भविष्य पुराण

संसारके दोषोंका वर्णन

महाराज युधिष्ठिरने पूछा-भगवन् ! यह जीव किस कर्मसे देवता, मनुष्य और पशु आदि योनियों में उत्पन्न होता है ? बालभाबमें कैसे पुष्ट होता है और किस कर्मसे युवा होता है? किस कर्मके फलस्वरूप अतिशय भयंकर दारुण गर्भवासका कष्ट सहन करता है? गर्भमें क्या खाता है? किस कर्मसे रूपवान्, धनवान्, पण्डित, पुत्रवान्, त्यागी और कुलीन होता है। किस कर्मसे रोगरहित जीवन व्यतीत करता है? कैसे सुखपूर्वक मरता है। शुभ और अशुभ फलका भोग, कसे करता है? हे विमलमते! ये सभी विषय मुझे बहुत ही गहन मालूम होते हैं?

भगवान् श्रीकृष्णाने कहा-महाराज! उत्तम कर्मोसे देवयोनि, मिश्रकर्मोसे मनुष्ययोनि और पाप- कर्मोसे पशु आदि योनियों में जन्म होता है। धर्म और अधर्मक, निशयमें श्रुति ही प्रमाण है। पापसे पापयोनि और पुण्यसे पुण्ययोनि प्राप्त होती है।

 ऋतुकालके समय दोषरहित शुक्र वायुसे प्रेरित स्त्रीके रक्तके साथ मिलकर एक हो जाता है। शुक्रके साथ ही कमी के अनुसार प्रेरित जीवयोनिमें

१-पाठालमाविशतु पातु सुरेन्द्रलोकमारोह क्षितिधराभिवतिं सुमेरुम्।

मन्त्रीपश्चिप्रहरन करोतु रक्षा यदावि नद्भवति नाथ विभावितोऽस्मि ॥

(उत्तरपर्व ४१ ९५)

२ शुभर्देवत्वमाप्रोति मिहानुपात वोत् । अशुभैः कर्मभिर्ज-तुस्तिर्वयोनिषु जायते ॥

प्रमाणं श्रुतिरेयान धर्माधर्मविनिधये । याचं भान भपति पुण्यं पुण्येन कर्मणा।।

(उचस्पर्व १६-3)

