भविष्य पुराण

सौर-धर्ममें शान्तिक कर्म एवं अभिषेक-विधि

गरुडजीने पूछा- अरुण! जो आधि-व्याधिसे पीड़ित एवं रोगी, दुष्ट ग्रह तथा शत्रु आदिसे उत्पीडित और विनायकसे गृहीत हैं, उन्हें अपने कल्याचा के लिये क्या करना चाहिये ? आप इसे बतलानेकी कृपा करें।

अरुणजी बोले-विविध रोगों से पीड़ित, शत्रुओंसे संतप्त व्यक्तियों के लिये भगवान् सूर्यको 'आराधनाके अतिरिक्त अन्य कोई भी कल्याणकारी उपाय नहीं है, अतः ग्रहोंके घाल और उपघातके नाशक, सभी रोगों एवं राज उपद्रवोंको शमन करनेवाले भगवान् सूर्यकी आराधना करनी चाहिये।

गरुडजीने पूछा-द्विजश्रेष्ठ ! ब्रह्मवादिनीके शापसे मैं पंखविहीन हो गया हूँ, आप मेरे इन अङ्गोंको देखें। मेरे लिये अब कौन-सा कार्य उपयुक्त है? जिससे मैं पुनः पंखयुक्त हो जाऊँ।

अरुणजी बोले-गरुड ! तुम शुद्ध-चित्तसे अन्धकारको दूर करनेवाले जगन्नाथ भगवान्

भी ईश हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। समस्त दुःखोंके हर्ता, प्रसन्नवदन, उत्तमाङ्ग, वरके स्थान, वर-प्रदाता, वरद तथा वरेण्य भगवान् विभावसुको मैं प्रणाम करता हूँ। अर्क, अर्यमा, इन्द्र, विष्णु, ईश, दिवाकर, देवेश्वर, देवरत और विभावसु नामधारी भगवान् सूर्यको मैं प्रणाम करता हूँ।' इस स्तुतिका जो नित्य श्रवण करता है, वह परम कीर्तिको प्राप्तकर सूर्यलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १७३-१७४)

भास्करकी पूजा एवं हवन करो।

गरुडजीने कहा-मैं विकलाङ्ग होनेसे भगवान् सूर्यको पूजा एवं अग्निकार्य करनेमें असमर्थ हूँ। इसलिये मेरी शान्तिके लिये अग्निका कार्य आप सम्पादित करें।

अरुणजी बोले-विनतानन्दन! महाव्याधिसे प्रपीडित होनेके कारण तुम इसके सम्पादनमें समर्थ नहीं हो, अत: मैं तुम्हारे रोगको शान्तिके लिये पावकार्चन (अग्निहोम) करूँगा। वह लक्ष-होम सभी पापों, विनों तथा व्याधियोंका नाशक, महापुण्यजनक, शान्ति प्रदान करनेवाला, अपमृत्यु-निवारक, महान् शुभकारी तथा विजय प्रदान करनेवाला है। यह सभी देवोंको तसि प्रदान करनेवाला तथा भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय है।

इस पावकार्चन में सूर्य मन्दिरके अग्निकोणमें गोमयसे भूमिको लीपकर अग्निकी स्थापना करे

*भगवन्तं भगकरें शान्तचित्तमनुत्तमम् ।

देवमार्गप्रणेतारं प्रणतोऽस्मि रविं सदा ॥

शाश्वतं शोभनं शुद्ध चित्रभानुं दिवस्पतिम् ।

देवदेवेशमोशेशं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥

सर्वदुःखहरं देवं सर्वदुःखहरं रविम् ।

वराननं बराह च वरस्थानं वरप्रदम्॥

वरेण्यं वरदं नित्यं प्रणतोऽस्मि विभावसुम् ।

अर्कमर्यमणं चेन्द्र विष्णुमीशं दिवाकरम् ॥

देवेश्वरं देवरतं प्रणतोऽस्मि विभावसुम् ।

य इदं शृणुयानित्यं ब्रह्मणोक्तं स्तवं परम्।

स हि कीर्ति परां प्राप्य पुनः सूर्यपुरं व्रजेत् ॥

(ब्राह्मपर्व १७४।३६-४०)

और सर्वप्रथम दिक्पालोंको आहुति प्रदान करे।

खगश्रेष्ठ! इस प्रकार विधिपूर्वक आहुतियाँ प्रदान करनेके अनन्तर 'ॐ भूर्भुवः स्वाहा' इसके द्वारा लक्ष हवनका सम्पादन करे। सौर-महाहोममें यही विधि कही गयी है। भगवान् भास्करके उद्देश्यसे इस अग्निकार्यको करे। यह सभी लोकोंकी सभी प्रकारको शान्तिके लिये उपयोगी है।

हवनके अनन्तर शान्तिके लिये निर्दिष्ट मन्त्रोंका पाठ करते हुए अभिषेक करना चाहिये। सर्वप्रथम ग्रहोंके अधिपति भगवान् सूर्य तथा सोमादि ग्रहोंसे शान्तिकी प्रार्थना करे।

'रक्त कमलके समान नेत्रोंवाले, सहस्त्र

आरक्तदेहरूपाय रक्काक्षाष महात्मने ।

                                        धराधराप शान्ताय सहलाक्षशिराय च ॥

'अधोमुखाय घेताय स्वाहा'-इसमे प्रथम आहूति दे।

चतुर्मुखाय शान्ताय पचासनगताप च ॥

पावर्णाष वेधाथ कमण्डलुधराप च ।।

'ऊध्वमुखाय स्वाहा'-इससे द्वितीय आहुति दे।

हेमवर्णाय देहाय ऐरावतगजाय च ।

सहसाक्षशरोराय पूर्वदिश्य-मुखाय च।

देवाधिपाय चेन्दाय विहस्ताय शुभाय च ।

'पूर्ववदनाय स्वाहा'-इससे तृतीय आहुति दे।

दोमाय व्यक्तदेहाय ज्वालापालाकुलाय च ।

इन्द्रनीलाभदेहाय सर्वारोग्पकराय च ॥

समाय धर्मराजाय दक्षिणाशामुखाय च।

'कृष्णाम्बरधराय स्वाहा'- इससे चौथी आहुति दे।

नीतजीमूतवाय रक्ताम्बरधराय च ।

मुक्ताफलशरोराय पिङ्गाक्षाय महात्मने ।

शुक्लवस्त्राय पीताय दिव्यपाशधराय च।

'पक्षिमाधिमुखाय स्वाहा'-इससे पाँचवीं आहुति दे।

कृष्णपिछलनेत्राय वायव्याभिमुखाय च ।

नीलध्वजाय वोराय तथा चेन्द्राय वेधसे ।

'पवनाय स्वाहा'-इस मन्त्रसे छठी आहुति दे।

गदाहस्ताय सूर्याय चित्रखा भूषणापच ॥

महोदराय शान्ताय स्वाहाधिपतये तथा।

'उत्तराभिमुखाय महादेवप्रियाय स्वाहा'-इससे सातवी आहुति दे।

चेताय वेतवर्णाय चित्राक्षायमहात्मने ।

शान्ताय शान्तरूपाय पिनाकवरधारिणे ॥

'ईशानाभिमुखायेशाय स्वाहा'-इससे आठवों आहुति दे।

(ब्राह्मपर्व १७५।१८-३२)

[यह दश दिक्पाल-होम प्रतीत होता है, किंतु पाठको गडबडोसे आग्नेय तथा नैऋत्यकोणकी आहुतियों का स्वरूप अस्पष्ट है।

शान्त्यर्थ सर्वलोकानां ततः शान्तिकमाचरेत् ।

                           सिन्दूरामनरकाभी रतपद्याभतोचनः ।

सहसकिरणो देवः सतावरणवाहनः ।

गभस्तिमाली भगवान् सर्वदेवनमस्कृतः ॥

करोतु ते महाशान्तिग्रहपीडानिवारिणीम्।

त्रिचक्ररथमारूड अप सारमयं तु यः॥

देव आत्रेय शामृतसवः ।

शीतांशुरमृतात्मा च भयसिसमन्वितः ।

सोमः सौम्येन भावेन ग्रहपीहा ध्यपोहतु॥

परागनिभो भीमो मधुपिङ्ललोचनः।

अङ्गरकोग्निसदृशो ग्रहपीडां व्यपोहतु।।

पुष्परागनिभेनेह देहेन परिरिङ्गलः।

पीतमाल्याम्बरधरो वधुः पीडां प्यपोहतु।।

तप्तगैरिकसंकाशः सर्वशास्त्रविशारदः।

सर्वदेवगुरुर्विप्रो हाथर्वणवरो मुनिः।।

बृहस्पतिरित ख्यात अर्थशास्त्रपरश्चयः।

शान्तेन चेतसा सोपि परेण सुसमहितः।।

ग्रहपीडां बिनिर्जित्य करोतु तवशान्तिकम्।

सूर्यार्चनपरो नित्यं प्रसादाद्भास्करस्य तु।।

हिमकुन्देन्दुवर्णभो दैत्यदानवपूजितः।

महेश्वरस्ततो धीमान् महासौरो महामतिः।।

सूर्योर्चनपरो नित्यं शुक्रः शुक्लनिभस्तदा।

नीतिशास्त्रपरो नित्यं ग्रहपीडां व्यपोहतु।।

नानारुपधरोव्यत्त्क अविज्ञातगतिश्चयः।

नोत्पत्तिर्जायते यस्य नोदयपीडितैरपि।।

एकचूलो द्विचूश्चत्रिशिखः पञ्चचूलकः।

सहस्रशिररुपस्तु चन्द्रकेतुरिव स्थितः।।

सूर्यपुत्रोग्निंपुत्रस्तु ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः।

