भविष्य पुराण

यमदूत और नारकीय जीवोंके संवाद के प्रसंग में सूर्य-मन्दिरमें दीपदान करने एवं दीप चुरानेके पुण्य-पापोंका परिणाम

ब्रह्माजी बोले-विष्णो ! एक समय घोर नरकमें  पड़े हुए भूखें, आर्त-दुःखी और विलाप करते हुए जीवोंसे यमदूतने कहा-मूढजनो! अब अधिक विलाप करनेसे क्या लाभ होगा, प्रमादवश तुम सबने अपनी आत्माकी उपेक्षा कर रखी है। पहले तुम सबने यह विचार नहीं किया कि इन कोका  फल आगे भोगना पड़ेगा। यह शरीर थोड़े ही दिनोंतक रहनेवाला है, विषय भी नाशवान् हैं, यह  कौन नहीं जानता। हजारों जन्मोंके बाद एक बार मनुष्य-जन्म मिलता है, उसमें क्यों मूढजन भोगोंकी  ओर दौड़ते हैं। वे पुत्र, स्त्री, गृह, क्षेत्र आदिके लिये प्रयत्नशील रहते हैं और उनमें आसक्त होकर  अनेक दुष्कर्म करते हैं, वे भूजन अपना हित नहीं जानते, वे यह भी नहीं जानते कि सूर्य, चन्द्र,

काल तथा आत्मा-ये सभी मनुष्यके शुभ और अशुभ कर्मोको देखते रहते हैं अर्थात् साक्षीभूत हैं। न केवल एक जन्म अपितु सैकड़ों जन्मोंमें पुत्र, स्त्री आदिके लिये जो-जो भी कर्म किया जाता है, उसे अच्छी तरहसे ये जानते रहते हैं । मोहकी यह महिमा तो देखो कि नरकमें भी ममता बनी रहती है। इस प्रकार परिणाममें भयंकर विषयोंके द्वारा आकृष्टचित्तवाले मनुष्योंकी बुद्धि परमार्थ-तत्त्वकी ओर नहीं होती। जिहाद्वारा भगवान् सूर्यका नाम लेने में कौन-सा श्रम है? मन्दिरमें दीप जलानेमें भी अधिक परिश्रम नहीं पड़ता, परंतु यदि मनुष्यसे इतना भी नहीं हो सकता तो अब रोदन और विलाप करनेसे क्या लाभ है ?* जैसा कर्म किया वैसा फल पाया। इसलिये पापकर्ममें

*अहो मोहस्यं ममत्वं नरकेप्वपि। क्रन्दते मातरं तातं पीड्यमानोऽपि यत्स्वयम।

कभी भी मुद्धि नहीं लगानी चाहिये। यदि कोई अज्ञानसे पापकर्म हो जाय तो सूर्यभगवान्की आराधना करे, जिससे सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

ब्राह्माजी बोले-यमदूतके ऐसे वचनोंको सुनकर तथा भूखसे व्याकुल, प्याससे सूखे कण्ठवाले, दुःखसे पीड़ित वे नारकीय जीव उससे कहने लगे-'साधो! हमने ऐसा कौन-सा कर्म किया, जिससे हमें इस दारुण नरकमें वास करना पड़ा।'

यमदूतने कहा-पूर्वजन्ममें यौवनके उन्मादसे उन्मादित तुम अविवेकियोंने घृतके लोभमें भगवान् सूर्यके मन्दिरसे दीप चुराया था। उसी कारण इस घोर नरकमें तुम सब दुःख भोग रहे हो।

ब्रह्माजी बोले-अच्युत ! मैंने सूर्यके मन्दिर में दीपदान करनेके पुण्य तथा दीप-हरण करनेके दुष्परिणामोंका वर्णन किया। दीपदान करनेका तो सर्वत्र ही उत्तम फल है, परंतु सूर्यनारायणके मन्दिरमें विशेष फल है। जगत्में जो-जो अन्धा, मूक, बधिर, विवेकहीन, निन्द्य व्यक्ति दिखायी पड़ते हैं, उन सबने साधुजनोंद्वारा प्रज्वलित किये हुए दीपोंको सूर्यनारायणके मन्दिरसे हरण  किया है। (अध्याय ११९)