प्रविष्ट होता है। एक दिनमें शुक्र और शोणित मिलकर कलल बनता है। पाँच रातमें वह कलल बुदद हो जाता है। सात रातमें बुद्धद मांसपेशी बन जाता है। चौदह दिनों में वह मांसपेशी मांस और रुधिरसे व्याप्त होकर दृढ़ हो जाता है। पचीस दिनोंमें उसमें अङ्कर निकलते हैं। एक महीने में उन अङ्करों के पाँच-पाँच भाग-ग्रीवा, सिर, कन्धे, पृष्ठवंश तथा उदर हो जाते हैं। चार मासमें वही अङ्कुरोंका भाग अँगुली बन जाता है । पाँच महीने में मुख, नासिका और कान बनते हैं। छ: महीने में दन्तपंक्तियाँ, नख और कानके छिद्र बनते हैं। सातवें महीने में गुदा, लिङ्ग अथवा योनि और नाभि बनते हैं, संधियाँ उत्पन्न होती हैं और अङ्गों में संकोच भी होता है। आठवें महीने में अङ्ग-प्रत्यङ्ग सब पूर्ण हो जाते हैं और सिरमें केश भी आ जाते हैं। माताके भोजनका रस नाभिके द्वारा बालकके शरीरमें पहुँचता रहता है, उसीसे उसका पोषण होता है। तब गर्भमें स्थित जीव सब सुख-दुःख समझता है और यह विचार करता है कि 'मैंने अनेक योनियों में जन्म लिया और बारम्बार मृत्युके अधीन हुआ तथा अब जन्म होते-ही फिर संसारके बन्धनको प्राप्त करूँगा।' इस प्रकार गर्भमें विचारता और मोक्षका उपाय सोचता हुआ जीव अतिशय दुःखी रहता है। पर्वतके नीचे दब जानेसे जितना क्लेश जीवको होता है, उतना ही जरायुसे वेष्टित अर्थात् गर्भमें होता है। समुद्र में डूबनेसे जो दुःख होता है, वही दुःख गर्भके जलमें भी होता है. तप्त लोहे के खम्भेसे बाँधनेमें जीवको जो कलेश होता है वही गर्भय जठराधिके तापसे होता है। तपायी हुई सूहयोंसे वेधनेपर जो व्यथा होती है, उससे आठ गुना अधिक गम जीवको कष्ट होता है। जीवोके लिये वाससे अधिक को रख नही है उससे भी कोटि गुना दुःख जन्म लेते समय होता है, उस दुःखसे मूर्छा भी आ जावी है। प्रबल प्रसववायुको प्रेरणासे जीव गर्भके बाहर निकलता है। जिस प्रकार कोल्लू में पीडन करनेसे तिल निस्सार हो जाते हैं, उसी प्रकार शरीर भी योनियन्त्रके पीडनसे निस्तत्त्व हो जाता है। मुखरूप जिसका द्वार है, दोनों ओष्ठ कपाट हैं, सभी इन्द्रियाँ गवाक्ष अर्थात् झरोखे हैं, दाँत, जिह्वा, गला, वात, पित्त, कफ, जरा, शोक, काम, क्रोध, तृष्णा, राग, द्वेष आदि जिसमें उपकरण हैं, ऐसे इस देहरूप अनित्य गृहमें नित्य आत्माका निवास स्थान है। शुक्र-शोणितके संयोगसे शरीर उत्पन्न होता है और नित्य ही मूत्र, विष्ठा आदिसे भरा रहता है। इसलिये यह अत्यन्त अपवित्र है। जिस प्रकार विष्ठासे भरा हुआ घट बाहर धोनेसे शुद्ध नहीं होता, इसी प्रकार यह देह भी स्नान आदिके द्वारा पवित्र नहीं हो सकता। पञ्चगव्य आदि पवित्र पदार्थ भी इसके संसर्गसे अपवित्र हो जाते हैं। इससे अधिक और कौन अपवित्र पदार्थ होगा। उत्तम भोजन, पान आदि देहके संसर्गसे मलरूप हो जाते हैं, फिर देहको अपवित्रताका क्या वर्णन करें। देहको बाहरसे जितना भी शुद्ध करें, भीतर तो कफ, मूत्र, विष्ठा आदि भरे ही रहेंगे। सुगन्धित तेल देहमें मलते रहें, परंतु कभी इस देहकी मलिनता कम नहीं होती। यह आश्चर्य है कि मनुष्य अपने देहका दुर्गन्ध सँघकर, नित्य अपना मल मूत्र देखकर और नासिकाका मल निकालकर भी इस देहसे विरक्त नहीं होता और उसे देहसे घृणा उत्पन्न नहीं होती। यह मोहका ही प्रभाव है कि शरीरके दोष और दुर्गन्ध देख-सूंघकर भी इससे ग्लानि नहीं होती। यह शरीर स्वभावत: अपवित्र है। यह केलेके वृक्षकी भांति केवल त्वक् आदिसे आवृत और निस्सार है। जन्म होते ही बाहरकी वायुके स्पर्शसे पूर्वजन्मों का ज्ञान नष्ट हो जाता है और पुन: संसारके व्यवहारमें आसक्त हो अनेक दुष्कर्ममें रत हो जाता है और अपनेको तथा परमेश्वरको भूल जाता है। आँख रहते हुए भी नहीं देख पाता, बुद्धि रहते हुए भी भले-बुरेका निर्णय नहीं कर पाता। राग तथा लोभ आदिके वशीभूत होकर वह संसारमें दुःख प्राप्त करता रहता है। सूखे मार्गमें, भी पैर फिसलते हैं, यह सब मोहकी ही महिमा है। दिव्यदर्शी महर्षियोंने इस गर्भका वृत्तान्त विस्तृत रूपसे वर्णन किया है। इसे सुनकर भी मनुष्यको वैराग्य उत्पन्न नहीं होता और अपने कल्याणका मार्ग नहीं सोचता यह बड़ा ही आश्चर्य है।