अनेकशिखरः केतुः स ते पीडां व्यपोहतु।।

एते ग्रहा महात्मानः सूर्यार्चनपराः सदा।

शान्तिं कुर्वन्तु ते ह्रग्टाः सदाकालं हितेक्षणाः।।

किरणोंवाले, सात अधोंसे युक्त स्थपर आरूड, सिन्दूरके समान रक्त आभावाले, सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत भगवान् सूर्य ग्रहपीडा निवारण करनेवाली महाशान्ति आपको प्रदान करें। शीतल किरणोंसे युक्त, अमृतात्मा, अत्रिके पुत्र चन्द्रदेव सौम्यभावसे आपकी ग्रहपीडा दूर करें। पद्मरागके समान वर्णवाले, मधुके समान पिङ्गल नेत्रवाले, अग्निसदृश अङ्गारक, भूमिपुत्र भौम आपकी ग्रहपीडा दर करें। पुष्परागके समान आभायुक्त, पिङ्गल वर्णवाले, पीत माल्य तथा वस्त्र धारण करनेवाले बुध आपकी पीडा दूर करें। तप्त स्वर्णके समान आभायुक्त, सर्वशास्त्रविशारद, देवताओंके गुरु बृहस्पति आपकी ग्रहपीडा दूर कर आपको शान्ति प्रदान करें। हिम, कुन्दपुष्प तथा चन्द्रमाके समान स्वच्छ वर्णवाले, दैत्य तथा दानवोंसे पूजित, सूर्यार्चनमें तत्पर रहनेवाले, महामति, नीतिशास्त्रमें पारङ्गत शुक्राचार्य आपको ग्रहपीडा दूर करें। विविध रूपोंको धारण करनेवाले, अविज्ञात-गतियुक्त, सूर्यपुत्र शनैश्चर, अनेक शिखरोंवाले केतु एवं राहु आपकी पीडा दूर करें। सर्वदा कल्याणकी दृष्टि से देखनेवाले तथा भगवान् सूर्यको नित्य अर्चना करनेमें तत्पर ये सभी ग्रह प्रसन्न होकर आपको शान्ति प्रदान करें।'

तदनन्तर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश-इन त्रिदेवोंसे

इस प्रकार शान्तिकी प्रार्थना करे- 'पद्मासनपर आसीन, पद्मवर्ण, पद्मपत्रके समान नेत्रवाले, कमण्डलुधारी, देव-गन्धर्वोसे पूजित, देवशिरोमणि, महातेजस्वी, सभी लोकोंके स्वामी, सूर्यार्चनमें तत्पर चतुर्मुख, दिव्य ब्रह्म शब्दसे सुशोभित ब्रह्माजी आपको शान्ति प्रदान करें। पीताम्बर धारण करनेवाले, शङ्ख, चक्र, गदा तथा पद्य धारण करनेवाले चतुर्भुज, श्यामवर्णवाले, यज्ञस्वरूप, आत्रेयीके पति और सूर्यके ध्यानमें तल्लीन माधव मधुसूदन विष्णु आपको नित्य शान्ति प्रदान करें। चन्द्रमा एवं कुन्दपुष्पके समान उज्ज्वल वर्णवाले, सर्पादि विशिष्ट आभरणोंसे अलंकृत, महातेजस्वी, मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करनेवाले, समस्त विश्वमें व्याप्त, श्मशान में रहनेवाले, दक्ष यज्ञ विध्वंस करनेवाले, वरणीय, आदित्यके देहसे सम्भूत, वरदानी, देवाधिदेव तथा भस्म धारण करनेवाले महेश्रर आपको शान्ति प्रदान करें।'

तदनन्तर सभी मातृकाओंसे शान्तिके लिये प्रार्थना करे२-

पद्यासनः पश्वर्णः पद्यपत्रनिभेक्षण: |

                           कमण्डलुधरः श्रीमान् देवगन्धर्वपूजितः ।

चतुर्मुखो देवपतिः सूचनपरः सदा।

सुरज्येष्ठो महातेजाः सर्वलोकप्रजापतिः ।

ब्रह्मशब्देन दिव्येन बह्मा शान्ति करोतु ते।

पीताम्बरधरो देव आत्रेयौदयितः सदा ।

शङ्खचक्रगदापाणिः स्यामवर्णचतुर्भुजः ॥

यज्ञेहः क्रमो देव आत्रेयोदयितः सदा ।

शङ्खचक्रगदापाणिर्माधवो मधुसूदनः ।।

सूर्यभक्तान्वितो नित्यं विगतिर्विगतत्रयः ।

सूर्यध्यानपरो नित्यं विष्णुः शान्तिं करोतु ते ॥

शशिकुन्देन्दुसंकाशो विघुताभरणैरिह ।

चतुर्भुजो महातेजाः पुष्पार्धकृतशेखरः ॥

चतुर्मुखो भस्मधरः श्मशाननिलयः सदा ।

गोत्रारिर्विश्वनिलयस्तथा च क्रतुदूषणः ॥

वरो वरेण्यो वरदो देवदेवो महेश्वरः ।

आदित्यदेहसम्भूतः स ते शान्ति करोतु ॥

(ब्राह्मपर्व १७६।१-८)

पद्यरागप्रभा देवी चतुर्वदनपङ्कजा ।

                                अक्षमालार्पितकरा कमण्डलुधरा शुभा ॥

ब्रह्माणी सौम्यवदना आदित्याराधने रता ।

शान्ति करोतु सुप्रीता आशीर्वादपरा खग ॥

महा तेति विख्याता आदित्यदयिता सदा ।

हिमकुन्देन्दुसदृशा महावृयभवाहिनी॥

त्रिशूलहस्ताभरणा विश्रुताभरणा सती ।

चतुर्भुजा चतुर्वक्त्रा त्रिनेत्रा पापनाशिनी।

वृषध्वजार्चनरता रुद्राणी शान्तिदा भवेत्॥

मयूरवाहना देवी सिन्दूरारुणविग्रहा ।

शक्तिहस्ता महाकाया सर्वालंकारभूषिता ।

'पद्यरागके समान माभावाली, अक्षमाला एवं कमण्डलु धारण करनेवाली, आदित्यकी आराधनामें तथा आशीर्वाद देने में तत्पर, सौम्यवदनवाली ब्रह्माणी प्रसन्न होकर तुम्हें शान्ति प्रदान करें। हिम, कुन्द- पुष्प तथा चन्द्रमाके समान वर्णवाली, महावृषभपर आरूद, हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाली, आश्चर्यजनक आभरणोंसे विश्रुत, चतुर्भुजा चतुर्वक्त्रा तथा त्रिनेत्रधारिणी पापोंका नाश करनेवाली, वृषभध्वज शंकरकी अर्चनामें तत्पर, महाश्वेता नामसे विख्यात आदित्यदयिता रुद्राणी. आपको शान्ति प्रदान करें। सिन्दूरके समान अरुण विग्रहवाली, सभी अलंकारोंसे विभूषित, हाथमें शक्ति धारण करनेवाली, सूर्यको अर्चनामें तत्पर, महान् पराक्रमशालिनी, वरदायिनी, मयूरवाहिनी देवी कौमारी आपको शान्ति प्रदान करें। गदा एवं. चक्रको धारण करनेवाली, पीताम्बरधारिणी, सूर्यार्चनमें नित्य तत्पर रहनेवाली, असुरमर्दिनी, देवताओंके द्वारा पूजित चतुर्भुजा देवी वैष्णवी आपको नित्य शान्ति प्रदान करें। ऐरावतपर आरूढ़, हाथमें वज्र धारण करनेवाली, महाबलशालिनी, सिद्ध-गन्धर्वोसे सेचित, सभी अलंकारोंसे विभूषित, चित्र-विचित्र अरुणवर्णवाली, सर्वत्रलोचना देवी इन्द्राणी आपको शान्ति प्रदान करें। वराह के समान नासिकावाली, श्रेष्ठ वराह पर आरूद्ध, विकटा, शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाली, श्यामावदाता, तेजस्विनी, प्रतिक्षण भगवान् सूर्यको आराधना करनेवाली, वरदायिनी देवी. वाराही आपको शान्ति प्रदान करें।

