युधिष्ठिरने पूछा- भगवन्! प्राचीन कालमें जब अग्रिदेव अदृश्य हो गये, उस समय अग्निका कार्य किसने किया और कैसे अग्निने पुनः अपना स्वरूप प्राप्त किया? इसे आप बतायें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज! एक बार उतथ्यमुनि और अङ्गिरामुनिका विद्या और तपमें परस्पर श्रेष्ठताके विषयमें बहुत विवाद हुआ। इसका निश्चय करने के लिये दोनों ब्रह्मलोक गये और उन्होंने ब्रह्माजीको सारा वृत्तान्त बतलाया। ब्रह्माजीने उनसे कहा कि 'तुम दोनों जाकर सभी देवताओं और लोकपालोको यहाँ बुला लाओ, तब सभीके समक्ष इसका निर्णय किया जायगा।' ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर दोनों जाकर सभी देवता, ऋषि, गन्धर्व, किचर, यक्ष, राक्षस, दैत्य, दानव आदिको बुला लाये। किंतु भगवान् सूर्य नहीं आये। ब्राजीक पुनः कहनेपर उत्तथ्यमुनि
*कदलीके व्याजसे सर्वशक्तिमयी दुर्गाकी चितिरुपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत्। नमस्तस्यै को ही स्मरण करते हुए प्रार्थना की गयी है।
सूर्यनारायणके समीप जाकर बोले-'भगवन्! आप शीघ्र ही हमारे साथ ब्रह्मलोक चलें। भगवान् सूर्यने कहा 'मुने! हमारे चले जानेपर जगत् में अन्धकार छा जायगा, इसलिये हमारा चलना किस प्रकार हो सकता है, हम नहीं चल सकेंगे।' यह सुनकर उतथ्यमुनि यहाँसे चले आये और ब्रह्माजीको सब वृत्तान्त सुना दिया। तब ब्रह्माजीने अङ्गिरामुनिसे सूर्यभगवान्को बुलानेके लिये कहा। अङ्गिरामुनि ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर सूर्यनारायणके समीप गये और उनसे ब्रह्मलोक चलनेको कहा। सूर्यनारायणने वही उत्तर इनको भी दिया। तब अङ्गिराने कहा- 'प्रभो! आप ब्रह्मलोक जाय, मैं आपके स्थानपर यहाँ रहकर प्रकाश करूँगा।' यह सुनकर सूर्यनारायण तो ब्रह्माजीके पास चले गये और अङ्गिरा प्रचण्ड तेजसे तपने लगे। इधर भगवान् सूर्यने ब्रह्माजीसे पूछा-'ब्रह्मन् ! आपने किस निमित्तसे मुझे यहाँ बुलाया है ?' ब्रह्माजीने कहा-'देव! आप शीघ्र ही अपने स्थानपर जायें, नहीं तो अङ्गिरामुनि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको दग्ध कर डालेंगे। देखिये उनके तापसे सभी लोग दग्ध हो रहे हैं। जबतक वे सब कुछ भस्म न कर डालें उससे पूर्व ही आप प्रतिष्ठित हो जायँ।' यह सुनते ही सूर्यभगवान् पुनः अपने स्थानपर लौट आये और उन्होंने अङ्गिरामुनिकी स्तुति कर उन्हें बिदा किया। अङ्गिरा पुनः देवताओंके समीप आये। देवताओंने अङ्गिरामुनिको स्तुति की और कहा—'भगवन् ! जबतक हम अग्निको हूँ तबतक आप अग्निके सभी कर्म कौजिये।' देवताओंका ऐसा वचन सुनकर महर्षि अङ्गिरा अग्निरूपमें देवकार्यादिको सम्पन्न करने लगे। जब अग्निदेव आये तो उन्होंने देखा कि अङ्गिारामुनि अग्नि बनकर स्थित हैं। इसपर वे बोले-'मुने। आप मेरा स्थान छोड़ दें। मैं आपको शुभा नामकी स्त्रीसे ज्येष्ठ एवं प्रिय पुत्रके रूपमें उत्पन्न होगा और तब मेरा नाम होगा बृहस्पति। आपके और भी बहुत-से पुत्र-पौत्र होंगे।' यह वर पाकर प्रसन्न हो महर्षि अङ्गिराने अग्निका स्थान छोड़ दिया।
राजन्! अग्निदेवको चतुर्दशी तिथिको ही अपना स्थान प्राप्त हुआ था, इसलिये यह तिथि अग्निको अति प्रिय है और आग्नेयी चतुर्दशी तथा रौद्री चतुर्दशीके नामसे प्रसिद्ध है। स्वर्गमें देवता और भूमिपर मान्धाता, मनु, नहुष आदि बड़े-बड़े राजाओंने इस तिथिको माना है। जो पुरुष युद्धमें मारे जाये, सर्प आदिके काटनेसे मरे हों और जिसने आत्मघात किया हो, उनका इस चतुर्दशी तिथिमें श्राद्ध करना चाहिये, जिससे वे सदतिको प्राप्त हो जायें। इस तिथिके व्रतका विधान इस प्रकार है-चतुर्दशीको उपवास करे और गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे त्रिलोचन श्रीसदाशिवका पूजन करे, रात्रि में जागरण करे। रात्रिमें पञ्चगव्यका प्राशन कर भूमिपर ही शयन करे। तैल-क्षारसे रहित श्यामाक (साँवा)- का भोजन करे। अग्निके नाम-मन्त्रोंद्वारा काले तिलोंसे १०८ आहुतियाँ प्रदान करे। दूसरे दिन प्रात: स्नान कर पञ्चामृतसे शिवजीको स्नान कराकर भक्तिपूर्वक उनका पूजन करे और पूर्वोक्त रौतिसे हवनकर उनकी प्रार्थना करे। पीछे आरती कर ब्राह्मणको भोजन कराये। उनको दक्षिणा दे और मौन हो स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार एक वर्ष व्रत कर सुवर्णकी त्रिलोचन भगवान् शंकरको प्रतिमा बनाये। प्रतिमाको चाँदीके वृषभपर स्थितकर दो श्रेत वस्त्रोंसे आच्छादित कर ताम्रपात्र में स्थापित करे। तदनन्तर गन्ध, श्वेत पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उसका पूजन कर ब्राह्मणको दे दे। जो एक वर्षतक इस व्रतको करता है, वह लम्बी आयु प्राप्त कर अन्तमें तीर्थमें प्राण परित्याग कर
शिवलोकमें देवताओंके साथ विहार करता है। वहाँ बहुत कालतक रहकर वह पृथ्वीमें आकर ऐश्वर्यसम्पन्न धार्मिक राजा होता है। पुत्र-पौत्रोंसे समन्वित होता है और चिरकालतक आनन्दित रहता है तथा अपने अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त करता है"। (अध्याय ९३)