सूतजी बोले-महामुने! वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिमें बृहस्पतिवारके दिन महाराज सुदर्शन अपने परिकरोंके साथ हिमालयपर्वतसे पुन: अयोध्या लौट आये। मायादेवीके प्रभावसे अयोध्यापुरी पुनः विविध अन्न-धनसे परिपूर्ण एवं समृद्धिसम्पन्न हो गयी। महाराज सुदर्शनने दस हजार वर्षांतक राज्यकर नित्यलोकको प्राप्त किया। उनके पुत्र दिलीप (द्वितीय) हुए, उन्हें नन्दिनी गौके वरदानसे श्रेष्ठ रघु नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। राजा दिलीपने दस हजार वर्षातक भलीभाँति राज्य किया। दिलीपके बाद पिताके ही समान महाराज रघुने भी राज्य किया। भृगुनन्दन ! त्रेतामें ये सूर्यवंशी क्षत्रिय रघुवंशी नामसे प्रसिद्ध हुए। ब्राह्मणके वरदानसे उनके अज नामक पुत्र हुआ, उन्होंने भी पिताके समान ही राज्य किया। उनके पुत्र महाराज दशरथ (द्वितीय) हुए, दशरथके पुत्ररूपमें (भगवान् विष्णु के अवतार) स्वयं राम उत्पन्न हुए। उन्होंने ग्यारह हजार वर्षांतक राज्य किया। श्रीरामके घुत्र कुशने दस हजार वर्षातक राज्य किया। कुशके पुत्र अतिथि, अतिथिके निषध, निषधके पुत्र नलर हुए, जो शक्तिके परम उपासक थे। नलके पुत्र नभ, नभके पुत्र पुण्डरीक, उनके पुत्र क्षेमधन्वा, क्षेमधन्वाके देवानीक और देवानीकके पुत्र अहीनग तथा महीनगके पुत्र कुरू हुए। इन्होने नेतामें सौ योजन विस्तारका कुरुक्षेत्र बनाया। कुस्के पुत्र पारियात्र, उनके बलस्थल, बलस्थलके पुत्र उक्थ, उनके पजनाभि, बानामिके पुत्र शहनाभि और उनके गुस्थानाभि हुए। व्युत्पनाभि पुरविक्षपाल, उनके स्वर्णनाभि और स्वर्णनाभिके पुत्र पुष्यसेन हुए। पुष्पसेनके पुत्र ध्रुवसन्धि तथा ध्रुवसन्धिके पुत्र अपवर्मा हुए। अपवर्माके पुत्र शीघ्रगन्ता, शीघ्रगन्ताके पुत्र मरुपाल और उनके पुत्र प्रसुश्रुत हुए। प्रसुश्रुतके पुत्र सुसंधि हुए। उन्होंने पृथ्वीके एक छोरसे दूसरे छोरतक राज्य किया। उनके पुत्र अमर्षण हुए। उन्होंने पिताके समान राज्य किया। उनके पुत्र महाश्व, महाश्वके पुत्र बृहद्वल और इनके पुत्र बृहदेशान हुए। बृहदेशानके पुत्र मुरुक्षेप, उनके वत्सपाल और उनके पुत्र वत्सव्यूह हुए। वत्सव्यूहके पुत्र राजा प्रतिव्योम हुए। उनके पुत्र देवकर और उनके पुत्र सहदेव हुए। सहदेवके पुत्र बृहदश्व, उनके भानुरंत तथा भानुरत्रके सुप्रतीक हुए। उनके मरुदेव और मरुदेवके पुत्र सुनक्षत्र हुए। सुनक्षत्रके पुत्र केशीनर, उनके पुत्र अन्तरिक्ष और अन्तरिक्षके पुत्र सुवर्णाङ्ग हुए। सुवर्णाङ्गके पुत्र अमित्रजित, उनके पुत्र बृहद्राज और बृहद्राजके पुत्र धर्मराज हुए। धर्मराजके पुत्र कृतमय और उनके पुत्र रणञ्जय हुए। रणायके पुत्र सञ्जय, उनके पुत्र शाक्यवर्धन और शान्यवर्धनके पुत्र क्रोधदान हुए। क्रोधदानके पुत्र अतुलविक्रम, उनके पुत्र प्रसेनजित् और प्रसेनजित्के पुत्र शूद्रक हुए। शूद्रकके पुत्र सुरथ हुए। ये सभी महाराज रघुके वंशज तथा देवीकी आराधनामें रत रहते थे। यज्ञ-नयागादिमें तत्पर रहकर अन्तमें इन सभी राजाओंने स्वर्गलोक प्राप्त किया। जो बुद्धके वंशज हुए, वे सब पूर्ण शुद्ध क्षत्रिय नहीं थे।
त्रेतायुगक तृतीय चरणके प्रारम्भसे नवीनता आ गयी। देवराज इन्द्रने रोहिणी पति चन्द्रमाको पृथ्वीपर भेजा। चन्द्रमाने तीर्थराज प्रयागको अपनी राजधानी
राजा सुदर्शनको विस्तृत कश्या देदीभागवतवे टूतीय स्कन्धों प्राप्त होती है।
२-ये नल दनदन्तोके पति अत्यन्त प्रसिद्ध महाराज नलगो भित्र है।
अन्य स्थी पुराणों में सूर्यवंशका यहाँस्क वर्ग है। पुराणों के अनुसार मरु देवपिके साथ कलाप ग्राम निवासकर साधना कर रहे है. किंतु इस पुराण के अनुसार सूर्यवंशका वर्णन सुदूर आरोतका हुआ है, जो प्राय- बालियुग्जक्त पहुँच जाता है।
