भविष्य पुराण

वैद्यराज धन्वन्तरि, सुश्रुत और भक्त कवि जयदेवजीका चरित्र

सूतजी बोले-मुने ! देवगुरु बृहस्पतिने प्रयागमें भगवान् सूर्यके उत्तम माहात्म्यको इन्द्रादि देवताओंसे पुन: इस प्रकार कहा-हे देवेन्द्र ! प्राचीन कालमें त्रेतायुगके अन्तमें जिस प्रकार भगवान् शंकरकी आज्ञासे भगवान् सूर्य रमणीय प्रतिष्ठानपुर में प्रादुर्भूत हुए उसे आप सुनें।

त्रेतायुगके अन्तमें सिंहलद्वीपमें परीक्षित नामका एक राजा था, वह वेदधर्मपरायण तथा देवताओं एवं अतिथियोंका पूजक था। उसकी एक कन्या थी, जिसका नाम था भानुमती। वह सूर्यव्रतपरायणा थी। राजमहलमें वह प्रतिदिन भगवान् सूर्यकी आराधना कर उन्हें भोग निवेदित करती थी और उसकी भक्तिसे संतुष्ट होकर प्रत्येक मध्याह्नकालमें भगवान् सूर्य वहाँ आकर उस नैवेद्यको स्वीकार करते थे।

एक समयकी बात है, रविवार के दिन वह भानुमती स्नान करने के लिये नलिनीसागरपर गयी और जलमें उतरकर स्नान करने लगी। उसी समय नारदमुनि उस जनशून्य प्रदेशमें पहुँचे और उन्होंने उस कन्यासे विवाह करनेको इच्छा प्रकट की। परंतु कन्याने इसे आनुचित बताया। इससे देवर्षि नारद लज्जित हो गये और रोगसे भी रास्त हो गये। देवर्षि नारदने भगवान् शंकरके पास आकर सारी घटना उनसे निवेदित की। तब शंकरने उनका रोग दूर करने के लिये आराधनाद्वारा भगवान् भास्करको प्रसन्न किया। भगवान सूर्यने प्रकट होकर देवर्षिका शरीर नीरोग एवं सुन्दर बना दिया और भगवान शंकरसेकहा हे प्रभो ! मुझे आज्ञा दें, में आपका कोन सा प्रिय कार्य करूँ?' भगवान् शंकरने कहा-'भगवन् । आप ब्राह्मण होकर सविता नामसे मृत्युलोकमें जायें और राजा परीक्षितकी कन्या भानुमतीसे विवाह करें।' भगवान् सूर्यने वैसा ही किया। वे सविता भानुमतीके साथ भगवान् सूर्यकी आराधना करने लगे और उन्होंने सूर्यलोकको प्राप्त किया तथा वे ही पौष मासमें आकाशमें प्रकाशित होने लगे। महेन्द्र! तुम भी भगवान् सूर्यकी उपासना करो और देवताओं के कार्यको सिद्ध करो।'

सूतजीने कहा- मुने! बृहस्पतिकी बात सुनकर देवराज इन्द्रने देवताओंके साथ पौष मासमें भगवान् सूर्यकी आराधना की। प्रसन्न होकर सूर्य प्रकट हुए और उन्होंने कहा-'देवगणो! मैं काशीमें धन्वन्तरि नामसे उत्पन्न होऊँगा और कलिके द्वारा निर्मित रोगोंसे पीड़ित संसारके प्राणियोंको रोगोंसे मुक्त करूंगा तथा वहीं निवासकर देवताओंके कार्यको सिद्ध करूँगा।' ऐसा कहकर भगवान् सूर्य काशीमें चले आये और कल्पदत्त ब्राहाणके घरमें पुत्ररूपमें धन्वन्तरिनामसे उत्पन्न हुए। इन्होंने प्रौढ़ विद्वानों के साथ राजपुत्र सुश्रुतको अपना शिष्य बनाया तथा कल्पवेद (आयुर्वेद चिकित्साशास्त्र). का प्रणयन किया। विद्वानोंने रोगोंद्वारा क्षीण होते हुए देहको 'काल्प' कहा है, इसीका ज्ञान इस तन्त्रमें निहित है, इसीलिये इसे काल्पवेद कहा गया है। कलियुगमे वे सूर्य ही भगवान धन्वन्तरिके रूपये प्रसिद्ध हुए, जिनके दर्शनमात्रसे ही समस्त रोग तत्काल नष्ट हो जाते हैं। आचार्य सुश्रुतने धन्वन्तरिप्रणीत कल्पदेवका अध्ययन करके सौ अध्यायोंवाले सोश्रुत-तन्त्र का निर्माण किया।

