नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवी सरस्वती व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
भगवान् नर-नारायणके अवतारस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण एवं उनके सखा नर श्रेष्ठ अर्जुन, उनकी लीलाओंको प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती तथा उनके चरित्रोंका वर्णन करनेवाले वेदव्यासको नमस्कार कर अष्टादश पुराण, रामायण और महाभारत आदि जय नामसे व्यपदिष्ट ग्रन्थोंका वाचन करना चाहिये।'
महामुनि आचार्य शौनंकजीने पूछा- मुने! ब्रह्माकी आयुके उत्तरार्धमें भविष्य नागके महाकल्पमें प्रथम वर्षके तीसरे दिन वैवस्वत नामक मन्वन्तरके अट्ठाईसवें सत्ययुगमें कौन-कौन राजा हुए? आप उनके चरित्र तथा राज्यकालका वर्णन करें।
सूतजी बोले- क्षेतवाराहकल्पमें ब्रह्माके वर्षके तीसरे दिन सातवें मुहर्त के प्रारम्भ होनेपर महाराज वैवस्वत मनु उत्पन्न हुए। उन्होंने सरयू नदोके तटपर दिव्या वर्षातक तपस्या की और उनकी कसे उनके पुत्ररूपमें राजा इक्ष्वाकुका जन्म हुआ। ब्रह्माके वरदानसे उन्होंने दिव्य ज्ञानकी प्राप्ति की। राजा इक्ष्वाकु भगवान् विष्णुके परम भक्त थे। उन्हींकी कृपासे उन्होंने छत्तीस हजार वर्षोंतक राज्य किया। उनके पुत्र विकुक्षि हुए, अपने पिता इक्ष्वाकुसे सौ वर्ष कम अर्थात् पैंतीस हजार नौ सौ वर्षोंतक राज्य करके वे स्वर्ग पधार गये। उनके पुत्र रिपुञ्जय हुए और उन्होंने भी पिता विकुक्षिसे सौ वर्ष कम अर्थात् पैंतीस हजार आठ सौ वर्षोंतक राज्य किया। उनके पुत्र ककुत्स्थ हुए। उन्होंने पैंतीस हजार सात सौ वर्षातक राज्य किया। उनके पुत्र अनेना हुए, उन्होंने पैंतीस हजार छ: सौ वर्षातक राज्य किया। अनेनाके पुत्र पृथु नामसे विख्यात हुए। उन्होंने पैंतीस हजार पाँच सौ वर्षातक राज्य किया और उनके पुत्र विष्वगश्व हुए. उन्होंने पैतीस हजार चार सौ वर्षोंतक राज्य किया। उनके पुत्र अहि हुए, उन्होंने पैंतीस हजार तीन सौ अर्यातक राज्य किया। उनके पुत्र भद्राश हुए. जिन्होंने तीस हजार दो सौ वर्षातक राज्य किया। राजा मासके पुत्र सुषमा हुए, उन्होंने पैंतीस हजार एक सौ वर्षोंतक राज्य किया। उनके पुत्र श्रावस्त हुए। (इन्होंने श्रावस्ती नामकी नगरी बसायी थी।) उस समय सत्ययुगमें समग्र भारतवर्षमें धर्म अपने तप, शौच, दया तथा सत्य चारों चरणोंसे * विद्यमान था। इन सभी इक्ष्वाकुवंशी राजाओंने उदयाचलसे अस्ताचलपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीपर नौति एवं धर्मपूर्वक राज्य किया। महाराज श्रावस्तने पैंतीस हजार वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र बृहदश्व हुए, उन्होंने चौतीस हजार नौ सौ वर्षोतक राज्य किया। उनके पुत्र कुवलयाश्व हुए, उन्होंने चौंतीस हजार आठ सौ वर्षोंतक राज्य किया। महाराज कुवलयाश्वके