भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! अब मैं गोविन्द-शयन नामक व्रतका वर्णन कर रहा हूँ और कटिदान, समुत्थान एवं चातुर्मास्यव्रतका भी वर्णन करता हूँ, उसे आप सुनें।
युधिष्ठिरने पूछा-महाराज! यह देव-शयन क्या है ? जब देवता भी सो जाते हैं, तब संसार कैसे चलता है? देव क्यों सोते हैं? और इस व्रतका क्या विधान है-इसे कहें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा- भगवान् सूर्यके मिथुन राशिमें आनेपर भगवान् मेधुसूदनको मूर्तिको शयन करा दे और तुलाराशिमें सूर्यके जानेपर पुन: भगवान् जनार्दनको शयनसे उठाये। अधिास आनेपर भी यही विधि.है। अन्य प्रकारसे न तो हरिको शयन कराये और न उन्हें निद्रासे उठाये। आषाढ़ मासके शुम्न पक्षकी देवशयनी एकादशीको उपवास करे। भक्तिमान् पुरुष शुक्ल वस्वसे आच्छादित तकियेसे युक्त उत्तम शय्यापर पीताम्बरधारो, सौम्य, शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णुको शयन कराये। इतिहास और प्राणवेत्ता विष्णभक्त पुरुष दही, दूध, शहद, घी और जलसे भगवान् को प्रतिभाको सान कराकर धूप कूंकुम तथा वस्त्रोंसे अलंकृत कर निम्नलिखित मन्त्रसे प्रार्थना करे-
सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत् सर्वं चराचरम्॥
(उत्तरपर्व ७० । १०)
'हे जगन्नाथ! आपके सो जानेपर यह सारा जगत् सुप्त हो जाता है और आपके जग जानेपर सम्पूर्ण चराचर जगत् प्रबुद्ध हो जाता है।'
महाराज! इस प्रकार भगवान् विष्णुकी प्रतिमाको शय्यापर स्थापित कर उसीके सम्मुख वाणीपर नियन्त्रण रखनेका और अन्य नियमोंका व्रत ग्रहण करे। वर्षके चार मासतक देवाधिदेवके शयन और उसके बाद उत्थापनकी विधि कही गयी है। राजन्! इस व्रतके त्यागने एवं ग्रहण करने योग्य पदार्थोके अलग-अलग नियमोंको आप सुनें। गुडका परित्याग करनेसे व्रती अगले जन्ममें मधुर वाणीवाला राजा होता है। इसी प्रकार चार मासतक तेलका परित्याग करनेवाला सुन्दर शरीरवाला होता है। कटु तैलका त्याग करनेसे उसके शत्रुओंका नाश होता है। महुएके तेलका त्याग करनेसे अतुल सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। पुष्प आदिके भोगका परित्याग करनेसे स्वर्गमें विद्याधर होता है। इन चार मासोंमें जो योगका अभ्यास करता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त करता है। कडुवा, खट्टा, तीता, मधुर, क्षार, कषाय आदि रौंका जो त्याग करता है, वह वैरूप्य और दुर्गतिको कभी भी प्राप्त नहीं होता। ताम्बूलके त्यागसे श्रेष्ठ भोगोंको प्राप्त करता है और मधुर कण्ठवाला होता है। घृतके त्यागसे रमणीय लावण्य और सभी प्रकारकी सिद्धिको प्राप्त करता है। फलका त्याग करनेसे बुद्धिमान् होता है और अनेक पुोंकी प्राप्ति होती है। पत्तोंका साग खानेसे रोगी, अपक्व अन्न खानेसे निर्मल शरीरसे युक्त होता है। तैल-मर्दनके परित्यागसे व्रती दीप्तिमान, दीप्तकरण, राजाधिराज धनाध्यक्ष कुबेरके सायुज्यको प्राप्त करता है। दही, दूध, तक्र (मट्ठा) के त्यागका नियम' लेनेसे मनुष्य गोलोकको प्रास करता है। स्थालीपाकका परित्याग करनेपर इन्द्रका अतिथि होता है । तापपक्व वस्तुके भक्षणका नियन लेने पर दीर्घायु संतानकी प्राप्ति होती है। पृथ्वीपर शयनका नियम लेनेसे विष्णुका भक्त होता है।