बाल्यावस्थामें भी केवल दुःख ही है। बालक अपना अभिप्राय भी नहीं कह सकता और जो चाहता है, वह नहीं कर पाता, वह असमर्थ रहता है। इससे नित्य व्याकुल रहता है। दाँत आनेके समय बालक बहुत क्लेश भोगता है और भाँति-भाँतिके रोग तथा बालग्रह उसे सताते रहते हैं। वह क्षुधा- तृष्णासे पीड़ित होता रहता है, मोहसे विष्ठा आदिका भी भक्षण करने लगता है। कुमारावस्थामें कर्ण-वेधके समय दुःख होता है। अक्षरारम्भके समय गुरुसे भी बड़ा हो भय होता है। माता-पिता ताडन करते हैं।

युवावस्थामें भी सुख नहीं है। अनेक प्रकारकी ईर्ष्या मनमें उपजती है। मनुष्य मोहमें लीन हो जाता है। राग आदिमें आसक्त होनेके कारण दुःख होता है, रात्रिको नोंद नहीं आती और धनकी चिन्तासे दिनमेंभी चैन नहीं पड़ता। स्त्री-संसर्गमें भी कोई सुख नहीं। कुष्टी व्यक्तिके कोढ़में कीड़े पड़ जानेपर जो खुजलाहट होती है उसे खुजलानेमें जितना आनन्द होता है, उससे अधिक कामी व्यक्तिको स्त्रीसे सुख नहीं मिलया। इस तरह विचार करनेपर मालूम होता है कि स्त्रीमें कोई सुख नहीं है।

व्यक्ति मान-अपमानके द्वारा, युवावस्था-वृद्धावस्थाके द्वारा और संयोग-वियोगके द्वारा प्रस्त है तो फिर निर्विवाद सुख कहाँ? जो यौवनके कारण स्त्री-पुरुषों के शरीर परस्पर प्रिय लगते हैं, वही वार्धक्यके कारण घृणित प्रतीत होते हैं। वृद्ध हो जाने, शरीरके काँपने और सभी अङ्गोंके जर्जर एवं शिथिल हो जानेपर वह सभीको अप्रिय लगता है। जो युवावस्थाके बाद वार्धक्यमें अपनेमें भारी परिवर्तन और अपनी शक्तिहीनताको देखकर विरक्त नहीं होता-धर्म और भगवान्की ओर प्रवृत्त नहीं होता, उससे बढ़कर मूर्ख कौन हो सकता है?

बुढ़ापेमें जब पुत्र-पौत्र, बान्धव, दुराचारी नौकर आदि अवज्ञा-उपेक्षा करते हैं, तब अत्यन्त दु:ख होता है। बुढ़ापेमें वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-सम्बन्धी कार्याको सम्पन्न करने में असमर्थ रहता है। इसमें बात, पित्त आदिकी विषमतासे अर्थात् न्यूनता-अधिकता होनेसे अनेक प्रकारके रोग होते रहते हैं। इसलिये यह शरीर रोगोंका घर है। ये दुःख प्राय: सभीको समय-समयपर अनुभूत होते ही हैं, फिर उसमें विशेष कहनेको आवश्यकता ही क्या?

वास्तव में शरीरमें सैकड़ों मृत्युके स्थान जिनमें एक तो साक्षात् मृत्यु या काल है, दूसरे अन्य आने-जानेवाली भयंकर आधि-व्याधियाँ हैं, जो आधी मृत्युके समान है। आने जानेवाली

* अध्यक्तेन्द्रियवृत्तित्वाद् बाल्ये दुःखं महत्युनः ।

इच्छन्नपि न शक्नोति कर्तुं वक्तुं च सरिक्रयाम् ।।

दन्तोत्थाने महणु:खं मौलेन व्याधिना तथा ।

बालरोध विविध पीडा बालग्रहरपि।

क्रिमिभिस्तुद्यमानस्य कुष्ठिनः कामिनस्तथा ।

कण्डूयनागितापेन यद्भवेत् स्थीषु तद्धि तत् ॥

(उत्तरपर्व ४।६३-६४,७१)