पुत्र दृढाश्च हुए, जिन्होंने अपने पितासे एक हजार वर्ष कम अर्थात् तैंतीस हजार आठ सौ वर्षोंतक राज्य किया। उनके पुत्र निकुम्भक हुए, उन्होंने पितासे एक हजार वर्ष कम अर्थात् बत्तीस हजार आठ सौ वर्षोंतक राज्य किया। उनके पुत्र संकटाव हुए, उन्होंने एक हजार वर्ष कम अर्थात् इकतीस हजार आठ सौ वर्षोंतक राज्य किया। उनके पुत्र प्रसेनजित् हुए, उन्होंने तीस हजार आठ सौ वर्षातक राज्य किया। इसके बाद रवणाव हुए, उन्होंने उनतीस हजार आठ सौ वर्षातक राज्य किया। उनके पुत्र मान्धाता हुए. उन्होंने अपने पितासे एक सौ वर्ष कम अर्थात् उनतीस हजार सात सौ वर्षातक राज्य किया। महाराज मान्धाताके पुत्र पुरुकुत्स हुए. उन्होंने उनतीस हजार छ: सौ वर्षातक राज्य किया। उनके पुत्र त्रिंशदश्च हुए, उनके रथ तीस श्रेष्ठ घोड़े जुते रहते थे, इसीलिये वे त्रिशदचके नामरो विख्यात हुए। राजा त्रिशदश्चके पुत्र अनरण्य हुए. उन्होंने अट्ठाईस हजार वर्षातक शासन किया। महाराज अनरण्यके पुत्र पृषदश्व हुए, वे छः हजार वर्षांतक राज्य करके अन्तमें पितृलोकको चले गये। अनन्तर हर्यश्व नामके राजा हुए, उन्होंने राजा पृषदश्वसे एक हजार वर्ष कम अर्थात् पाँच हजार वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र वसुमान् हुए, उन्होंने उनसे एक हजार वर्ष कम अर्थात् चार हजार वर्षांतक राज्य किया। तदनन्तर उनको त्रिधन्वा नामका पुत्र हुआ, उसने अपने पितासे एक हजार वर्ष कम अर्थात् तीन हजार वर्षोंतक राज्य किया। तबतक भारतमें सत्ययुगका द्वितीय पाद समाप्त हो गया। महाराज त्रिधन्वाके पुत्र तय्यारुणि हुए, वे अपने पितासे एक हजार वर्ष कम अर्थात् दो हजार वर्षोंतक राज्य करके स्वर्ग चले गये। उनके पुत्र त्रिशंकु हुए और उन्होंने मात्र एक हजार वर्ष राज्य किया। छाके कारण राजा त्रिशंकु हीनताको प्रास हुए। उनके पुत्र हरिश्चन्द्र हुए, इन्होंने बीस हजार वर्षातक राज्य किया। उनके पुत्र रोहित हुए, उन्होंने पिताके समान ही राज्य किया। उनके पुत्रका नाम हारीत था। राजा हारीतने भी पिताके समान ही दीर्घकालतक राज्य किया। उनके पुत्र चंचुभूप हुए। पिताके तुल्य वर्षातक उन्होंने राज्य किया। उनके पुत्र विजय हुए। इन्होंने भी पिताके तुल्य वर्षों तक राज्य किया। उनके पुत्र रुक हुए, उन्होंने भी पिताके तुल्य वर्षातक राज्य किया। ये सभी राजा विष्णुभक्त थे एवं इनकी सेना बहुत विशाल थी। उनके राज्यमें मणि-स्वर्णकी समृद्धि तथा प्रचुर धन सम्पत्ति सभीको सुलभ थी। उस समय सत्ययुगका पूर्ण धर्म विद्यमान था। सत्ययुगके तृतीय चरणके मध्य में राजा हरूको पुत्र महाराज सगर हुए। वे शिवभक्त तथा सदाचार
*मनुस्मृति में तप, ज्ञान, यज्ञ तथा दान-ये धर्मके चार पाद बताये गये हैं।