१-अन्य पुराणों तथा आयुर्वेदप्रन्यांमें काशिराज दिवोदाम्पको धन्वन्तरिका अवतार कहा गया है, जो पहले समुद्र-मन्तक समय समुद्रसे उत्पन्न हुए थे। स्कन्दपुराण काशीखणडमें इनको कथा बहुत विस्तार से आयो है।

२-रोगैश्च क्षयितं देहं काल्पपेत रमतं बुधः।

तस्य ज्ञान च रात्रऽस्मिन् कल्पवेदो हातः स्मृतः ॥

(प्रतिसर्गपर्व ४॥ २॥ २१)

बहस्पतिने पुनः कहा-देवराज! पूर्व समयमें रमणीय पम्पापुरमें हेली नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह चौंसठ कलाओंका ज्ञाता और भगवान् सूर्यकी उपासनामें तत्पर रहता था। उसने प्रतिग्रह-वृत्तिका परित्याग कर हस्तकलासे वस्तुनिर्माणकी वृत्ति अपनायी। उसने लौह धातुकी एक सुन्दर मूर्ति बनाकर उसे अनेक चित्रकारीसे चित्रितकर पाँच हजार मुद्रामें बेचा। बेचनेसे उसे जो धन प्राप्त हुआ उस धनसे उसने माघ मासमें भगवान् सूर्यकी यज्ञोंद्वारा आराधना की। हेलीने रमणीय पम्पासरोवरमें ज्योति:स्वरूप एक उत्तम स्तम्भका निर्माण किया। भगवान् सूर्य भी उसकी भक्तिसे प्रसन्न होकर प्रत्येक मध्याह्नकालमें हेलीद्वारा निवेदित नैवेद्यका वहाँ भोग लगाते थे। भगवान् सूर्यको कृपासे सहस्त्र वर्षपर्यन्त आयु भोगकर अपने प्राणोंका परित्याग कर वह हेली सूर्यस्वरूप हो गया और सूर्यमण्डलके बीच स्थित होकर माघ मासमें प्रकाशित होने लगा। देवेन्द्र! आप भी आदित्यमण्डलमें स्थित विश्वकर्मा भगवान् सूर्यको उपासना कीजिये। वे आपका सब कार्य सम्पन्न कर देंगे। देवगुरुके इस वोक्यको सुनकर देवताओंके साथ इन्द्रने भगवान् सूर्यको आराधना की। जिससे प्रसन्न हो भगवान् सूर्यने देवताओंसे कहा 'देवगणो! मैं वेगदेशके बिल्याम-बिल्वगाममें निरुक्तकारके रूपमें उत्पन्न होऊँगा और कविशिरोमणि जयदेवके नामसे विख्यात होऊँगा।'

यह कहकर भगवान सूर्य वंगदेशमें आये और कन्दुकी ब्राहाणके घर पररूपमें उत्पन्न हुए। वे पाँच वर्षको अवस्थारोही माता-पिताको सेवामें विशेष पसे तत्पर रहने लगे। उन्होंने बारह वर्षसक माता पिताको बली सेको। बारह वर्षको अवस्थामें होगा। पिता रणोपरान्त उनका जन्मोंने विधिपूर्वक श्रापल्याकया और याम से पितरूपों जयदेवके सामने उपस्थित भी हुए तथा पुनः देवरूपमें स्वर्गमें प्रतिष्ठित हुए। अन्तमें जयदेवजीको वैराग्य उत्पन्न हो गया और वे बनमें रहकर भजन करने लगे। उनकी अवस्था तेईस वर्षकी हो गयी। इसी समय सत्यवत नामक ब्राह्मणने अपनी शुभ कन्या भगवान् जगन्नाथको समर्पित कर दी। पूजाके अन्तमें सनातन दारुब्रह्ममय भगवान्ने साक्षात् आकर उससे कहा-'सत्यव्रत! जयदेव मेरी ही मूर्ति है, मेरी आज्ञासे अपनी पुत्री पद्मावती उसे प्रदान कर दो।' यह सुनकर उस सत्यव्रत ब्राह्मणने अपनी कन्या पद्मावती वैरागी जयदेवके लिये बड़ी प्रसन्नतापूर्वक समर्पित कर दी, फिर वह सत्यव्रतं अपने घर वापस आ गया।

