भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-राजन् ! अब मैं परम श्रेष्ठ सुवर्णमय अश्चके दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिसके दानसे मनुष्य अनन्त फलको प्राप्त करता है। किसी पुण्यतिथिमें उसे अपनी शक्तिके अनुरूप तीन पलसे लेकर एक सौ पलतकके सोनेका अश्व बनवाना चाहिये। वह लगामके काँटेसे युक्त हो। अश्वके कंधे उन्नत, जानुप्रदेश और पूँड सुन्दर हो। उसे रेशमी वस्वसे आच्छादित एवं कुंकुमसे लिप्तकर वेदौके ऊपर फैलाये गये काले मृगचर्मपर रखी हुई तिल-राशिपर स्थापित करना चाहिये। श्वेत पुष्पोंसे उसकी पूजाकर चनेका नैवेद्य भोगके रूपमें निवेदित करना चाहिये। तत्पश्चात् शुभ मुहूर्तमें अञ्चलिमें पुष्प लेकर व्रतो इस पुराणोक्त मन्त्रका उच्चारण करे-
नमस्ते सर्वदेवेश वेदाहरणलम्पट॥
वाजिरूपेण मामस्मात् पाहि संसारसागरात्।
त्वमेव साधा भूत्वा छन्दोरूपेण भास्करम्॥
यस्माद् धारयसे लोकानतः पाहि सनातन।
(उत्तरपर्व १८६ । ६-८)
'सभी देवोंके स्वामिन् ! आपको नमस्कार है। वेदोंको लानेके लिये इच्छुक देव ! आप अश्वरूपसे इस संसार-सागरसे मेरी रक्षा कीजिये। भास्कर चूँकि आप ही छन्दोरूपसे सात भागोंमें विभक्त होकर सभी लोकोंको धारण करते हैं, अतः सनातन ! आप मेरी रक्षा कीजिये। ऐसा कहकर उसकी प्रदक्षिणा करे तथा वह अश्व ब्राह्मणको प्रदान कर दे। राजन्! इस दानको देनेसे मनुष्य भगवान् सूर्यक अक्षयलोकको प्राप्त करता है। तदुपरान्त वह तैलरहित अन्नका भोजन करे और भोजनके बाद पुराणोंका श्रवण करे। जो मनुष्य पुण्य दिन आनेपर इस हिरण्या श्व-विधिको सम्पन्न करता है, वह पापोंसे मुक्त हो सिौंद्वारा पूजित होता हुआ मुरारिके पुर-वैकुण्ठको प्राप्त करता है। जो मनुष्य इस सुवर्णाश्वके दानकी विधिको पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर अश्वसमन्वित
राजा होता है और सुवर्णमय विमानद्वारा सूर्यके लोकको जाता है और वहाँ देवाननाओंद्वारा पूजित होता है। जो अल्पवित्त पुरुष हिरण्याश्वदानकी इस विधिको सुनता या स्मरण करता है अथवा लोकमें इसका अभिनन्दन करता है, वह भी पापोंके नष्ट हो जानेसे विशुद्ध शरीरवाला हो पुरन्दर एवं महेश्वरसेषित स्थानको जाता है। (अध्याय १८६)