आधि-व्याधियाँ तो जप-तप एवं औषध आदिसे टल भी जाती हैं, परंतु काल-मृत्युका कोई उपाय नहीं है। रोग, सर्प, शस्त्र, विष तथा अन्य घात करनेवाले बाघ, सिंह, दस्यु आदि प्राणिवर्ग ये सब भी मृत्युके द्वार ही हैं। किंतु जब रोग आदिके रूपमें साक्षात् मृत्यु पहुँच जाती है तो देव-वैद्य धन्वन्तरि भी कुछ नहीं कर पाते। औषध, तन्त्र, मन्त्र, तप, दान, रसायन, योग आदि भी कालसे ग्रस्त व्यक्तिकी रक्षा नहीं कर सकते। सभी प्राणियोंके लिये मृत्युके समान न कोई रोग है, न भय, न दुःख है और न कोई शंकाका स्थान अर्थात् केवल एकमात्र मृत्युसे ही सारे भय आदि आशंकाएँ हैं। मृत्यु पुत्र, स्त्री, मित्र, राज्य, ऐश्वर्य, धन आदि सबसे वियुक्त करा देती है और बद्धमूल वैर भी मृत्युसे निवृत्त हो जाते हैं। पुरुषको आयु सौ वर्षों की कही गयी है, परंतु कोई अस्सी वर्ष जीता है कोई सत्तर वर्ष। अन्य लोग अधिक-से-अधिक साठ वर्षतक ही जीते हैं और बहुत-से तो इससे पहले ही मर जाते हैं। पूर्वकर्मानुसारं मनुष्यकी जितनी आसु निशित है, उसका आधा समय तो रात्रि ही सोनेमें हर लेती है। बीस वर्ष बाल्य और बुढ़ापेमें व्यर्थ चले जाते हैं। युवा अवस्थामें अनेक प्रकारको चिन्ता और कामको व्यथा रहती है। इसलिये वह समय भी निरर्थक ही चला जाता है। इस प्रकार यह आयु समा हो जाती है और मृत्यु आ पहुँचती है। सरणके समय जो दुःख होता है, उसकी कोई उपमा नहीं। हे मातः । हे पितः । हे कान्त। आदि चिल्लाते व्यक्तिको भी मृत्यु बैसे ही पकड़ ले जाती है, जैसे मेडकको सर्प पकड़ लेता है। व्याधिसे पीड़ित व्यक्ति खाटपर पड़ा इधर उधर हाथ पैर पटकता रहता है और साँस लेता रहता है। कभी पारसे भूमिपर और कभी भूमिसे