पद्मावती अपने पति जयदेवकी आनन्दके साथ अनेक वर्षातक सेवा करती रही। समाधिकालमें जयदेवने वेदाङ्गनिरुक्तकी रचना की। कलियुगमें नागवंशीय शूद्रोंने वैदिक प्रक्रियाएँ भ्रष्ट कर दी थीं। प्राकृत भाषाके रचयिता कलिप्रिय मूढ़ रचनाकारोंको उन्होंने जीतकर पाणिनिशास्त्रका उद्धार किया। कलियुगसे प्रेरित चोरोंचे राजाद्वारा प्रास जयदेवकी सारी सम्पत्ति लूटकर उनका हाथ- पैर काटकर उन्हें गड्ढे में डाल दिया। पद्मावती अपने पतिकी यह दशा देखकर बहुत दुःखी हुई और रोती हुई उसने गड्डेसे पतिको निकालकर हाथसे सहलाकर उनकी पीडाको दूर किया। एक दिन राजा धर्मपाल मृगया प्रसंगमें वहाँ आया। उसने भक्त जयदेवको देखा और पूछा कि हाथ परसे विहीन आपकी यह दशा किसने की है? जयदेवने कहा-'महाराज! मैं अपने कोंके फलस्वरूप ही इस दशाको प्राप्त हुआ हूँ। किसीने दुष्टता नहीं की है।' इसपर राजा धर्मपाल जयदेवको पत्रीसहित शिविका (डोली) में बैठाकर अपने महलले आया। राजाने उनसे दीक्षा ग्रहणकर

उनके लिये एक धर्मशालाका निर्माण कराया। किसी समय कलिसे प्रेरित वे ही चोर वैष्णवका वेश बनाकर राजा धर्मपालके महलमें आये और राजासे कहने लगे-'प्रभो! हमलोग शास्त्रमें निपुण हैं और आपके घर आये हैं। राजन्! हमलोगोंद्वारा निर्मित भोज्य-पदार्थ शिलास्थित भगवान् विष्णु (शालग्राम) प्रतिदिन ग्रहण करते हैं। नृपश्रेष्ठ! आप उसे देखें।' ऐसा कहकर उन कलिभक्तोंने अपनी मायासे चतुर्भुज विष्णुरूपको भोजन करते हुए राजाको दिखाया। आश्चर्यचकित हो धर्मपालने जयदेवसे कहा-'गुरुदेव ! मेरे घरपर विष्णुपरायण वैष्णव आये हैं। मैंने, उनके प्रभावसे साक्षात् हरिका दर्शन किया है। इसलिये आप भी शीघ्र आयें।' यह सुनकर जयदेव भी चकित हो राजदरबारमें आये। उस समय उन पाखण्डियोंने हंसते हुए राजासे कहा-'राजन् ! यह ब्राह्मण तो गौड़देशके राजाके यहाँ भोजन आदि बनानेका कार्य करता था। इसने धनके लोभसे छलकर भोजनमें विष मिलाकर राजाको खिला दिया था। अतः या दुध व्यक्ति है। यह जानकर उस राजाने इस बापणको शूलीपर चढ़ा दिया। इसी बीच हमलोग वहाँ पहुँचे। द्विजको पापी समझकर हमलोगोंने बहुत उपदेश दिया। उस राजाको भी हमलोगोंने बहुत समझाया, तब राजाने शूलीसे उतारकर इसके हाथ-पैर कटवा लिये। वह राजा भी हमारा शिष्य हो गया।'

उन चोरोंके ऐसा कहते (मिथ्या भाषण करते) ही दुःखित होकर पृथ्वी फट पड़ी और वे चोर पृथ्वीमें फंस गये। दयालु जयदेव चोरोंकी यह स्थिति देखकर रोने लगे। इनके रोते ही उनके कटे हाथ-पैर प्रकृतरूपमें हो गये। यह देखकर राजा धर्मपालको महान् आश्चर्य हुआ। उन्होंने जयदेवजीसे इसके विषयमें पूछा। तब जयदेवजीने सत्य-सत्य सारी घटना उन्हें बता दी। यह सुनकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ। जयदेवद्वारा निर्मित 'गीतगोविन्द' पढ़कर उस राजाने मोक्ष प्राप्त किया। (अध्याय ९)