हे धर्मनन्दन! इन वस्तुओंके परित्यागसे धर्म होता है। नख और केशोंके धारण करनेपर्, प्रतिदिन गङ्गा-स्रान करनेपर एवं मौनव्रती रहनेपर उसको आज्ञाका कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता। जो सदा पृथ्वीपर भोजन करता है, वह पृथ्वीपति होता है। 'ॐ नमो नारायणाय' इस अष्टाक्षर- मन्यका निराहार रहकर जप करने एवं भगवान् विधाक चरणोंको बन्दना करनेसे गोदानजन्य फल नईला है। भगवान विष्णुके चरणोदकके संस्पर्शसे अनुष्य कमान्य हो जाता है। चातुर्मास्यमें भगवान् याक मन्दिर में उपलेपन और अर्चना करनेसे सायकलपन्न स्थायी राजा होता है, इसमें संशय नहीं है। स्तुतिपाठ करता हुआ जो सौ बार भगवान् विष्णुकी प्रदक्षिणा करता है एवं पुष्प, माला आदिसे पूजा करता है, वह हंसयुक्त विमानके द्वारा विष्णुलोकको जाता है। विष्णु-सम्बन्धी गान और वाद्य करनेवाला गन्धर्वलोकको प्राप्त होता है। प्रतिदिन शास्त्र-चर्चासे जो लोगोंको ज्ञान प्रदान करता है, वह व्यासरूपी भगवान्के रूपमें मान्य होता है और अन्तमें विष्णुलोकको जाता है। नित्य स्नान करनेवाला मनुष्य कभी नरकोंमें नहीं जाता। भोजनका संयम करनेवाला मनुष्य पुष्करक्षेत्रमें स्नान करनेका फल प्रास करता है। भगवत्सम्बन्धी लीला-नाटक आदिका आयोजन करनेवाला अप्सराओंका राज्य प्राप्त करता है। अयाचित भोजन करनेवाला श्रेष्ठ बावली और कुंआ बनानेका फल प्रास करता है। दिनके छठे (अन्तिम) भागमें अन्नके भक्षण करनेसे मनुष्य स्थायीरूपसे स्वर्ग प्राप्त करता है। पत्तलमें भोजन करनेवाला मनुष्य कुरुक्षेत्रमें वास करनेका फल प्राप्त करता है। शिलापर नित्य भोजन करनेसे प्रयागमें स्नान करनेका फल प्राप्त करता है। दो प्रहरतक जलका त्याग करनेसे कभी रोगी नहीं होता।
हे पार्थ! चातुर्मास्यमें इस प्रकारके व्रत एवं नियमोंके पालनसे साधक पूर्ण संतोषको प्राप्त करता है अर्थात् सभी प्रकार सुखी एवं संतुष्ट हो जाता है। गरुडध्वज जगन्नाथके शयन करनेपर चारों वर्णोकी विवाह, यज्ञ आदि सभी क्रियाएँ सम्पादित नहीं होती। विवाह, यज्ञोपवीतादि संस्कार, दीक्षा ग्रहण, यज्ञ, गृहप्रवेशादि, गोदानं, प्रतिष्ठा एवं जितने भी शुभ कर्म हैं, वे सभी चातुर्मास्यमें त्याज्य हैं। संक्रान्तिरहित मासमें अर्थात् मलमासमें देवता एवं पितरोंसे सम्बन्धित कोई भी क्रिया सम्पादित नहीं की जानी चाहिये। भाद्रपद मासके
*भाद्रपदमें दही और आश्विनमें दूधका परित्याग करना चाहिये।
शुक्ल पक्षकी एकादशीको भगवान् विष्णुका कटिदान होता है अर्थात् करवट बदलनेकी क्रिया सम्पन्न करनी चाहिये। इस दिन महापूजा करनी चाहिये।