क्षाम-करि-प्रदेशवालो मांसरहित कंकाल-स्वरूपिणी, कराल बदना, भयंकर तलवार, घंटा, खट्वाङ्ग और वरमुद्रा धारण करनेवाली, तर, लाल पीले नेत्रोंवाली, गजचर्मधारिणी, गोश्रुताभरणा, प्रेतस्थान में निवास करनेवाली, देखने में भयंकर परंतु

सूर्यभक्ता महावीर्या सूर्यार्चनरता सदा ।

कौमारी वरदा देवी शान्तिमाशु करोतु ते॥

गदाचक्रधरा श्यामा पीताम्बरधरा खग।

चतुर्भुजा हि सा देवी वैष्णवी सुरपूजिता ॥

सूर्यार्चनपरा नित्य सूर्यकगतमानसा ।

शान्तिं करोतु ते नित्यं सर्वासुरविमर्दिनी ॥

ऐरावतगजारूढा वग्रहस्ता महाबला ।

सर्वत्रलोचना देवी वर्णतः कर्बुरारुणा॥

सिद्धगन्धर्वनमिता सर्वालंकारभूषिता ।

इन्द्राणी ते सदा देवी शान्तिमाशु करीतु वै ॥

वराहपोणा विकटा वराहवरवाहिनी ।

श्यामावदाता या देवी शङ्खचक्रगदाधरा॥

तेजयन्तीति निमिषान् पूजयन्ती सदा रविम् ।

वाराही वरदा देवी तव शान्तिं करोतु वै॥

अर्धकोशा कटीक्षामा निर्मासा सायुवन्धना ।

करालवदना घोरा खड्गघण्टोद्रता सती॥

कपालमालिनी क्रूरा खट्वाङ्गवरधारिणी ।

आरक्ता पिङ्गनयना गजचर्मावगुण्ठिता ॥

गोश्रुताभरणा देवी प्रेतस्थाननिवासिनी ।

शिवारूपेण घोरेण शिवरूपभयंकरी॥

चामुण्डा चण्डरूपेण सदा शान्तिं करोतु ते ॥

चण्डमुण्डकरा देवी मुण्डदेहगता सती ।

कपालमालिनी क्रूरा खट्वाङ्गवरधारिणी।

आकाशमातरो देव्यस्तथान्या लोकमातरः ।

भूतानां मातरः सर्वास्तथान्याः पितृमातरः ॥

वृद्धिबाडेषु पूज्यन्ते यास्तु देव्यो मनीषिभिः ।

मात्रे प्रमात्रे तन्मात्रे इति मातृमुखास्तथा ॥

पितामही तु तन्माता वृद्धा या चपितामही ।

इत्येतास्तु पितामहाः शान्तिं ते पितृमातरः॥

सर्वा मातृमहादेव्यः सायुधा व्यग्रपाणयः ।

जगद्व्याप्य प्रतिष्ठन्त्यो बलिकामा महोदयाः॥

शान्तिं कुर्वन्तु ता नित्यमादित्याराधने रताः ।

शान्तेन चेतसा शान्त्यः शान्तये तव शान्तिदा।

 सर्वावयवमुख्येन गात्रेण च सुमध्यमा ।

पीतश्यामातिसौम्येन स्निग्धवर्णेन शोभना॥

ललाटतिलकोपेता चन्द्ररेखार्धधारिणी ।

चित्राम्बरधरा देवी सर्वाभरणभूषिता ॥

वरा स्त्रीमयरूपाणां शोभा गुणसुसम्पदाम् ।

भावनामाप्रसंतुष्टा उमा देवी वरप्रदा।।

साक्षादागत्य रुपेण शान्तेनामिततेजसा।

शान्तिं करोतु ते प्रीता आदित्याराधने रता।।

शिवस्वरूपा, हाथमें चण्ड-मुण्डके कपाल धारण किये हुए तथा कपालकी माला पहने चन्द्ररूपिणी देवी चामुण्डा तुम्हें शान्ति प्रदान करें-

आकाशमातृकाएँ, लोकमातृकाएँ तथा अन्य लोकमातृकाएँ, भूतमातृकाएँ, अन्य पितृ-मातृकाएँ, वृद्धि-श्राद्धोंमें जिनकी पूजा होती है वे पितृमातृकाएँ, माता, प्रमाता, वृद्धप्रमाता-ये मातृ-मातृकाएँ, शान्त चित्तसे आपको शान्ति प्रदान करें। ये सभी मातृकाएँ अपने हाथोंमें आयुध धारण करती हैं और संसारको व्याप्त करके प्रतिष्ठित रहती हैं तथा भगवान् सूर्यको आराधनामें तत्पर रहती हैं। सुन्दर अङ्ग प्रत्यङ्गवाली तथा सुन्दर कटि-प्रदेशवाली, पीत एवं श्याम वर्णवाली, स्निग्ध आभावाली, तिलकसे सुशोभित ललाटवाली, अर्धचन्द्ररेखा धारण करनेवाली, सभी आभरणोंसे विभूषित, चित्र-विचित्र वस्त्र धारण करनेवाली, सभी स्त्रीस्वरूपोंमें गुण और सम्पत्तियोंक कारण सर्वश्रेष्ठ शोभावाली, आदित्यकी आराधनामें तत्पर, केवल भावनामात्रसे संतुष्ट होनेवाली वरदायिनी भगवती उमादेवी अपने अमित तेजस्वी एवं शान्त-रूपसे प्रत्यक्ष प्रकट होकर प्रसन्न हो आपको शान्ति प्रदान करें।'

अनन्तर कार्तिकेय, नन्दीश्वर, विनायक, भगवान् शंकर, जगन्माता, पार्वती, चण्डेश्वर, ऐन्द्री आदि दिशाएँ, दिशाओंके अधिपति, लोकपालोंको नगरियाँ, सभी देवता, देवी सरस्वती तथा भगवती अपराजितासे इस प्रकार शान्तिको प्रार्थना करे

१-ये सात विश्वमाताएँ कही गयी हैं। शारदातिलकके षष्ठ पटल में इन सातोंके साथ ही भगवती महालक्ष्मीको भी विश्वमाता कहा गया है।

