सूतजीने कहा- मुने! देवगुरु बृहस्पतिने प्रयागमें समागत महेन्द्र आदि देवताओंसे द्वादशादित्यों, रुद्रों तथा आ वसु देवताओंका माहात्म्य बतलाया और फिर वे अश्विनीकुमारों की ओर देखकर उनकी गाथाका इस प्रकार वर्णन करने लगे।
भगवान् विवस्वान्को संज्ञासे दिव्य तेजस्वी वैवस्वत मनु, यम और यमुना तीन संताने उत्पन्न हुई। संज्ञा तेज स्वरूप अपने पतिको जानकर अपनी ही छाया उत्पन्न कर तपस्या करने चली गयी सावणि पा, शनि और तपतो-ये छायासे तत्पन हुए। भगवान् सूर्यने छायाद्वारा संतानोंगे असमापिहार देखकर उसे माया स्वरूपा नारी साकार कुछ ही भस्म कर दिया। विवस्वानको क्रोधयुक्त समझकर सावर्णिमनु और शनि सूर्यके प्रति क्रुद्ध हो युद्ध करने लगे। उसी समय वे सूर्यके द्वारा भस्मभूत होने लगे। फिर वे दोनों हिमालय पर्वतपर आकर परम तप करने लगे। तीन वर्ष तप करनेपर भक्तवत्सला महाकालीने प्रसन्न हो उन्हें वर दिया। वर प्राप्तकर पुनः वे दोनों भगवान् सूर्यसे युद्ध करने आये। तपके द्वारा प्रभावशाली सूर्य उनसे भयभीत होकर वहाँसे चले गये। रमणीय कुरुखण्डमें वड़वा (अश्वा) रूपको धारणकर उनकी प्रिया संज्ञा सूर्यको प्राप्त करनेके लिये तपस्वामें संलग्न थी। भगवान् सूर्य उसे ढूँढते हुए वहाँ पहुँचे। उन्होंने संज्ञाको अश्विनीरूपमें देखकर स्वयं भी अश्वका रूप बना
लिया। पाँच वर्षतक सूर्य अश्वरूपमें वडवा (संज्ञा)- के साथ रहे। तदनन्तर वडवासे पराक्रमी एवं दिव्य स्वरूपवाले दो पुत्र (अश्विनीकुमार) उत्पन्न हुए। वे पिताके दुःखको देखकर सूर्यमण्डलमें स्थित हो गये। वडवापुत्र अश्विनीकुमार सावर्णि और शनिको जीतकर उनको बाँध करके पिताके पास ले आये। भगवान् सूर्यने शृङ्खलाबद्ध शत्रुओंको आया देख उन्हें लौह-दण्डसे मारा, जिससे वे पंगु हो गये। भगवान् सूर्यने प्रसन्नतापूर्वक वडवापुत्र अश्विनीकुमारोंसे कहा-'जिस प्रकार जीव और ईश तथा नर और नारायण दो नाम होते हुए भी एक हैं और परस्पर मित्र हैं, उसी प्रकार एक ही नाम नासत्यसे आपलोग प्रसिद्ध होंगे। सोमको शक्ति इडादेवी तुम्हारी ज्येष्ठ पन्नी होगी और सूर्यकी शक्ति पिंगला लघुपत्नी होगी। तुम दोनोंमेंसे एक इडापति होगा और दूसरा पिंगलापति होगा। मनुष्यको राशिसे बारहवें स्थानपर यदि शनैश्चरकी क्रूर दृष्टि पड़ती हो तो इसको शान्तिके लिये इडापतिकी आराधना लाभदायक होगी और राशिसे दूसरे स्थानपर स्थित सावर्णि भ्रमकारक होगा, इसके लिये पिंगलापतिको आराधना शान्तिकर होगी। जन्म राशिमें स्थित देवी तपन्ती (तपतो) तापकारिणी होगी, तब इडा तथा पिंगला शान्ति करनेवाली होंगी।
इन वचनोंको सुनकर अश्विनीकुमार देववैद्य हो गये। सावणि एवं शनि दूसरे अंशोंसे राहु और केतु हो गये। इनसे सूर्य डरकर भागे थे, अब भी ये ग्रहण-रूपमें उन्हें पीड़ा देते रहते हैं। इसीलिये इन सबके परिहार एवं शान्तिके लिये अश्विनीकुमारोंका आविर्भाव हुआ था। अश्विनीकुमारोंकी आराधनासे इनकी शान्ति होती है।
सूतजी बोले- शौनक ! देवगुरु बृहस्पतिद्वारा यह कथा सुनकर देवश्रेष्ठ वे अश्विनीकुमार प्रसन्न हो गये और अपने अंशसे महीतलमें शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुए। इडापति अज (बकरी)-को मारनेवाले चाण्डालके घरमें उत्पन्न हुए। वे सधन (सदन कसाई) नामसे विख्यात होकर पितृ-मातृपरायण हुए। वे शालग्रामशिलासे तौलकर मांस बेचते थे। फिर वे कबीरके समीप आकर उनके शिष्य होकर निवास करने लगे। पूर्व में वे सधन सत्यनिधि नामक एक ब्राह्मण थे, किंतु उन्होंने भयभीत गौको चाण्डालको दिखाया। फलतः राजाके दरबारमें सधनके हाथ काट दिये गये।
पिंगलापति चर्मकारके घर उत्पन्न हुए। वे मानदासके पुद्र रैदासके नामसे प्रसिद्ध हुए। वे काशीपुरी जाकर श्रीरामपरावण कचौरको वाद-विवादमें जीतकर शंकराचार्यके पास आये और उनसे पराजित होकर रैदास रामानन्दके पास आये तथा उनकी शिष्यता स्वीकार कर ली।(अध्याय १८)