भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! अब मैं परमोत्तम शर्कराचल-दानका वर्णन कर रहा हूँ। जिससे भगवान् विष्णु, रुद्र और सूर्य सदा संतुष्ट रहते हैं। आठ भारका शर्कराचल उत्तम, चार भारका मध्यम और दो भारका अधम कहा गया है। जो मानव स्वल्प सम्पत्तिवाला हो, वह एक भार अथवा आधे भारका भी शर्कराचल बनवा सकता है। प्रधान पर्वतके चतुर्थाशसे विष्कम्भपर्वतोंका भी निर्माण करना चाहिये। पुनः धान्यपर्वतकी तरह सारी सामग्री प्रस्तुत करके मेरुपर्वतकी भाँति इसके ऊपर भी स्वर्णमयी देवमूर्तिके साथ मन्दार, पारिजात और कल्पवृक्ष-इन तीनों वृक्षोंकी भी स्वर्णनिर्मित मूर्ति स्थापित करे। इन तीनों वृक्षोंको प्रायः सभी पर्वतोंपर स्थापित कर देना चाहिये। सभी पर्वतोंके पूर्व और पश्चिम भागमें हरिचन्दन और कल्पवृक्षको निविष्ट करना चाहिये। शर्कराचलमें तो इसका विशेषरूपसे ध्यान रखना चाहिये। कदम्ब-वृक्षके नीचे 'मन्दराचलपर कामदेवकी मूर्ति, जम्बू वृक्षके नीचे गन्धमादनके शिखरपर भगवान् विष्णुकी मूर्ति, विपुलाचलपर सोनेकी हंसकी मूर्ति पूर्वाभिमुखी और स्वर्णमयी गौकी मूर्ति दक्षिणाभिमुखी होनी चाहिये।
तत्पश्चात् आवाहन, यज्ञ आदि सारा विधान धान्यपर्वतकी तरह करके अन्तमें इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए बीचका प्रधान पर्वत गुरुको और चारों विष्कम्पपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे। वे मन्त्र इस प्रकार हैं-
सौभाग्यामृतसारोऽयं परमः शर्करायुतः ॥
यस्मादानन्दकारी त्वं भव, शैलेन्द्र सर्वदा।
अमृतं पिखतां ये तु निष्पेतुर्भुवि शीकराः॥
देवानां तत्समुत्थोऽसि पाहि नः शर्कराचल।
मनोभवधनुर्मध्यादुद्भूता शर्करा यतः ॥
तन्मयोऽसि महाशैल पाहि संसारसागरात्।
(उत्तरपर्व २०४।१०-१३)
'शैलेन्द्र ! यह शक्करद्वारा निर्मित पर्वत सौभाग्य और अमृतका सार है, इसलिये तुम मेरे लिये सदा आनन्दकारक होओ। शर्कराचल! देवताओं के अमृतपान करते समय जो बूंदें भूतलपर टपक पड़ी थीं, उन्हींसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई है, अत: तुम हमारी रक्षा करो। महाशैल! चूँकि शर्करा कामदेवके धनुषके मध्यभागसे प्रादुर्भूत हुई है और तुम शर्करामय हो, इसलिये संसारसागरसे मुझे बचाओ।'
जो मनुष्यं इस विधिके अनुसार शर्कराशैलका दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको प्राप्त हो जाता है। वहाँ वह भगवान् विष्णुकी आज्ञासे अपने आश्रितोंके साथ हो सूर्य, चन्द्र और तारागणोंके समान कान्तिमान् विमानपर आरूढ होकर सुशोभित होता है। पुनः सौ कल्पोंके बाद तीन अयुत जन्मोंतक भूतलपर दीर्घायु और नीरोगतासे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधिपति होता है। सभी पर्वतदानों में मत्सररहित होकर अपनी शक्तिके अनुसार भोजन करानेका विधान है। गुरुकी आज्ञासे अपनी शक्तिके अनुकूल स्वयं क्षार (नमक) रहित भोजन करना चाहिये। पुनः पर्वतदानको सारी सामग्री ब्राह्मणके घर स्वयं भेजवा देनी चाहिये।
राजन् ! अब आप लवणाचल-दानकी महिमामें एक आख्यान सुने-पहले नहाकल्प धर्ममूर्विनामक एक राजा हुआ था। उसके तेजके सामने सूर्य और चन्द्रमा आदि भी कान्तिहीन हो जाते थे। वह इन्द्रका मित्र था। उसने हजारों दैत्योंका वध किया था। वह इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाला मनुष्य होनेपर भी किसीसे परास्त नहीं हुआ, अपितु उसके द्वारा सैकड़ों शत्रु पराजित हो चुके थे। उसकी पत्नीका नाम भानुमती था। वह त्रिलोकीमें सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी थी। उसने सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मीके समान अपने दिव्य रूपसे देवाङ्गनाओंको भी पराजित कर दिया था। वह दस हजार नारियोंके बीच में लक्ष्मीकी तरह सुशोभित होती थी। राजा धर्ममूर्तिकी वह पटरानी उसे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी।एक बार सभामण्डपमें पधारे अपने पुरोहित महर्षि वसिष्ठसे उस राजाने विस्मय-विमुग्ध हो ऐसा प्रश्न किया-
'भगवन् ! किस धर्मके प्रभावसे मुझे सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई है तथा किस धर्मके फलस्वरूप मेरे शरीरमें सदा प्रचुरमात्रामें उत्तम तेज विराजमान रहता है?'
