भविष्य पुराण

श्राद्धके विविध भेद तथा वैश्वदेव-कर्मकी महिमा

भगवान् सूर्यने अनूरु ( अरुण)-से कहा- अरुण! द्विजमात्रको विधिपूर्वक पञ्चमहायज्ञ-भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, दैवयज्ञ और मनुष्ययज्ञ करना चाहिये। बलिवैश्वदेव करना भूतयज्ञ, तर्पण करना पितृयज्ञ, वेदका अध्ययन और अध्यापन करना ब्रह्मयज्ञ, हवन करना देवयज्ञ तथा घरपर आये हुए अतिथिको सत्कारपूर्वक भोजन आदिसे संतुष्ट करना मनुष्ययज्ञ कहा जाता है।

श्राद्ध बारह प्रकारके होते हैं-नित्य-आद्ध नैमित्तिक श्राद्ध, काम्य-श्राद्ध, वृद्धि-वाद्ध सपिण्डन- श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, गोष्ठ-श्राद्ध, शुद्धि वाद्ध कर्माङ्ग श्राद्ध, दैविक वाद्ध, औपचारिक वाद्ध तथा सांवत्सरिक श्राद्ध तिल, बीहि (धान्य), जल, दूध, फल, मूल, शाक आदिसे पितरोंकी संतुष्टि के लिये प्रतिदिन नाश करना चाहिये। जो पास प्रतिदिन किया जाता है, वह नित्य श्राद्ध है। एकोद्दिष्ट श्राद्धको नैमित्ति- श्राद्ध कहते हैं। इस श्राद्धको विधिपूर्वक सम्पन्न कर अयुग्म (विषम संख्या) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। जो श्राद्ध कामनापरक किया जाता है, वह काम्य-श्राद्ध है। इसे पार्वण श्राद्धकी विधिसे करना चाहिये। वृद्धिके लिये जो श्राद्ध किया जाता है, उसे वृद्धि श्राद्ध कहते हैं। ये सभी श्राद्धकर्म पूर्वाह्न कालमें उपजीती होकर करने चाहिये। सपिण्डन श्राद्धमें चार पात्र बनाने चाहिये। उनमें सन्य, जल और तिल छोड़ना चाहिये । प्रेत मात्रका जल पित्- पात्रमें छोड़े। इसके लिये 'ये समानाः' (यजु० १९।१६) मन्त्रोका पाठ करना चाहिये। स्त्रीका भी एकोटि श्राद्ध करना चाहिये। अमावास्या तथा किसी पर्व पर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे पार्वण श्राद्ध कहते हैं। गौओंके लिये किया जानेवाला श्राद्ध-कर्म गोष्ठ श्राद्ध कहा जाता है। पितरोंकी तृप्तिके लिये सम्पत्ति और सुखकी प्राप्ति-हेतु तथा विद्वानों की संतुष्टिके निमित्त जो ब्राह्मणोंको भोजन कराया जाता है, वह शुद्ध्यर्थ-श्राद्ध है। गर्भाधान, सीमन्तोन्नयन तथा पुंसवन-संस्कारोंकि समय किया गया श्राद्ध कर्मान-श्राद्ध है। यात्रा आदिके दिन देवताके उद्देश्यसे घीके द्वारा किया गया हवनादि कार्य दैविक श्राद्ध कहलाता है। शरीरकी वृद्धि, शरीरकी पुष्टि तथा अश्ववृद्धिके निमित्त किया गया श्राद्ध औपचारिक श्राद्ध कहलाता है। सभी श्राद्धोंमें सांवत्सरिक श्राद्ध सबसे श्रेष्ठ है। इसे मृत व्यक्तिकी तिथिपर करना चाहिये। जो व्यक्ति सांवत्सरिक श्राद्ध नहीं करता, उसकी पूजा न मैं ग्रहण करता हूँ, न विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र एवं अन्य देवगण ही ग्रहण करते हैं। इसलिये प्रयत्नपूर्वक प्रत्येक वर्ष मृत व्यक्तिकी तिथिपर सांवत्सरिक श्राद्ध करना चाहिये। जो व्यक्ति माता-पिताका वार्षिक श्राद्ध नहीं करता, वह घोर तामिस्र नामक नरकको प्राप्त करता है और अन्तमेंसूकर- योनिमें उत्पन्न होता है।

अरुणने पूछा-भगवन्! जो व्यक्ति माता-पिताकी मृत्युको तिथि, मास और पक्षको नहीं जानता, उस व्यक्तिको किस दिन श्राद्ध करना चाहिये? जिससे वह नरकभागी न हो?

भगवान् आदित्यने कहा-पक्षिराज अरुण! जो व्यक्ति माता-पिताके मृत्युके दिन, मास और पक्षको नहीं जानता, उस व्यक्तिको अमावास्याके दिन सांवत्सरिक नामक श्राद्ध करना चाहिये। जो व्यक्ति मार्गशीर्ष और माघमें पितरोंके उद्देश्यसे विशिष्ट भोजनादिद्वारा मेरी पूजा-अर्चना करता है, उसपर मैं अति प्रसन्न होता हूँ और उसके पितर भी संतुष्ट हो जाते हैं। पितर, गौ तथा ब्राह्मण-ये मेरे अत्यन्त इष्ट हैं। अत: विशेष भक्तिपूर्वक इनकी पूजा करनी चाहिये।

वेद-विक्रयद्वारा और स्त्रीद्वारा प्राप्त किया गया धन पितृकार्य और देव-पूजनादिमें नहीं लगाना चाहिये। वैश्वदेव कर्मसे हीन और भगवान् आदित्यके पूजनसे हीन वेदवेत्ता ब्राह्मणको भी निन्द्य समझना चाहिये। जो वैश्वदेव किये बिना ही भोजन कर लेता है वह मूर्ख नरकको प्राप्त करता है, उसका अन्न-पाक व्यर्थ है। प्रिय हो या अप्रिय, मूर्ख हो या विद्वान्, वैश्वदेव कर्मके समय आया हुआ व्यक्ति अतिथि होता है और वह अतिथि स्वर्गका सोपानरूप होता है। जो बिना तिथिका विचार किये ही आता है उसे अतिथि कहते हैं। वैश्वदेव-कर्मक समय जो न तो पहले कभी आया हो और न ही उसके पुनः आनेकी सम्भावना हो तो उस व्यक्तिको अतिथि जानना चाहिये। उसे साक्षात् विश्वेदेवके रूपमें ही समझना चाहिये। (अध्याय १८३-१८४)