सम्पन्न थे। उनके (एक रानीसे उत्पन्न साठ हजार) पुत्र सागर नामसे प्रसिद्ध हुए। मुनियोंने तीस हजार वर्षातक उनका राज्य-काल माना है। (कपिल मुनिके शापसे) सगर-पुत्र नष्ट हो गये। दूसरी रानीसे असमंजस नामका एक पुत्र हुआ। उनके पुत्र अंशुमान् हुए। उनके दिलीप और दिलीपके पुत्र भगीरथ हुए, जिनके द्वारा पृथ्वीपर लायी गयी गङ्गा भागीरथी नामसे प्रसिद्ध हुई। भगीरथके पुत्र श्रुतसेन हुए। महाराज सगरसे श्रुतसेनतक सभी राजा शैव थे। श्रुतसेनके पुत्र नाभाग तथा नाभागके पुत्र राजा अम्बरीष अत्यन्त प्रसिद्ध विष्णुभक्त हुए, जिनकी रक्षा में सुदर्शनचक्र रात-दिन नियुक्त रहता था। तबतक भारतमें सत्ययुगका तीसरा चरण समाप्त हो चुका था।
सत्ययुगके चतुर्थ चरणमें महाराज अम्बरीषके पुत्र सिन्भुट्ठीप हुए, उनके पुत्र अयुताश्व, अयुताशके पुत्र ऋतुपर्ण, उनके पुत्र सर्वकाम तथा उनके पुत्र कल्माषपाद हुए। कल्माषपादके पुत्र सुदासको वसिप्पजीके आशीर्वादसे मदयन्तीसे उत्पन्न अश्मक (सौदास) नामका पुत्र प्राप्त हुआ। सौदासतकके ये सात राजा वैष्णाव कहे गये हैं। गुरुके शापसे सौदासने अगोसहित अपना सम्पूर्ण राज्य गुरुको समर्पित कर दिया। गोकर्ण लिङ्ग भक्त शैव कहा जाता है। राजा अश्मकके पुत्र हरिवर्मा साधुओंके पूजका थे। उनके पुत्र दशरथ (प्रथम) हुए, उनके पुत्र दिलीप (प्रथम) हुए, उनके पुत्र विश्वासह हुए होने दस हजार वर्षातक राज्य किया। उनके आचरणके कारण उस समाम सौ वर्षांतक भयंकर अनावृष्टि हुई, जिससे उनका राज्य विनष्ट हो गया और रानीके आग्रह करनेपर महर्षि वसिष्ठने यज्ञकर यज्ञके द्वारा खट्वाङ्ग नामक पुत्र उत्पन्न किया। राजा खट्वाङ्गने शस्त्र धारण कर इन्द्रकी सहायतासे तीस हजार वर्षांतक राज्य किया। तदनन्तर देवताओंसे वर प्राप्त कर मुक्ति प्राप्त की। उनके पुत्र दीर्घबाहु हुए, उन्होंने बीस हजार वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र सुदर्शन हुए। महामनीषी सुदर्शनने राजा काशीराजकी पुत्रीसे विवाह कर देवीके प्रसादसे राजाओंको जीतकर धर्मपूर्वक सम्पूर्ण भरतखण्डपर पाँच हजार वर्षांतक राज्य किया।
एक दिन स्वप्नमें महाकालीने राजा सुदर्शनसे कहा-'वत्स! तुम अपनी पत्लोके साथ तथा महर्षि वसिष्ठ आदिसे समन्वित होकर हिमालयपर जाकर निवास करो; क्योंकि शीघ्र ही भीषण झंझावातके प्रभावसे भरतखण्डका प्रायः क्षय हो जायगा। पूर्व, पश्चिम आदि दिशाओंके अनेक उपद्वीप झंझावातोंके कारण समुद्रके गर्तमें विलीन-से हो गये हैं। भारतवर्ष में भी-आजके सातवें दिन भीषण झंझावात आयेगा।' स्वप्नमें भगवतीद्वारा प्रलयका निर्देश पाकर महाराज सुदर्शन प्रधान राजाओं, वैश्यों तथा ब्राह्मणों और अपने परिकरों के साथ हिमालयपर चले गये और भारतका बड़ा सा भूभाग समुद्री तूफान आदिके प्रभावसे नष्ट हो गया। सम्पूर्ण प्राणी विनष्ट हो गये और सारी पृथ्वी जलमग्न हो गयी। पुनः कुछ समयके अनन्तर भूमि स्थलरूपमें दिखलायी देने लगी। (अध्याय)