अबलो बालरूपेण खट्वाङ्गशिखिषाहनः ।

                          पूर्वेण वदनः श्रीमांस्त्रिशिखः शक्तिसंयुतः ।

कृत्तिकायाक्ष रुद्रस्य चाङ्गोद्भूतः सुरार्चितः ।

कार्तिकयो महातेजा आदित्यवरदर्पितः ।।

शान्तिं करोतु ते नित्यं बलं सौख्यं च तेजसा॥

आत्रेयो बलवान् देव आरोग्यं च खगाधिप ।

श्वेतवस्त्रपरीधानस्त्र्यक्ष: कनकसुप्रभः।

शूलहस्तो महाप्राज्ञो नन्दीशो रविभावितः ।

शान्तिं करोतु ते शान्तो धर्मे च मतिमुत्तमाम् ॥

धर्मेतरावुभौ नित्यमचलः सम्प्रयच्छतु ।

महोदरो महाकायः स्निग्धाजनसमप्रभः ॥

एकदंष्टोत्कटो देवो गजवक्त्रो महाबलः ।

नागयज्ञोपवीतेन नानाभरणभूषितः॥

सर्वार्थसम्पदुद्धारो गणाध्यक्षो वरप्रदः ।

भीमस्य तनयो देवो नायकोऽथ विनायकः ।

करोतु ते महाशान्तिं भास्कराचनतत्परः॥

इन्द्रनीलनिभस्त्र्यक्षो दीप्तशूलायुधोद्यतः ।

रक्ताम्बरधरः श्रीमान् कृष्णाङ्गो नागभूषणः ।।

पापापनोदमतुलमलक्ष्यो मलनाशनः ।

करोतु ते महाशान्तिं प्रीतः प्रीतेन चेतसा ॥

वराम्बरधरा कन्या नानालंकारभूषिता ।

त्रिदशानां च जननी पुण्या लोकनमस्कृता॥

सर्वसिद्धिकरा देवी प्रसादपरमास्पदा ।

शान्तिं करोतु ते माता भुवनस्य खगाधिप ।

स्निग्धश्यामेन वर्णेन महामहिषमर्दिनी ।

धनुश्चक्रप्रहरणा खड्गपट्टिशधारिणी॥

आतर्जन्यायतकरा सर्वोपद्रवनाशिनी ।

शान्तिं करोतु ते दुर्गा भवानी च शिवा तथा ॥

अतिसूक्ष्मो प्रतिक्रोधस्थ्यक्षो भृङ्गिरिटिमहान्।

सूर्यात्मको महावीरः सर्योपद्रवनाशनः ।

सूर्यभक्तिपरो नित्यं शिवं ते सम्प्रयच्छतु ॥

प्रचण्डगणसैन्येशो महाघण्टाक्षधारकः ।

अक्षममालर्पितर श्चाथ चण्डेश्वरो वरः।।

चण्डपापहरो नित्यं ब्रह्महत्याविनाशनः ।

शान्तिं करोतु ते नित्यमादित्याराधन रतः।

करोतु च महायोगी कल्याणानां परम्पराम्।।

आकाशमातरो दिव्यास्तथान्या देवमातरः।

सूर्यार्चनपरा देव्यो जगद् व्याप्य व्यवस्थिताः।

 शान्तिं कुर्वन्तु ते नित्यं मातरः सुरपूजिताः।।

ये रुद्रा रौद्रकर्माणो रोद्रस्थाननिवासिनः।

मातरो रुद्ररुपाश्च गणनामधिपाश्च ये।।

व्रिघ्नभूतास्तथा चान्ये दिग्विदिक्षु समाश्रिताः।

सर्वे ते प्रीतमनसः प्रतिगृहन्तु मे बलिम्।

सिद्धिं कुर्वन्तु ते नित्यं भयेभ्यः पान्तु सर्वतः।।

खट्वाङ्ग धारण किये हुए, शक्तिसे युक्त, मयूरवाहन, कृत्तिका और भगवान् रुद्रसे उद्भूत, समस्त देवताओंसे अर्चित तथा आदित्यसे वरप्रास भगवान् कार्तिकेय अपने तेजसे आपको बल, सौख्य एवं शान्ति प्रदान करें। हाथमें शूल एवं श्वेत वस्त्र धारण किये हुए, स्वर्ण-आभायुक्त, भगवान् सूर्यकी आराधना करनेवाले, तीन नेत्रोंवाले नन्दीश्वर आपको धर्ममें उत्तम बुद्धि, आरोग्य एवं शान्ति प्रदान करें। चिकने अञ्जनके समान आभायुक्त, महोदर तथा महाकाय नित्य अचल आरोग्य प्रदान करें। नाना आभूषणोंसे विभूषित नागको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण किये हुए, समस्त अर्थ-सम्पत्तियोंके उद्धारक, एकदन्त, उत्कट-स्वरूप, गजवक्त्र, महाबलशाली, गणोंके अध्यक्ष, वरप्रदाता, भगवान् सूर्यकी अर्चनामें

ऐन्द्रादयो गणा ये तु वजहस्ता महाबलाः ।

हिमकुन्देन्दुसदृशा नीलकृष्णालोहिताः ॥

दिव्यान्तरिक्षा भीमाश पातालतलवासिनः ।

ऐन्द्राः शान्ति प्रकुर्वन्तु भद्राणि च पुनः पुनः ।।

आग्नेय्यां ये भृताः सर्वे ध्रुवहत्यानुषङ्गिणः ।

सूर्यानुरक्ता रक्ताभा जपासुमनिभास्तथा ॥

विरक्तलोहिता दिव्या आग्नेय्या भास्करादयः ।

आदित्याराधनपरा आदित्यगतमानसाः ॥

शान्तिं कुर्वन्तु ते नित्यं प्रयच्छन्तु वलिं मम ।

भयादित्यसमा ये तु सततं दण्डपाणयः ।

आदित्याराधनपराः शं प्रयच्छन्तु ते सदा ।।

ऐशान्यां संस्थिता ये तु प्रशान्ताः शूलपाणयः ।

भस्मोदूलितदेहाश नीलकण्ठा विलोहिताः ।

दिव्यान्तरिक्षा भीमाच पातालतलवासिनः ।

सूर्यपूजाकरा नित्यं पूजयित्वांशुमालिनम् ॥

आग्नेय्यां ये भृताः सर्वे ध्रुवहत्यानुषङ्गिणः।

सूर्यानुरका रक्तभा जपासुमनिभास्तथा।।

विरक्तलोहिता दिव्या आग्नेय्यां भास्करादयः।

आदित्याराधनपरा आदित्यगतमानसाः।।

शान्तिं कुर्वन्तु ते नित्यं प्रयच्छन्तु बलिं मम।

भयादित्यसमा ये तु सततं दण्डपाणयः।

आदित्याराधनपराः शं प्रयच्छन्तु ते सदा।

ऐशान्यां संस्थिता ये तु प्रशान्ताः शूलपाणयः।

भस्मोद्धूलितदेहाश्च नीलकण्डा विलोहिताः।।

दिव्यान्तरिक्षा भौमाश्च पातालतलवासिनः।

सूर्यपूजाकरा नित्यं पूजयित्वांशुमालिनम्।।

ततः सुप्रीतमनसो लोकपालः समन्विताः ।

शान्तिं कुर्वन्तु मे नित्यं शं प्रयच्छन्तु पूजिताः ।

अमरावती पुरी नाम पूर्वभागे व्यवस्थिता ।

विद्याधरगणाकीर्णा सिद्धगन्धर्वसेविता॥

रत्नप्राकाररुचिरा महारत्नोपशोभिता।

तत्र देवपतिः श्रीमान् वज्रपाणिर्महाबलः ।

गोपतिर्गासहस्रेण शोभमानेन शोभते ।।

ऐरावतगजारूढो गैरिकाभो महाद्युतिः ।

देवेन्द्रः सततं दृष्ट आदित्याराधने रतः॥

सूर्यज्ञानैकपरमः सूर्यभक्तिसमन्वितः ।

सूर्यप्रणामः परमा शान्ति तेऽद्य प्रयच्छतु।

आग्नेयदिग्विभागे तु पुरी तेजस्वती शुभा ।

नानादेवगणाको नानारत्नोपशोभिता॥

तत्र ज्वालासमाकीर्णो दीप्ताङ्गारसमद्युतिः ।

पुरगो दहनो देवो ग्वलनः पापनाशनः ॥

आदित्याराधनरत आदित्यगतमानसः ।

शान्तिं करोतु ते देवस्तथा पापपरिक्षयम्॥

वैवस्वती पुरी रम्या दक्षिणेन महात्मनः ।

सुरासुरशताकीर्णा नानारनोपशोभिता॥

तत्र कुन्देन्दुसंकाशो हरिपिङ्गललोचनः ।

महामहिषमारूढः कृष्णलग्वस्वभूपणः॥

अन्तकोऽध महातेजाः सूर्यधर्मपरायणः ।

आदित्याराधनपर: क्षेमारोग्ये ददातु ते।।

 नैर्ऋते दिग्विभागे तु पुरी कृष्णेति विश्रुता ।

महारक्षोगणाशौचपिशाचप्रेतसंकुला

तत्र कुन्दनिभो देवो रक्तस्त्रावस्त्रभूषणः ।

खड्गपाणिर्महातेजाः करालबदनोज्ज्वलः ॥

रक्षेन्द्रो वसते नित्यमादित्याराधने रतः ।

करोतु मे सदा शान्तिं धनं धान्यं प्रयच्छतु ॥

पश्चिमे तु दिशो भागे पुरी शुद्धवती सदा ।

नानाभोगिसमाकीर्णा नानाकिन्नरसेविता॥

तत्र कुन्देन्दुसंकाशो हरिपिङ्गललोचनः ।

शान्तिं करोतु मे प्रोतः शान्त: शान्तेन चेतसा॥

यशोवती पुरी रम्या ऐशानी दिशमाश्रिता।

नानागणसमाकोर्णा नानाकृतशुभालया ।

तेज:प्रकारपर्यन्ता अनौपम्या सदोज्वला ॥

तत्र कुन्देन्दुसंकाशवाम्बुजाक्षो विभूषितः ।

त्रिनेत्रः शान्तरूपात्मा अक्षमालाधराधरः ।

ईशानः परमो देवः सदा शान्तिं प्रयच्छतु ।।

भूलोके तु भुवर्लोके निवसन्ति च ये सदा ।

देवादेवाः शुभायुक्ताः शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ।।

जनलोके महर्लोके परलोके गताच ये ।

ते सर्वे मुदिता देवाः शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा॥

सरस्वती सूर्यभक्ता शान्तिदा विदधातु मे।

चारुचामीकरस्था या सरोजकरपल्लवा ।

सूर्यभक्त्याश्रिता देवी विभूति ते प्रयच्छतु॥

हारेण सुविचित्रेण भास्वत्कनकमेखला ।

अपराजिता सूर्यभक्ता करोतु विजयं तव ॥

(ब्राह्मपर्व १७८।१-४८)

