भविष्य पुराण

सुकृत-द्वादशीके प्रसंगमें सीरभद्र वैश्यकी कथा

राजा युधिष्ठिरने पूछा-श्रीकृष्णचन्द्र! ऐसा कौन-सा कर्म है, जिसके करनेसे सभी कष्ट दूर हो जायें तथा कोई संताप भी न हो।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज! आपने जो पूछा है, उस विषयमें एक आख्यानका वर्णन करता हूँ। पूर्वकालमें विदिशा (भेलसा) नगरीमें सौरभद्र नामक एक वैश्य रहता था। वह पुत्र-पौत्र, कन्या, स्त्री आदिके भरण-पोषणमें ही लगा रहता था, फलस्वरूप स्वप्न में भी उसे परलोकको चिन्ता नहीं होती थी। वह न्याय-अन्याय हर तरहसे धनका ही उपार्जन करता, कभी दान, हवन, देवपूजन आदि कर्मका नाम भी नहीं लेता था। नित्य नैमित्तिक कर्मोका लोप उसने स्वयं कर लिया था। कुछ कालके अनन्तर वह वैश्य मृत्युको प्राप्त हुआ और विन्ध्यारण्यमें यातना-देहमें प्रेतरूपसे रहने लगा। एक दिन ग्रीष्म ऋतु में विपीत नामके वेदवेता ब्राह्मणने उस प्रेतको देखा कि वह सूर्य-किरणोंसे संतप्त नदीके  बालूमें लोट रहा है, उसके सब अङ्गोंमें छाले पड़ गये हैं। प्याससे कण्ठ सूख रहा है और जिह्वा लटक गयी है । वह लम्बी-लम्बी साँस ले रहा है। उसकी यह दशा देखकर ब्राहाणको बड़ी दया आयी और उसने उसका वृत्तान्त पूछा।

प्रेत कहने लगा-ब्रह्मन् ! मैं पूर्व-जन्ममें परलोकके लिये किसी प्रकारके कर्म न करनेके कारण ही दग्ध हो रहा हूँ। मैं निरन्तर धन, घर, खेत, पुत्र, स्त्री आदिको चिन्तामें ही आसक्त रहता था और मैंने अपने वास्तविक हितका चिन्तन कभी नहीं किया। इसीसे यह कष्ट भोग रहा हूँ।' यह काम कर लिया और यह काम करना है'- इसी उधेड़बुनाई सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करनेका ही यह फल है। लोभवश मैं शीत-उष्ण सभी प्रकारके कष्टोंको झेल रहा हूँ। मैंने धर्मके लिये किंचित् भी कष्ट नहीं झेला, उससे अब पछताता हूँ। देवता, पितर, अतिथि आदिका मैंने कभी पूजन नहीं किया और यही कारण है कि अब मुझे अन्न-जलतक नहीं मिल रहा है। अन्यायके द्वारा एकत्र किये गये धनका उपभोग दूसरे लोग कर रहे होंगे, यह सोच-सोचकर मुझे चैन नहीं मिलता। मैंने कभी ब्राह्मणोंका पूजन नहीं किया और न ही कभी देवार्चन ही किया। फलस्वरूप मेरी ऐसी दशा हुई है। चूंकि मैंने पापोंका ही संचय किया, अत: मैं उसके फलको अकेले ही भोग रहा हूँ। मैं अपने किये दुष्कर्मोंका ही फल भोग रहा हूँ। अत: हे मुनीश्वर! यदि ऐसा कोई उपाय हो तो आप उसे बतायें, जिससे इस दुर्गतिसे मेरा उद्धार हो।

विपीतमुनि बोले-सीरभद्र ! दस जन्म पहले तुमने भगवान् अच्युतकी आराधनाकी इच्छासे सुकृत- द्वादशीका उपवास किया था, उसके प्रभावसे इस पापके बहुत बड़े भागका क्षय हो गया है, अब तुम्हें अल्यकालमें ही उत्तम गति प्राप्त होगी। यह द्वादशी व्रत पापोंका क्षय तथा पुण्यका संचार करनेवाला है, इसी कारण इसका नाम सुकृत द्वादशी है । इस तरह सीरभद्रको आश्वस्त कर विपीतमुनि अपने आश्रमको चले गये और सीरभद्र भी द्वादशीव्रतके फलस्वरूप थोडे कालके अनन्तर मोक्षको प्राप्त हो गया।

इतना कहकर श्रीकृष्णभगवान् बोले- हे महाराज ! यह उपवासका प्रभाव है कि इतना पाप थोड़े ही कालमें क्षय हुआ, इसलिये मनुष्यको पुण्यके लिये सदा यत्न करना चाहिये और अपने कल्याणके लिये उपवासादि करते रहना चाहिये

राजा युधिष्ठिरने पूछा- श्रीकृष्णचन्द्र ! पापोंसे अति दारुण नरककी यातना भोगनी पड़ती है। ऐसा कौन-सा व्रत है, जिससे सब पाप नष्ट हो जायँ और मोक्ष प्रास हो।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी एकादशीको उपचास कर काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ आदिका त्यागकर संसारकी असारताकी भावना करता हुआ 'ॐ नमो नारायणाय' इस अष्टाक्षर-मन्त्रका जप करना चाहिये और इसी भाँति द्वादशीको भी भगवान् मधुसूदनको पूजा आदि करनी चाहिये। प्रथम चार (फाल्गुनसे ज्येष्ठ) मासके पारणमें चाँदी, ताँबे अथवा मृत्तिकाके पात्रोंमें यव भरकर ब्राह्मणोंको देना चाहिये। आषाढ़ादि द्वितीय पारणमें घृतपात्र देना चाहिये और कार्तिकादि चार मासमें तिलपात्र ब्राह्मणोंको अर्पण करना चाहिये। भगवान्को पूजाके अनन्तर उनके अनुग्रहकी प्राप्तिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये। तदनन्तर भोजन करना चाहिये। वर्ष पूरा होनेपर सुवर्णकी विष्णु-प्रतिमा बनवाकर उसे पूजित कर वस्त्र, सुवर्ण, दक्षिणासहित सवत्साधेनु ब्राह्मणोंको देना चाहिये। इस विधिसे जो पुरुष अधवा स्त्री इस सुकृत-द्वादशीका व्रत करता है, वह कभी नरकको नहीं प्राप्त होता। नारायपाके भक्तको कभी नरककी बाधा नहीं होती। विष्णुका नाम उच्चारण करते ही समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, फिर नरकके भयका तो प्रश्न ही नहीं उठता। इसी प्रकार वासुदेव नारायणके नामों का उच्चारण करनेवाला कभी भी यमका मुख नहीं देखता। अत: भगवान्के पवित्र नामोंका उच्चारण करना चाहिये। (अध्याय ८२)