दे। तिल देवताओंके लिये स्वाहारूप अमृत, पितरोंके लिये स्वधारूप अमृत तथा ब्राह्मों के लिये आश्रयस्वरूप कहे गये हैं। ये तिल कश्यपके अङ्गसे उत्पन्न हुए हैं तथा देवता एवं पितरोंको अति प्रिय हैं। स्नान, दान, हवन, तर्पण और भोजनमें परम पवित्र माने गये हैं।

इस प्रकार ग्रह और देवताओंका पूजन कर भगवान् सूर्यकी प्रतिमाको रथसे उतारकर मण्डलमें स्थापित करे, फिर विघ्न-बाधाओंकी शान्ति के लिये दीप, जल, जौ, अक्षत, कपासके बीज, नमक तथा धानकी भूसीसे आस्ती कर पनियोसहित सूर्यनारायणको वेदीके ऊपर स्थापित करे। वहाँ दस दिनतक उनकी विधिपूर्वक पूजा करे। दस दिनतक होनेवाली यह पूजा दशाहिका पूजा कहलाती है। इस प्रकार पूजनकर फिर भगवान् सूर्यनारायणको पूर्व स्थानपर स्थापित करना चाहिये। (अध्याय ५६-५७)