तत्पर, शंकरपुत्र विनायक आपको महाशान्ति प्रदान करें। इन्द्रनीलके समान आभावाले, त्रिनेत्रधारी, प्रदीप्त त्रिशूल धारण करनेवाले, नागोंसे विभूषित, पापोंको दूर करनेवाले तथा अलक्ष्य रूपवाले, मलोंके नाशक भगवान् शंकर प्रसन्नचित्तसे आपको महाशान्ति प्रदान करें। नाना अलंकारोंसे विभूषित, सुन्दर वस्त्रोंको धारण करनेवाली, देवताओंकी जननी, सारे संसारसे नमस्कृत, समस्त सिद्धियोंकी प्रदायिनी, प्रसाद-प्राप्तिकी एकमात्र स्थान जगन्माता भगवती पार्वती आपको शान्ति प्रदान करें। स्निग्ध श्यामल वर्णवाली, धनुष-चक्र, खड्ग तथा पट्टिश आयुधोंको धारण की हुई, सभी उपद्रवोंका नाश करनेवाली, विशाल बाहुओंवाली, महामहिष-मर्दिनी भगवती भवानी दुर्गा आपको शान्ति प्रदान करें। अत्यन्त सूक्ष्म, अतिक्रोधी, तीन नेत्रोंवाले, महावीर, सूर्यभक्त ,गिरिटि आपका नित्य कल्याण करें। विशाल घण्टा तथा रुद्राक्ष-माला धारण किये हुए. ब्रह्महत्यादि उत्कट पापोंका नाश करनेवाले, प्रचण्डगणोंके सेनापति, आदित्यकी आराधनामें तत्पर महायोगी चण्डेश्वर आपको शान्ति एवं कल्याण प्रदान करें। दिव्य आकाश-मातृकाएँ अन्य देव मातृकाएँ, देवताओंद्वारा पूजित मातृकाएँ जो संसारको व्याप्त करके अवस्थित हैं और सूर्यार्चनमें तत्पर रहती हैं, वे आपको शान्ति प्रदान करें। रौद्र कर्म करनेवाले तथा रौद्र स्थानमें निवास करनेवाले रुद्रगण, अन्य समस्त गणाधिप, दिशाओं तथा विदिशाओं में जो विनरूपसे अवस्थित रहते हैं, वे सभी प्रसन्नचित्त होकर मेरे द्वारा दी गयी इस बलि (नैवेद्य)-को ग्रहण करें। ये आपको नित्य सिद्धि प्रदान करें और आपकी भयो से रक्षा करें।

हाथों में वज लिये हुए महाबलशाली, सफेद, नीले, काले तथा लाल वर्णवाले, पृथ्वी, आकाश, पाताल तथा अन्तरिक्षमें रहनेवाले ऐन्द्रगण निरन्तर आपका कल्याण करें और शान्ति प्रदान करें। आग्नेय दिशामें रहनेवाले निरन्तर ज्वलनशील, जपाकुसुमके समान लाल तथा लोहित वर्णवाले, हाथमें निरन्तर दण्ड धारण करनेवाले सूर्यके भक्त भास्कर आदि मेरे द्वारा दिये गये बलि (नैवेद्य)- को ग्रहण करें और आपको नित्य शान्ति एवं कल्याण प्रदान करें। ईशानकोणमें अवस्थित शान्ति- स्वभावयुक्त, त्रिशूलधारी, अङ्गोंमें भस्म धारण किये हुए, नीलकण्ठ, रक्तवर्णवाले, सूर्य-पूजनमें तत्पर, अन्तरिक्ष, आकाश, पृथ्वी तथा स्वर्गमें निवास करनेवाले रुद्रगण आपको नित्य शान्ति एवं कल्याण प्रदान करें।

रलोंके प्राकारों एवं महारत्नोंसे शोभित, विद्याधर एवं सिद्ध-गन्धोंसे सुसेवित पूर्वदिशामें अवस्थित अमरावती नामवाली नगरीमें महाबली, वज्रपाणि, देवताओंके अधिपति इन्द्र निवास करते हैं। वे ऐरावतपर आरूढ एवं स्वर्णकी आभाके समान प्रकाशमान हैं, सूर्यको आराधनामें तत्पर तथा नित्य प्रसन्न-चित्त रहनेवाले हैं, वे परम शान्ति प्रदान करें। विविध देवगणोंसे व्यास, भाँति- भाँतिके रनोंसे शोभित, अग्रिकोणमें अवस्थित तेजस्वती नामकी पुरी है, उसमें स्थित जलते हुए अंगारोंके समान प्रकाशवाले, ज्वालमालाओंसे व्याप्त, निरन्तर ज्वलन एवं दहनशील, पापनाशक, आदित्यकी आराधनामें तत्पर अग्निदेव आपके पापोंका सर्वथा नाश करें एवं शान्ति प्रदान करें। दक्षिण दिशामें संयमनीपुरी स्थित है, वह नाना रत्नोंसे सुशोभित एवं सैकड़ों सुरासुरोंसे व्याप्त है, उसमें रहनेवाले हरित पिङ्गल नेत्रोंवाले महामहिषपर आरूढ़, कृष्ण वस्त्र एवं मालासे विभूषित, सूर्यकी आराधनामें तत्पर महातेजस्वी यमराज आपको क्षेम एवं आरोग्य प्रदान करें। नैहत्यकोणमें स्थित  कृष्णा नामकी पुरी है, जो महान् रक्षोगण, प्रेत तथा पिशाच आदिसे व्याप्त है, उसमें रहनेवाले रक्त माला और वस्त्रोंसे सुशोभित हाथमें तलवार लिये, करालवदन, सूर्यकी आराधनामें तत्पर राक्षसोंक अधिपति निर्ऋतिदेव शान्ति एवं धन-धान्य प्रदान करें। पश्चिम दिशामें शुद्धवती नामकी नगरी है, वह अनेक किंनरोंसे सेवित तथा भोगिगणों से व्याप्त है। वहाँ स्थित हरित तथा पिङ्गल वर्णक नेत्रवाले वरुणदेव प्रसन्न होकर आपको शान्ति प्रदान करें। ईशान-कोणमें स्थित यशोवती नामकी अनुपम पुरी में रहनेवाले त्रिनेत्रधारी शान्तात्मा रुद्राक्ष मालाधारी परमदेव ईशान ( भागवान् शंकर) आपको नित्य शान्ति प्रदान करें। भूः, भुवर, महर् एवं जन आदि लोकोंमें रहनेवाले प्रसन्नचित्त देवता आपको शान्ति प्रदान करें।

सूर्यभक्ता सरस्वती आपको शान्ति प्रदान करें। हाथमें कमल धारण करनेवाली तथा सुन्दर स्वर्ण- सिंहासनपर अवस्थित, सूर्यकी आराधनामें तत्पर भगवती महालक्ष्मी आपको ऐश्वर्य प्रदान करें और आदित्यकी आराधनामें तल्लीन, विचित्र वर्णके सुन्दर हार एवं कनकमेखला धारण करनेवाली सूर्यभक्ता भगवती अपराजिता आपको विजय प्रदान करे।

इसके अनन्तर सत्ताईस नक्षों, मेषादि द्वादश राशियों, साधियों, महातपस्वियों, अधियों, सिद्धों, विद्याधरों, दैल्येन्द्रो तथा अष्ट नागोंसे शान्तिको  प्रार्थान करे*।

