महाराज युधिष्ठिरने पूछा-भगवन्! भूमिका दान तो क्षत्रिय ही कर सकते हैं, क्योंकि क्षत्रिय ही भूमिका उपार्जन करनेमें, उसका दान करने में और उसके पालन करने में समर्थ होते हैं तथा लोगोंसे न तो भूमिका दान हो सकता है, न ही उसका पालन ही हो सकता है। अतः आप कोई ऐसा उपाय बताइये जो भूमिदानके समकक्ष हो।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज ! यदि भूमिका दान सम्भव न हो तो सुवर्णके द्वारा भूमण्डलकी आकृति बनाकर और नदी-पर्वतोंको रेखाङ्कित कर उसे ही दान कर देना चाहिये। इससे सम्पूर्ण पृथ्वीके दानका फल प्राप्त हो जाता है। अब मैं इसकी विधि बता रहा हूँ।
सूर्य-चन्द्र ग्रहण, जन्मनक्षत्र, विषुवयोग, युगादि तिथियों तथा अयनसक्रान्ति आदि पुण्य समयों में पापक्षय और यशकी प्राप्तिके लिये इस दानको करना चाहिये। अन्य भी प्रशस्त समयोंमें जब धन एकत्र हो जाय, इस दानको किया जा सकता है। एक सौ पलसे लेकर कम-से-कम पाँच पलतक अर्थात् अपनी साराय के अनुसार सुवर्णको जम्बूद्वीपके आकारा पृथ्वीकी प्रतिमा बनानी चाहिये। जिसके मध्यमें मेरु पर्वत तथा यथास्थान अन्य पर्वत अङ्गित हो गह गथ्वी सस्यसम्मान तथा लोकपालोंसे रक्षित, ब्रह्मा, शंकर आदि देवताओंसे सुशोभित और सभी रत्न आदि आभूषणोंसे अलंकृत हो। बाईस हाथ लम्बा-चौड़ा तोरणयुक्त चार द्वारोंवाला एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसमें चार हाथकी वेदो बनानी चाहिये। ईशानकोणमें वेदीपर देवताओंका स्थापन करे और अग्निकोणमें कुण्ड बनाये। पताका-तोरण आदिसे मण्डपको सजा ले। अनन्तर पशलोकपाल और नवग्रहोंका षोडशोपचार पूजन करनेके बाद ब्राह्मणोंसे हवन कराना चाहिये। ब्राहाणवर्ग वेदध्वनि करते हुए तथा मङ्गलघोषपूर्वक भेरी, शङ्ख इत्यादि वाद्योंकी ध्वनिके साथ उस सुवर्णमयी पृथ्वीकी प्रतिमाको मण्डपमें लाकर तिल बिछी हुई वेदीपर स्थापित करे। तत्पश्चात् उसके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्नों, लवणादि रसों और जलसे भरे आठ माङ्गलिक कलशोंको स्थापित करना चाहिये। उसे रेशमी चैदोवा, विविध प्रकारके फल, मनोहर रेशमी वस्त्र और चन्दनद्वारा अलंकृत करना चाहिये। इस प्रकार अधिवासनपूर्वक पृथ्वी का सारा कार्य सम्पन्न कर स्वयं वेत वस्त्र और पुष्पमाला धारणकर, वेत वर्णक आभूषणोंसे विभूषित हो अलिमें पुष्प लेकर प्रदक्षिणा करे तथा पुण्यकाल आनेपर इन मन्त्रोंका उच्चारण करे-
नमस्ते सर्वदेवानां त्वमेव भवन यतः।
भात्री स्वमसि भूतानामतः पाहि वसुन्धरे।
बसु धारयसे यस्मात् सर्वसौख्यप्रदायकम्।
वसुन्धरा ततो जाता तस्मात् पाहि भयावलम्॥
चतुर्मुखोऽपि नो गच्छेद्यस्मादन्तं तवाचले।
अनन्तायै नमस्तुभ्यं पाहि संसारकर्दमात् ।।
त्वमेव लक्ष्मीर्गोविन्दे शिवे गौरीति संस्थिता।
गायत्री ब्रह्मणः पार्थे ज्योत्स्ना चन्द्रे रवौ प्रभा॥
बुद्धिबृहस्पती ख्याता मेधा मुनिघु संस्थिता ।
विश्वं व्याप्य स्थिता यस्मात् ततो विश्वम्भरा मता ॥
धृतिः क्षितिः क्षमा झोणी पृथिवी वसुधा मही।
एताभिर्मूर्तिभिः पाहि देवि संसारसागरात्॥
(उत्तरपर्व १६५। २१-२६)
'वसुन्धरे ! कि तुम्ही सभी देवताओं और सम्पूर्ण जीवनिकायकी भवनभूता तथा धात्री हो, अत: मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है। चूंकि तुम सभी प्रकारके सुखप्रदाता वसुओंको धारण करती हो, इसीसे तुम्हारा नाम वसुन्धरा है, तुम संसार-भयसे मेरी रक्षा करो। अचले! चूँकि ब्रह्मा भी तुम्हारे अन्तको नहीं प्राप्त कर सकते, इसलिये तुम अनन्ता हो, तुम्हें प्रणाम है। तुम इस संसाररूप कीचड़से मेरी रक्षा करो। तुम्हीं विष्णुमें लक्ष्मी, शिवमें गौरी, ब्रह्माके समीप गायत्री, चन्द्रमामें ज्योत्स्ना, रविमें प्रभा, बृहस्पतिमें बुद्धि और मुनियोंमें मेधारूपमें स्थित हो। चूँकि तुम समस्त विश्वमें व्याप्त हो, इसलिये विश्वम्भरा कही जाती हो। धृति, क्षिति, क्षमा, क्षोणी, पृथिवी, वसुधा तथा मही-ये तुम्हारी मूर्तियाँ हैं। देवि! तुम अपनी इन मूर्तियोंद्वारा इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करो।'
इस प्रकार उच्चारणकर पृथ्वीको मूर्ति ब्राह्मणों को निवेदित कर दे। उस पृथ्वीका आधा अथवा चौथाई भाग गुरुको समर्पित करे। जो मनुष्य पुण्यकाल आनेपर सुवर्णनिर्मित कल्याणमयी पृथ्वीकी सुवर्णमूर्तिका इस विधिके साथ दान करता है, वह वैष्णव पदको प्राप्त होता है तथा क्षुद्र घंटिकाओं (घुँघरू)-से सुशोभित एवं सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा वैकुण्ठमें जाकर तीन कल्पपर्यन्त निवास करता है और पुण्य क्षीण होनेपर इस संसारमें आकर वह धार्मिक चक्रवर्ती राजा होता है। (अध्याय १६५)