बनाया। वे भगवान् विष्णु तथा भगवान् शिवकी आराधनामें तत्पर रहे। भगवती महामायाकी प्रसत्रताके लिये उन्होंने सौ यज्ञ किये और अट्ठारह हजार वर्षांतक राज्यकर वे पुन: स्वर्गलोक चले गये। चन्द्रमाके पुत्र बुध हुए। बुधका विवाह इलाके साथ विधिपूर्वक हुआ, जिससे पुरूरवाकी उत्पत्ति हुई। राजा पुरूरवाने चौदह हजार वर्षांतक पृथ्वीपर शासन किया। उनको भगवान् विष्णुकी आराधनामें तत्पर रहनेवाला आयु नामका एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हुआ। महाराज आयु छत्तीस हजार वर्षांतक राज्यकर गन्धर्वलोकको प्राप्त करके पुनः स्वर्गमें देवताके समान आनन्द भोग रहे हैं। आयुके पुत्र हुए नहुष, जिन्होंने अपने पित्ताके समान ही धर्मपूर्वक पृथ्वी पर राज्य किया। तदनन्तर उन्होंने इन्द्रत्वको प्राप्तकर तीनों लोकोंको अपने अधीन कर लिया। फिर बादमें महर्षि दुर्वासाके शापसे १ राजा नहुष अजगर हो गये। इनके पुत्र ययाति हुए। ययातिके पाँच पुत्र हुए, जिनमेंसे तीन पुत्र म्लेच्छ देशोंके शासक हो गये। शेष दो पुत्रोंने आर्यत्वको प्राप्त किया। उनमें यदु ज्येष्ठ थे और पुरु कनिष्ठ । उन्होंने तपोबल तथा भगवान् विष्णुके प्रसादसे एक लाख वर्षातक राज्य किया, अनन्तर वे चैकुण्ठ चले गये।
यदुके पुत्र क्रोष्टने साठ हजार वर्षातक राज्य किया। क्रोष्टके पुत्र वृजिनघ्न हुए. उन्होंने बीस हजार वर्षांतक पृथ्वीपर शासन किया। उनको स्वाहार्चन नामका एक पुत्र हुआ। उनके पुत्र चित्ररथ हुए और उनके अरविन्द हुए। अरविन्दको विष्णुभक्तिपरायण श्रवस् नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। उनके तामस हुए, तामसके उशन नामका पुत्र हुआ। उनके पुत्र शीतांशुक हुए तथा शीतांशुकके पुत्र कमलांशु हुए। उनके पुत्र पारावत हुए, उन्हें ज्यामध नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। ज्यामघके पुत्र विदर्भ हुए। उनको क्रथ नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। उनके पुत्र कुन्तिभोज हुए। कुन्तिभोजने पातालमें निवास करनेवाली पुरु दैत्यकी पुत्रीसे विवाह किया, जिससे वृषपर्वण नामका पुत्र हुआ। उनके पुत्र मायाविद्य हुए, जो देवीके भक्त थे। उन्होंने प्रयागके प्रतिष्ठानपुर (झूँसी)-में दस हजार वर्षांतक राज्य किया फिर वे स्वर्ग सिधार गये। मायाविद्यके पुत्र जनमेजय (प्रथम) हुए और उनका पुत्र प्रचिन्वान् हुआ। प्रचिन्वान्के पुत्र प्रवीर हुए। उनके पुत्र नभस्य हुए, नभस्यके पुत्र भवद और उनके सुद्युम्न नामका पुत्र हुआ। सुद्युम्नके पुत्र, बाहुगर, उनके पुत्र संयाति और संयातिके पुत्र धनयाति हुए। धनयातिके पुत्र ऐन्द्राश्व, उनके पुत्र रतीनर और रन्तीनरके पुत्र सुतपा हुए। सुतपाके पुत्र संवरण हुए, जिन्होंने हिमालय पर्वतपर तपस्या करनेकी इच्छा की और सौ वर्षातक तपस्या करने पर भगवान् सूर्यने अपनी तपती नामकी कन्यासे इनका विवाह कर दिया। संतुष्ट होकर राजा संवरण सूर्यलोक चले गये। तदनन्तर कालके प्रभावसे त्रेतायुगका अन्त समय उपस्थित हो गया, जिससे चारों समुद्र उमड़ आये और प्रलयका दृश्य उपस्थित हो गया। दो वर्षोंतक पृथ्वी पर्वतोंसहित समुद्र में विलीन रही। झंझावातोंके प्रभावसे समुद्र सूख गया, फिर महर्षि अगस्त्यके तेजसे भूमि स्थलीभूत होकर दीखने लगी और पाँच वर्षके अंदर पृथ्वी वृक्षा, दूर्वा आदिसे सम्पन्न हो गयी । भगवान् सूर्यदेवकी आज्ञासे महाराज संवरण महारानी तपती, महर्षि वसिष्ठ और तीनों वणों के लोगाके साथ पुनः पृथ्वीपर आ गये। (अध्याय २)
महाभारत आदिमें ये अगस्त्य ऋषिके शापसे अजगर हुए थे।
इनका पूरा विवरण मत्स्यपुराणके प्रारम्भिक अध्यायों मे प्राप्त होता है।