*कृत्तिका परमा देवी रोहिणी च वरानना ।

श्रीमन्माशिरा भदा आा चाप्यपरोज्ज्वला ॥

पुनर्वसुस्तश्या पुष्य आश्लेषा च तथाधिप ।

सूर्याचनरता नित्यं सूर्यभावानुभाविताः ॥

अर्चयन्ति सदा देवमादित्यं सुरते सदा ।

नक्षत्रमातरों होता प्रभामालाविभूषिताः॥

मघा सर्वगुणोपेता पूर्वा चैव तु फाल्गुनी ।

स्वाती विशाखा वरदा दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥

अर्चयन्ति सदा देवमादित्यं सुरपूजितम् ।

तवाचि शान्तिकं द्योतं कुर्वन्तु गगनोदिताः ॥

अनुराधा तथा ज्दे मूल सूर्यपुर सरा ।

पूर्वाषाढा महावीर्य आपाहा चोत्तर तथा॥

अभिजिनाम नक्षत्र श्रवणं च याहु श्रुतम् ।

एताः पश्चिमतो दोक्षा राजन्ते चानुमूर्तयः ।।

भास्कर पूज्यन्त्येताः सर्वकालं सुभाषिताः ।

शान्तिं कुर्वन्तु ते नित्यं विभूतिं च महाधिकाम् ॥

धनिष्ठा शतभिषा तु पूर्वभाद्रपदा तथा ।।

उत्तराभाद्ररेवत्यों चामिनी च महामटी ।

भरणी च महादेवी नित्यमुत्तरतः स्थिताः ॥

सूर्यार्चनरता नित्यमादिल्यासमानसाः ।

शान्तिं कुर्वन्तु ते नित्य विभूति च महर्टिकाम् ॥

मेषो मृगाधिपः सिंहो धनुर्दीतिमतां वरः ।

पूर्वेण भासगन्त्येते मूर्ययोगपराः शुभाः ।

शान्ति कुर्वन्तु ते नित्य भक्त्या सूर्यपदाम्बुजे ।

वृषः कन्या च परमा मकर नापि बुद्धिमान् ।

एते दक्षिणभागे तु पूजयन्ति रहिं सदा ।

भाल्या परमया नित्यं शान्तिं कुर्वन्नु ते सदा ॥

मिथुन च तुला कुम्भः पशिम च ज्यस्थिताः ।

जापत्येते सदाकालमादित्यं प्रहमायकम् ।।

शान्तिं कुर्वन्तु ते नित्यं खोल्कज्ञानात्परः ।

सान्चौडकपष्माभ्यां ये स्मृत महतं. बुधः ॥

ऋषयः सः विख्याता धूचान्ताः परमोज्यालाः ।

भानु प्रसादान सम्बनाः शानि कुर्वन्तु ते सदा ॥

कश्यपो गालबो गार्यो निक्षामित्रो महामुनिः ।

मुनिर्दक्षो वसिय मार्कण्डः पुलहः क्रतुः ।।

नारदो भृगुरात्रेयो भारद्वाजश्च वै मुनिः ।

वाल्मीकिः कौशिको वात्स्यः शाकल्योऽथपुनर्वसुः ॥

शालंकायन इत्येते ऋषयोऽथ महातपाः ।

सूर्यध्यानैकपरमाः शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा॥

मुनिकन्या महाभागा ऋषिकन्याः कुमारिकाः ।

सूर्यार्चनरता नित्यं शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा॥

सिद्धाः सम्रतपसो ये चान्ये वै महातपाः ।

विद्याधरा महात्मानो गरुडश त्वया सह ।।

आदित्यपरमा होते आदित्याराधने रताः ।

सिद्धि ते सम्प्रयच्छन्तु आशीर्वादपरायणाः॥

नमुचिर्दैत्यराजेन्द्रः शंकुकर्णो महाबलः ।

महानाथोऽथ विख्यातो दैत्यः परमवीर्यवान् ॥

ग्रहाधिपस्य देवस्य नित्यं पूजापरायणाः ।

वलं वीर्यं च ते ऋद्धिमारोग्यं च ब्रुवन्तु ते॥

महायो यो हयग्रीवः प्रह्लादः प्रभयान्वितः ।

अग्रिमुखो महान् दैत्यः कालनेमिर्महाबलः ॥

'परमश्रेष्ठ कृत्तिका, वरानना रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य तथा आश्लेषा (पूर्व दिशामें रहनेवाली) ये सभी नक्षत्र-मातृकाएँ सूर्यार्चनमें रत हैं और प्रभा-मालासे विभूषित हैं। मघा, पूर्वा तथा उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा- ये दक्षिण दिशाका आश्रय ग्रहण कर भगवान् सूर्यकी पूजा करती रहती हैं। आकाशमें उदित होनेवाली ये नक्षत्र-मातृकाएँ आपको शान्ति प्रदान करें। पश्चिम दिशामें रहनेवाली अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा तथा उत्तराषाढ़ा, अभिजित् एवं श्रवण-ये नक्षत्र-मातृकाएँ निरन्तर भगवान् भास्करको पूजा करती रहती हैं, ये आपको वर्धनशील ऐश्वर्य एवं शान्ति प्रदान करें। उत्तर दिशा में अवस्थित धनिष्ठा, शतभिष, पूर्व तथा उत्तरभाद्रपद, रेवती, अश्विनी एवं भरणी नामको नक्षत्र-मातृकाएँ नित्य सूर्यको पूजा करती रहती है, ये आपको नित्य वधनशील ऐश्वयं एवं शान्ति प्रदान करें। पूर्व दिशामें अवस्थित तथा भगवान् सूर्यक चरणकमलोंमें भक्तिपूर्वक आराधना करनेवाली मेष, सिंह और धनु राशियाँ आपको नित्य शान्ति प्रदान करें। दक्षिण दिशामें स्थित रहनेवाली, भगवान् सूर्यकी अर्चना करनेवाली वृष, कन्या तथा मकर राशियाँ परमा भक्तिके साथ आपको शान्ति प्रदान करें। पश्चिम दिशामें स्थित एवं निरन्तर ग्रहनायक भगवान् आदित्यको आराधना करनेवाली मिथुन, तुला तथा कुम्भ राशियाँ आपको नित्य शान्ति प्रदान करें। [कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियाँ जो उत्तर दिशामें स्थित रहती हैं तथा भगवान् सूर्यको भक्ति करती है, आपको शान्ति प्रदान करें।]

भगवान् सूर्यके अनुग्रहसे सम्पन्न ध्रुव मण्डलमें रहनेवाले साधिगण आपको शान्ति प्रदान करें। कश्यप, गाल्च, गाग्र्य, विश्वामित्र, दक्ष, वसिष्ठ, मार्कण्डेय, ऋतु, नारद, भृगु, आत्रेय, भारद्वाज, वाल्मीकि, कौशिक, वात्स्य, शाकल्य, पुनर्वसु

एते दैत्या महात्मानः सूर्यभावेन भाविताः ।

दुष्टिं बलं तथाऽरोग्यं प्रयच्छन्तु मुरारयः ॥

वैरोचनो हिरण्याक्षस्तुषसुश सुलोचनः ।

मुचुकुन्दो मुकुन्दश्च दल्यो रेवतकस्तथा ॥

भावेन परमेणेमं यजन्ते सततं रविम् ।

सततं च शुभात्मानः पुष्टिं कुर्वन्तु ते सदा॥

दैत्यपल्यो महाभाणा दैत्यानां कन्यकाः शुभाः ।

कुमारा ये च दैत्याना शान्निं कुर्वन्तु ते सदा॥

आरक्तेन शरीरेण रक्तातायतलोचनाः ।

महाभागाः कृताटोपाः शङ्खाद्याः कृतलक्षणाः ॥

नागराजेन्द्र आदित्याराधने तः ।

महापापविमं हत्वा शान्तिमाशु करोतु ते॥

अतिपीतेन देहेन चिस्फुरदोषसम्पदा ।

तैजसा चाहिनदीमेन कृतम्वस्तिकलायनः॥

नागराट् तक्षक: श्रीमान् नागकोट्या समन्वितः ।

करोतु ते महाशानिां सर्वदोपविषापहाम्॥

अतिकृष्णेन बर्गेन स्फुरिताधिकमस्तकः ।

कण्ठरेखात्रयोपेतो मोरदंष्ट्रायुधोद्यतः॥

कर्कोटको महानागो विपदर्पबलान्वितः।

विषशस्त्राग्निसंतापं हत्वा शान्तिं करोतु ते।।

महानगो विषदबलान्यिाः ।

विपशस्त्राग्निसंताप इत्वा शान्तिं करोतु ते॥

पदवर्णः अडाकान्तिः फुल्लपद्मावते क्षणः ॥

ख्यातः पद्रो महानागो नित्यं भरकरपूजकः ।।

स ते शान्ति शुभ शोधमचलं सम्प्रयच्छतु ।

स्पामेन देहभारेण श्रीमत्कमललोचतः ।।

विषदर्पबलोन्मतो ग्रीवायां रेखमान्चितः ।

राजपालजिया दीक्षः सूर्यपादाब्बपूजङ्गः ॥

महाविय गर श्रेष्ट इत्या शान्ति करोतु ते ।

अतिरिण देहेन दन्द्रार्धकृतशेखरः ॥

दीपभागे कृताधिशुभलक्षणलक्षित ।

कुलिको नाम नागेन्द्रो नित्यं सूर्यपरायणः ।

अचहत्य विर्ष घोरं करोतु स्व शान्तिकम्॥

अनरिक्षे च ये नाया ये नागा: स्वासिरियताः ।

मिरिकन्दरदुर्गेषु ये नागा भुमि संस्थिताः ॥

पाताले में स्थिता नागा; सर्वे यत्र समाहिताः ।

सूर्यपादाचनासकाः शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा॥

नागिन्यो नागकन्याश्च तथा नागकुमारकाः ।

सूर्यभक्ताः सुमनसः शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा॥

य इदं नागसंस्थान कीर्तयेणुयात् तथा ।

न त सर्पा विहिन्ति व विर्ष क्रमते सदा।।

तथा शालकायन-ये सभी सूर्य-ध्यानमें तत्पर रहनेवाले महातपस्वी ऋषिगण आपको शान्ति प्रदान करें। सूर्यकी आराधनामें तत्पर ऋषि तथा मुनिकन्याएँ, जो निरन्तर आशीर्वाद प्रदान करने में तत्पर रहती हैं, आपको नित्य सिद्धि प्रदान करें।