राजन्! अब इस विष्णु-शयनका कारण सुनिये। किसी समय तपस्याके प्रभावसे हरिको संतुष्टकर योगनिद्राने प्रार्थना की कि भगवन्! आप मुझे भी अपने अङ्गोंमें स्थान दीजिये। तब मैंने देखा कि मेरा सम्पूर्ण शरीर तो लक्ष्मी आदिके द्वारा अधिष्ठित है। लक्ष्मीके द्वारा उर:स्थल, शङ्ख, चक्र, शार्ङ्गधनुष तथा असिके द्वारा बाहु, वैनतेयके द्वारा नाभिके नीचे के अङ्ग, मुकुटसे सिर, कुण्डलोंसे कान अवरुद्ध हैं। इसलिये मैंने संतुष्ट होकर नेत्रोंमें आदरसे योगनिद्राको स्थान दिया और कहा कि तुम वर्षमें चार मास मेरे आश्रित रहोगी। यह सुनकर प्रसन्न होकर योगनिद्राने मेरे नेत्रों में वास किया। मैं उस मनस्विनीको आदर देता हूँ। योगनिद्रामें जब मैं क्षीरसागरमें इस महानिद्रारूपी शेषशय्याघर शयन करता हूँ, उस समय ब्रहाके सानिध्यमें भगवती लक्ष्मी अपने करकमलोंसे मेरे दोनों चरणोंका मर्दन करती हैं और क्षीरसागरको लहरें मेरे चरणोंको धोती हैं। हे पाण्डवश्रेष्ठ ! जो मनुष्य इस चातुर्मास्यके समय अनेक व्रत नियमपूर्वक रहता है, वह कल्यपर्यन्त विष्णुलोकमें निवास करता है। इसमें संशय नहीं। शङ्ख, चना, गदाधारी भगवान् विष्णु कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी एकादशीमें जागते हैं, उसकी व्रत-विधि आप सुनिसे। भगवान् को इस मन्त्रसे जगाना चाहिये
'इदं विष्णुर्वि चक्रमे बेधा नि दधे पदम्। समूढमस्य पा सुरे स्वाहा।।
(यजु० ५।१५) अपने आसनपर विष्णुके जानेपर संसारको सभी धार्मिक क्रियाएँ प्रवृत्त हो जाती है। शङ्ख, मृदंग आदि वाद्योंको ध्वनि एवं 'जयघोषके साथ भगवान्को रात्रिमें रषपर मैठाकर घुमाना चाहिये। देवदेवेशके उठनेपर नगरको दीपादिसे देदीप्यमान कर नृत्य-गीत-वाघ आदिसे मङ्गलोत्सन करना चाहिये। धरणीधर दामोदर भगवान् विष्णु उठकर जिस-जिसको देखते हैं, उस समय उन्हें प्रदत्त सभी वस्तुएँ मानवको स्वर्गमें प्राप्त होती हैं। एकादशीके दिन रात्रिमें मन्दिरमें जागरण करे। द्वादशीमें प्रात:काल स्वच्छ जलसे स्नानकर विष्णुकी पूजा करे। अग्निमें घृत आदि हव्य द्रव्योंसे हवन करे, अनन्तर स्रानकर ब्राह्मणको विशिष्ट अन्नोंका भोजन कराये। घी, दही, मधु, गुड आदिके द्वारा निर्मित मोदकको भोजनके लिये समर्पित करे। यजमान भी प्रसत्रतापूर्वक संयमित होकर ग्यारह, दस, आठ, पाँच या दो विप्रोंकी पुष्प, गन्ध आदिसे विधिवत् पूजा करे। श्रेष्ठ संन्यासियोंको भी भोजन कराये और संकल्पमें त्यक्त पदार्थ तथा अभीष्ट पत्र-पुष्प आदि दक्षिणाके साथ देकर उन्हें बिदा करे। अनन्तर स्वयं भोजन करना चाहिये। जिस वस्तुको चार मासतक छोड़ा है, उसे भी खाना चाहिये। ऐसा करनेसे धर्मकी प्राप्ति होती है। अन्तमें व्रती विष्णुपुरी (वैकुण्ठ)-को प्राप्त करता है। जिस व्यक्तिका चातुर्मास्यव्रत निर्विन सम्पन्न होता है, वह कृतकृत्य हो जाता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। हे पार्थ! जो देवशयन-व्रतको विधिपूर्वक सम्पन्न करता हुआ अन्तमें भगवान् विष्णुको जगाता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। इस माहात्म्यको जो मनुष्य ध्यानसे सुनता है, स्तुति करता एवं कहता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। क्षीरसागरमें भगवान् अनन्त जिस दिन सोते हैं और जागते हैं, उस दिन अनन्यचित्तसे उपवास करनेवाला पुरुष सद्गतिको प्राप्त करता है।' (अध्याय ७०)