खाटपर जाता है, परंतु कहीं चैन नहीं मिलता। कण्ठमें घर-घरै शब्द होने लगता है। मुख सूख जाता है। शरीर मूत्र, विष्ठा आदिसे लिप्त हो जाता है। प्यास लगनेपर जब वह पानी माँगता है तो दिया हुआ पानी भी कण्ठतक ही रह जाता है। वाणी बंद हो जाती है, पड़ा-पड़ा चिन्ता करता रहता है कि मेरे धनको कौन भोगेगा? मेरे कुटुम्बकी रक्षा कौन करेगा? इस तरह अनेक प्रकारकी यातना भोगता हुआ मनुष्य मरता है और जीव इस देहसे निकलते ही जोंककी तरह दूसरे शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है। मृत्युसे भी अधिक दुःख विवेकी पुरुषोंको याचना अर्थात् माँगने में होता है । मृत्युमें तो क्षणिक दुःख होता है, किंतु याचनासे तो निरन्तर ही दुःख होता है। देखिये, भगवान् विष्णु भी बलिसे माँगते ही वामन (अत्यन्त छोटे) हो गये। फिर और दूसरा है ही कौन जिसको प्रतिष्ठा याचनासे न घटे । आदि, मध्य और अन्तमें दुःखकी ही परम्परा है। अज्ञानवश मनुष्य दु:खोंको झेलता हुआ कभी आनन्द नहीं प्राप्त करता। बहुत खाये तो दुःख, थोड़ा खाये तो दुःख, किसी समय भी सुख नहीं है। क्षुधा सब रोगों में प्रबल है और वह अन्नरूपी ओषधिके सेवनसे थोड़ी देरके लिये शान्त हो जाती है, परंतु अन्न भी परम सुखका साधन नहीं है। प्रातः उठते ही मूत्र, विष्ठा आदिकी बाधा, मध्याह्नमें क्षुधा-तृषाकी पीड़ा और पेट भरनेपर कामको ब्यथा होती है। रात्रिको निद्रा दुःख देती है। धनके सम्पादनमें दु:ख, सम्पादित धनकी रक्षा करने में दुःख, फिर उसके व्यय करनेमें अतिशय दुःख होता है। इससे धन भी सुखदायक नहीं है। चोर, जल, अगि, राजा और स्वजनोंसे भी धनवालोंको अधिक भय रहता है। मासको आकाशम फेंकनेपर पक्षी, भूमिपर कुले आदि जोव और जलमें मछली आदि खा जाते है, इसी प्रकार धनवान्की भी सर्वत्र यही स्थिति होती है। सम्पत्तिके अर्जन करने में दुःख, सम्पत्तिकी प्राप्तिके बाद मोहरूपी दुःख और नाश हो जानेपर तो अत्यन्त दुःख होता ही है, इसलिये किसी भी कालमें धन सुखका साधन नहीं है। धन आदिकी कामनाएँ ही दुःखका परम कारण हैं, इसके विपरीत कामनाओंसे नि:स्पृह रहना परम सुखका मूल है*।

हेमन्त ऋतुमें शीतका दु:ख, ग्रीष्ममें दारुण तापका दुःख और वर्षा ऋतुमें झंझावात तथा वर्षाका दुःख होता है। इसलिये काल भी सुखदायक नहीं है। विवाहमें दुःख और पतिके विदेश-गमनमें दुःख, स्त्री गर्भवती हो तब दुःख, प्रसवके समय दुःख, संतानके दन्त, नेत्र आदिकी पीड़ासे दु:ख। इस प्रकार स्त्री भी सदा व्याकुल रहती है। कुटुम्बियोंको यह चिन्ता रहती है कि गौ नष्ट हो गयी, खेती सूख गयो, नौकर चला गया, घरमें मेहमान आया है, स्त्रीके अभी संतान हुई है, इसके लिये रसोई कौन बनायेगा, कन्याके विवाह आदिको चिन्ता-इस प्रकार हजारों चिन्ताएँ कुटुम्बियोंके कारण लगी रहती हैं, जिनसे उनके शील, शुद्ध बुद्धि और सम्पूर्ण गुण नष्ट हो जाते हैं। जिस तरह कच्चे घड़े में जल डालते ही घटके साथ जल नष्ट हो जाता है, उसी तरह गुणोसहित कुटुम्बी मनुष्यका देह नष्ट हो जाता है।

राज्य भी सुखका साधन नहीं है। जहाँ नित्य सन्धि-विग्रहकी चिन्ता लगी रहती है और पुत्रसे भी राज्यके ग्रहणका भय बना रहता है, वहाँ सुखका लेश भी नहीं है। अपनी जातिसे भी सबको भय होता है। जिस प्रकार एक मासखण्डके अभिलाषी कुत्तोंको परस्पर भय रहता है, वैसे ही संसारमें कोई सुखी नहीं है। ऐसा कोई राजा नहीं जो सबको जीतकर सुखपूर्वक राज्य करे, प्रत्येकको दूसरेसे भय रहता है। इतना कहकर श्रीकृष्णभगवान्ने पुन: कहा कि 'महाराज! यह कर्ममय शरीर जन्मसे लेकर अन्ततक दुःखी ही है। जो पुरुष जितेन्द्रिय हैं और व्रत, दान तथा उपवास आदिमें तत्पर रहते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं।' (अध्वाय ४)