वसिष्ठजीने कहा-राजन्! पूर्वकालमें लीलावती नामकी एक वेश्या थी। वह शिवजीकी भक्त थी। उसने चतुर्दशी तिथिके दिन विधिपूर्वक अपने गुरुको स्वर्णमय वृक्ष आदि उपकरणोंसहित लवणाचलका दान किया था। उन दिनों लीलावतीके घर एक शूद्रजातीय शौण्ड नामक सोनार नौकर था। भूपाल ! उसने ही श्रद्धापूर्वक सुवर्णद्वारा वृक्षों और प्रधान देवताओंकी मूर्तियोंका निर्माण किया था। उसने बिना कुछ पारिश्रमिक लिये उन मूर्तियोंको गढ़कर अत्यन्त सुन्दर बनाया था और यह धर्मका कार्य है-ऐसा जानकर किसी भी प्रकारका कुछ वेतन भी उसने नहीं लिया था। पृथ्वीपते। उस स्वर्णकारकी पत्नीने भी उन सुवर्णनिर्मित देवों एवं वृक्षोंकी मूर्तियाँको रगड़कर चमकीला बनाया था और लीलावतीके पर्वतदानमें बड़ी परिचर्या की थी। उन दोनोंकी सहायतासे लीलावतीने गुरुशुश्रूषा आदि कार्योंको सम्पन्न किया था। अधिक कालके व्यतीत होनेपर वह वेश्या लीलावती समस्त पापोंसे मुक्छ होकर शिवलोकको चली गयी। यह सोनार, जो दरिद्र होते हुए भी अत्यन्त सामर्थ्यशाली था और जिसने वेश्यासे कुछ भी मूल्य नहीं लिया था, इस समय इस जन्ममें तुम हो, जो दस हजार सूर्योक समान कान्तिमान् और सातों द्वीकि अधीश्वररूपसे उत्पन्न हुए हो। सोनारकी जिस पत्रीने स्वर्णनिर्मित वृक्षों एवं देवमूर्तियोंको अत्यन्त चमकीला बनाया था, वही यह भानुमती तुम्हारी पटरानी है। मूर्तियोंको उज्ज्वल करनेके कारण इसे इस जन्ममें सुन्दर गौरवर्णका शरीर और भुवनेश्वरीका पद प्राप्त हुआ है। चूँकि तुम दोनोंने दत्तचित्त होकर रात्रिमें लवणाचलके दान-प्रसंगमें सहायकरूपसे कर्म किया था, इसीलिये तुम्हें लोकमें अजेयता, नीरोगता, सौभाग्यसम्पन्नता और लक्ष्मीको प्राप्ति हुई है। इस कारण तुम भी इस जन्ममें विधानपूर्वक दस प्रकारके धान्याचल आदि पर्वतोंका दान करो। तब राजा धर्ममूर्तिने 'ऐसा ही करूंगा।' कहकर वसिष्ठजीके वचनोंका आदर किया और सैकड़ों बार धान्याचल आदि सभी पर्वतोंका दान किया, जिसके फलस्वरूप देवगणोंद्वारा पूजित होकर भगवान् पुरारिके लोकको प्राप्त हुआ। निर्धन मनुष्य भी यदि उत्कृष्ट भक्तिपूर्वक इन पर्वतदानोंको देखता है, मनुष्योंद्वारा दान करते समय उनका स्पर्श कर लेता है, उनकी कथाएँ सुनता है और उन्हें करनेके लिये सम्मति देता है तो वह भी पापरहित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है। नृपश्रेष्ठ ! जब इस लोकमें मनुष्यद्वारा भव-भयको विदीर्ण करनेवाले इन शैलेन्द्रोंके प्रसंगका पाठ करनेसे दुःस्वप्न शान्त हो जाते हैं, मनुष्य स्वयं शान्तचित्तसे विधिपूर्वक इन सम्पूर्ण पर्वतदानोंको करता है, वह विष्णुलोक तथा शिवलोकको प्राप्त करता है तो इसमें क्या आश्चर्य? (अध्याय २०४)