भगवान् सूर्यकी पूजामें तत्पर दैत्यराजेन्द्र नमुचि, महाबली शङ्खकर्ण, पराक्रमी महानाथ-ये सभी आपके लिये बल, वीर्य एवं आरोग्यकी प्रासिके लिये निरन्तर कामना करें। महान् सम्यत्तिशाली हयग्रीव, अत्यन्त प्रभाशाली प्रहाद, अग्निमुख, कालनेमि-ये सभी सूर्यको आराधना करनेवाले दैत्य आपको पुष्टि, बल और आरोग्य प्रदान करें। वैरोचन, हिरण्याक्ष, तुर्वसु, सुलोचन, मुचुकुन्द, मुकुन्द तथा रैवतक-ये सभी सूर्यभक्त आपको पुष्टि प्रदान करें। दैत्यपनियाँ, दैत्यकन्याएँ तथा दैत्यकुमार- ये सभी आपकी शान्तिके लिये कामना करें।

नागराजेन्द्र अनन्त, अत्यन्त पीले शरीरवाले, विस्फुरित फणवाले, स्वस्तिक चिह्नसे युक्त तथा अत्यन्त तेजसे उद्दीत नागराज तक्षक, अत्यन्त कृष्णवर्णवाले, कण्ठमें तीन रेखाओंसे युक्त, भयंकर आयुधरूपी दंष्ट्रसे समन्वित तथा विषके दर्पसे बलान्वित महानाग कर्कोटक, पाके समान कान्तिवाले, कमलके पुष्पके समान नेत्रवाले, फ्यवर्णके महानाग पद्य, श्यामवर्णवाले, सुन्दर कमलके समान नेत्रवाले, विषरूपी दर्पसे उन्मत्त तथा ग्रीवामें तीन रेखावाले शोभासम्पन्न महानाग शंखपाल, अत्यन्त गौर शरीरवाले, चन्द्रार्धकृत-शेखर, सुन्दर फणोंसे युक्त नागेन्द्र कुलिक (और नागराज वासुकि) सूर्यकी आराधना करनेवाले-ये सभी अष्टनाग महाविषको नष्ट करके आपको निरन्तर अचल महाशान्ति प्रदान करें। अन्तरिक्ष, स्वर्ग, गिरिकन्दराओं, दुर्गों तथा भूमि एवं पातालमें रहनेवाले, भगवान् सूर्यके अनमें आसक्त समस्त नागगण और नागपत्नियर नागकन्याएँ तथा नागकुमार सभी प्रसन्नचित्त होकर आपको सदा शान्ति प्रदान करें।'

जो इस ना-शान्तिका श्रवण या कीर्तन करता है, उसे सर्पगण कभी भी नहीं काटते और विषका प्रभाव भी उनपर नहीं पड़ता।

तदनन्तर गङ्गादि पुण्य नदियों, यक्षेन्द्रों, पर्वतों, सागरों, राक्षसों, प्रेतों, पिशाचों, अपरगारादि ग्रहों, सभी देवताओं तथा भावान् सूर्यसे शान्तिको कामनाके लिये इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये*-

*गङ्गा पुण्या महादेवी यमुना नर्मदा नदी ।

गौतमौ चापि कावेरो वरुना देविका तथा ॥

सर्वग्रहपति देव लोकेश लोकरयकम्।

पूजयन्ति सदा नद्यः सूर्यस्दावभाविताः ।

शान्निं कुर्वन्तु ते नित्यं सूर्यध्यानैकमानसाः ।।

निरञ्जना नाम नदी शोणापि महानदः ।

मन्दाकिनी च परमा तथा संनिहिता शुभा ॥

एताश्चान्याच बहवी भुविदिव्यनारिसके ।

सूर्यानरता नघः कुर्वन्तु कव शान्तिकम्।

महावै अवणो देवो यक्षाजी महर्पिकः ।

यक्षकोटिपरीवारो पक्षासंख्येयसंयुतः ॥

महाविभवलपत्र: सूर्यपादाचने रतः ।

सूर्यध्यानकपरमः सूर्यभावेन भावितः ॥

शान्तिं करोतु ते प्रीतः पचनायो क्षणः ।

मणिभदो महायलो मणिरत्रविभूषितः ।।

मनोहरेण हारेण कण्ठलागेन राजते।

यक्षिणीयक्षकन्याभिः परिचारितविग्रहः ।

सूर्यार्चनसमासक्तः करोतु तव सन्निकम् ।

सुचिरों नम गझेन्द्रों मणिकुण्डलभूषितः ।

ललाटे हेमपटलप्रद्धेन विराजते।।

बहुयक्षसमाकीणों यक्षैर्नमितविग्रहः। 

सूर्यपूजापरे पुत: कोनु तर रान्तिकम् ॥

पाश्चिको नाम यक्षेन्दः कण्ताभरणामपितः ।

कुनकुटेन विचित्रेण बहुराचितेन ।

यक्षवृन्दसमाकीणों यक्षकोटिसमन्वित ।

सूर्यानपरः श्रीमान् यो तव शान्तिकम् ॥

धृतराष्ट्रो महातेजा नानायक्षाधियः खग।

दिव्यपटृ: शुक्लच्छत्रो मणिकश्चनभूषितः।।

'ग्रहाधिपति भगवान् सूर्यको नित्य आराधना करनेवाली पुण्यतोया गङ्गा, महोदेवी यमुना, नर्मदा, गौतमी, कावेरी, वरुणा, देविका, निरञ्जना तथा मन्दाकिनी आदि नदियों और महानद शोण, पृथ्वी, स्वर्ग एवं अन्तरिक्षमें रहनेवाली नदियाँ आपको नित्य शान्ति प्रदान करें। यक्षराज कुबेर, महायक्ष मणिभद्र, यक्षेन्द्र सुचिर पाश्चिक, महातेजस्वी धृतराष्ट्र, यक्षेन्द्र विरूपाक्ष, कझाक्ष तथा अन्तरिक्ष एवं स्वर्ग में रहनेवाले समस्त यक्षगण, यक्षपलियाँ, यक्षकुमार तथा यक्षकन्याएँ जो सभी सूर्यकी आसधनामें तत्पर रहते हैं-ये आपको शान्ति प्रदान करें, नित्य कल्याण, बल, सिद्धि भी शीघ्र प्रदान करें एवं मङ्गलमय बनायें। भगवान् सूर्यको आराधना करनेवाले सभी पर्वत, ऋद्धि प्रदान करनेवाले वृक्ष, सभी सागर तथा पवित्रारण्य आपको शान्ति प्रदान करें। पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग तथा पातालमें निवास करनेवाले एवं भगवान् सूर्यकी आराधना करनेवाले महाबलशाली और कामरूप सभी राक्षस, प्रेत, पिशाच एवं सभी दिशाओमें अवस्थित अपस्मारग्रह तथा ज्वरग्रह आदि आपको नित्य शान्ति प्रदान करें। जिन भगवान् सूर्यके दक्षिण भागमें विष्णु, बाम भाग में शंकर और ललाटमें ब्रह्मा सदा स्थित रहते हैं, ये सभी देवता उन भगवान् सूर्यके तेजसे सम्पन्न होकर आपको शान्ति प्रदान करें तथा सौर धर्मको जाननेवाले समस्त देवगण

सूर्यभक्तः सूर्यरतः सूर्गपूजापरायणः ।

सूर्यप्रसादसम्पन्नः करोतु तव शान्तिकम्।

विरूपाक्ष यक्षेन्द्रः श्वेतवासा महाद्युतिः ।

नानाकाचनमालाभिरूपशोभितकन्धरः ।।

सूर्यपूजापरो भक्त: कशासः कासनिभः ।

तेजमादित्यसंकाशः करोतु तव शान्तिकम् ।।

अन्तरिक्षगता यक्षा ये यक्षाः स्वर्गगामिनः ।

नानारूपधरा यक्षाः सूर्यभक्ता दृढव्रताः॥

तद्धक्तास्तदतमनसः सूर्यपूजासमुत्सुकाः ।

शान्तिं कुर्वन्तु ते दृष्टाः शान्ताः शान्तिपरायणाः ॥

यक्षिप्यो विविधाकारास्तथा यक्षकुमारकाः ।

यक्षकन्या महाभागाः सूर्याराधनतत्पराः ॥

शान्ति स्वल्ययनं क्षेमं बलं कल्याण मुत्तमम् ।

सिद्धि चाशु प्रयच्छन्तु नित्यं च सुसमाहिताः ॥

पर्वताः सर्वतः सर्वे वृक्षाचन महर्षिकाः ।

सूर्यभक्ताः सदा सर्वे शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा॥

समाराः सर्वतः सर्वे गृहारण्यानि कास्तशः ।

सूर्यस्याराधनपराः कुर्वन्तु तव शान्टिकम् ॥

राक्षसाः सर्वतः सर्वे बोररूया महाबलाः ।

स्थलजा राक्षसा ये तु अनारिक्षणता ये॥

पाताले राक्षसा दे तु नित्यं सूर्याने पत्ताः ।

शान्तिं कुर्वन्तु ते सार्वे तेजता नित्यदीधिताः ॥

प्रेताः प्रेतगणाः सर्वे ये प्रेताः सर्वतोमुखाः ।

अतिदीमा ये प्रेता ये प्रेता रुधिराशनाः ।।

अन्तरिक्षे च ये प्रेतास्तथा से स्वर्गवासिनः ।

पाताले भूतले वापि ये प्रेताः कामरूपिणः॥

एकचकरथी यस्य बस्तु देखो वृषण्वनः ।

तेजसा तस्य देवस्य शान्तिं कुर्वन्तु ने सदा॥

ये पिशाचा महायोयाँ बुद्धिमन्तो महाबलः ।

नानारूपधराः सर्वे सर्वे गुगपचराः॥

अन्तरिक्ष पिशाचा ये स्वर्गे ये च महाबलाः ।

पाताले भूतले ये च बहुरूपा मनोजवाः ।

यस्याई सारथिर्वीर यस्य त्वं तुरगः सदा जसा तस्य देवस्य शान्ति कुर्वन्तु तेऽञ्जसा.:

अपस्मारग्रहाः सर्वे सर्वे चापि ज्वरबहाः ।

ये च स्वर्गस्थिताः सा भूमिगा ये ग्रहोत्तमाः ।।

पाताले तु ग्रहा ये च ये ग्रहाः सर्वतो गताः ।

दक्षिणे किरणे यस्य सूर्यस्य न स्थितो हरिः।

हरो यस्य सदा वामे ललाटे काजः स्थितः ।

तेजसा तस्य देवस्य शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा॥

इति देवादयः सर्वे सूर्ययज्ञविधायिनः ।

कुर्वन्तु जगतः शान्तिं सूर्यभक्तेषु सर्वदा ॥

जय सूर्याय देवाय तमोहन्त्रे विवस्वते ।

जयप्रदाय सूर्याय भास्कराय नमोऽस्तु ते॥

ग्रहोत्तमाय देवाय जय कल्याणकारिणे ।

जय पद्यविकाशाय बुधरूपाय ते नमः ।।

जय दीप्तिविधानाय जय शान्तिविधायिने ।

तमोघ्राय जयायैव अजिताय नमो नमः॥

जयार्क जय दीप्तीश सहसकिरणोज्ज्वल ।

जय निर्मितलोकस्त्वमजिताय

गायत्रीदेहरूपाय सावित्रीदयिताय च ।

धराधराय सूर्याय मार्तण्डाय नमो नमः॥

(ब्राह्मपर्व १८०1१-३९)

संसारके सूर्यभक्तों एवं सभी प्राणियोंको सर्वदा शान्ति प्रदान करें।

अन्धकार दूर करनेवाले तथा जय प्रदान करनेवाले विवस्वान् भगवान् भास्करकी सदा जय हो। ग्रहोंमें उत्तम तथा कल्याण करनेवाले, कमलको विकसित करनेवाले भगवान् सूर्यकी जय हो, ज्ञानस्वरूप भगवान् सूर्य! आपको नमस्कार है। शान्ति एवं दीप्तिका विधान करनेवाले, तमोहन्ता भगवान् अजित ! आपको नमस्कार है, आपकी जय हो। सहस्त्र-किरणोज्ज्वल, दीप्तिस्वरूप, संसारके निर्माता आपको बार-बार नमस्कार है. आपकी जय हो। गायत्रीस्वरूपवाले, पृथ्वीको धारण करनेवाले सावित्री-प्रिय मार्तण्ड भगवान् सूर्यदेव ! आपको बार-बार नमस्कार है, आपकी जय हो।'

सुमन्तु मुनि बोले-राजन्! इस विधानसे अरुणके द्वारा वैनतेय गरुडके कल्याणके लिये शान्ति-विधान करते ही वे सुन्दर पंखोंसे समन्वित हो गये। वे तेजमें बुधके समान देदीप्यमान और बलमें विष्णुके समान हो गये। राजन्! देवाधिदेव सूर्यके प्रसादसे सुपर्णके सभी अवयव पूर्ववत् हो गये।

राजन्! इसी प्रकार अन्य रोगग्रस्त मानवगण इस अग्निकार्यसे (मौरी-शान्तिसे) नीरोग हो जाते हैं। इसलिये इस शान्ति-विधानको प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। ग्रहोपघात, दुभिक्ष, सभी उत्पातोंमें तथा अनावृष्टि आदिमें ला होमसमन्वित सौरसूकसे यापूर्वक पूजन कर एवं वारुणसूतसे प्रसन्नचित्त हो घी, गपु, तिल, यव एवं मधुके साथ पायलसे हवन एवं शान्ति करे और सावधान हो बलि (नैवेद्य) प्रदान करे। ऐसा करनेसे देवतागण मनुष्यों के कल्याणकी कामना करते हैं एवं उनके लिये लक्ष्मीकी वृष्टि करते हैं। जो मनुष्य भगवान् दिवाकरका ध्यान कर इस शान्ति-अध्यायको पढ़ता या सुनता है, वह रणमें शत्रुपर विजयी हो परम सम्मानको प्राप्त कर एकच्छत्र शासक होकर सदा आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है। वह पुत्र- पौत्रोंसे प्रतिष्ठित होकर आदित्यके समान तेजस्वी एवं प्रभासमन्वित व्याधिशून्य जीवन-यापन करता है। वीर! जिसके कल्याणके उद्देश्यसे इस शान्तिकाध्याय (शान्तिकल्प) का पाठ किया जाता है, वह वात-पित्त, कफजन्य रोगोंसे पीड़ित नहीं होता एवं उसकी न तो सर्पके दंशसे मृत्यु होती है और न अकालमें मृत्यु होती है। उसके शरीरमें विषका प्रभाव भी नहीं होता एवं जड़ता, अन्धत्त्व, मूकता भी नहीं होती। ठत्पत्ति-भय नहीं रहता और न किसीके द्वारा किया गया अभिचार-कम सफल होता है। रोग, महान् उत्पात, महाविषैले सर्प आदि सभी इसके श्रवणसे शान्त हो जाते हैं। सभी गङ्गादि तीर्थोका जो विशेष फल है, उसका कई गुना फल इस शान्तिकाध्यायके प्रवणसे प्रास होता है और दस राजसूय एवं अन्य यज्ञोंका फल भी उसे मिलता है। इसे सुननेवाला सौ वर्षतक व्याधिरहित नीरोग होकर जीवनयापन करता है। गोहत्यारा, कृतघ्न, ब्रह्माघाती, गुरुतल्यगामी और शरणागत, दोन, आर्त, मित्र तथा विश्वासी व्यक्तिके साथ पात करनेवाला, दुए, पापाचारी, पितृवातक एवं मातृघातक सभी इसके प्रवणसे निःसंदेह पापमुक्त हो जाते हैं। यह अग्निकार्ग अतिशय ततम एवं पण पुण्यमय है। (अध्याय १४-१५०)