भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! अब मैं तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध, आनन्द प्रदान करनेवाले, पापोंका नाश करनेवाले.आर्द्रानन्दकरी तृतीयाव्रतका वर्णन करता हूँ। जब किसी भी महीने में शुक्ल पक्षकी तृतीयाको पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़ अथवा रोहिणी या मृगशिरा नक्षत्र हो तो उस दिन यह व्रत करना चाहिये। उस दिन कुश और गन्धोदकसे लानकर श्वेत चन्दन, श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारणकर उत्तम सिंहासनपर शिव-पार्वतीकी प्रतिमा स्थापित करे। सुगन्धित श्वेत पुष्प, चन्दन आदिसे उनकी पूजा करे। 'वासुदेव्यै नमः, शंकराय नमः' से गौरी-शंकरके दोनों चरणोंकी, 'शोकविनाशिन्यै नमः, आनन्दाय नमः' से पिण्डलियोंकी, 'रम्भायै नमः, शिवाय नमः' से ऊरुकी, 'आदित्यै नमः, शूलपाणये नमः' से कृटिकी, 'माधव्यै नमः, भवाय नमः' से नाभिकी, 'आनन्दकारिण्यै नमः, इन्द्रधारिणे नमः' से दोनों स्तनोंकी, 'उत्कण्ठिन्यै नमः, नीलकण्ठाय नमः' से कण्ठको, 'उत्पलधारिण्यै नमः, रुद्राय नमः' से दोनों हाथोंकी, 'परिरम्भिण्यै नमः, नृत्यशीलाय नमः' से दोनों भुजाओंकी, 'विलासिन्यै नमः, वृषेशाय नमः' से मुखकी, 'सस्मरशीलायै नमः, विश्ववक्त्राय नमः से मुसकानकी, 'मदनवासिन्यै नमः, विश्वधाने नमा' से नेत्रोंकी, 'रतिप्रियायै नमः, ताण्डवेशाय नमा ' से ध्रुवोंकी, 'इन्द्रापयै नमः, हव्यवाहाय नमः' से ललाटकी तथा 'स्वाहायै नमः, पञ्चशराय नमः' कहकर मुकुटकी पूजा करे। तदनन्तर नीचे लिखे मन्त्रसे पार्वती-परमेश्वरकी प्रार्थना करे-
विश्वकायौ विश्वमुखौ विश्वपादकरौ शिवौ।
प्रसन्नवदनौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।
(उत्तरपर्व २७॥ १३)
'विश्व जिनका शरीर है, जो विश्वके मुख, पाद और हस्तस्वरूप तथा मङ्गलकारक हैं, जिनके मुखपर प्रसनता झलकती रहती है, उन पार्वती और परमेश्वरकी मैं वन्दना करता हूँ।
इस प्रकार पूजनकर मूर्तियोंके आगे अनेक
प्रकारके कमल, शङ्ख, स्वस्तिक, चक्र आदिका चित्रण करे गोमूत्र, गोमय, दूध, दही, घी, कुशोदक, गोशृंगोदक, बिल्वपत्र, घड़ेका जल, खसका जल, यवचूर्णका जल तथा तिलोदकका क्रमश: मार्गशीर्ष आदि महीनों में प्राशन करे, अनन्तर शयन करे। यह प्राशन प्रत्येक पक्षको द्वितीयाको करना चाहिये। भगवान् उमा-महेश्वरकी पूजाके लिये सर्वत्र श्वेत पुष्पको श्रेष्ठ माना गया है। दानके समय यह मन्त्र पढ़ना चाहिये-
गौरी मे प्रीयता नित्यमधनाशाय मङ्गला।
सौभाग्यायास्तु ललिता भवानी सर्वसिद्धये ।।
(उत्तरपर्व २७। १९)
'गौरी नित्य मुझपर प्रसन्न रहे, मङ्गला मेरे पापाका विनाश करें। ललिता मुझे सौभाग्य प्रदान
करें और भवानी मुझे सब सिद्धियाँ प्रदान करें।' वर्षक अन्तमें लवण तथा गुड़से परिपूर्ण घट, नेत्रपट्ट, चन्दन, दो श्वेत वस्त्र, ईख और विभिन्न फलोंके साथ सुवर्णकी शिव-पार्वतीकी प्रतिमा सपत्नीक ब्राह्मणको दे.और 'गौरी में प्रीयताम्' ऐसा कहे। शय्यादान भी करे।
इस आर्द्रानन्दकरी तृतीयाका व्रत करनेसे पुरुष शिवलोकमें निवास करता है और इस लोकमें भी धन, आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य और सुखको प्राप्त करता है। इस व्रतको करनेवालोंको कभी शोक नहीं होता। दोनों पक्षोंमें विधिवत् पूजनसहित इस व्रतको करना चाहिये। ऐसा करनेसे रुद्राणीके लोककी प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति इस विधानको सुनता और सुनाता है, वह गन्धर्वोसे पूजित होता हुआ इन्द्रलोकमें निवास करता है। जो कोई स्त्री इस व्रतको करती है, वह संसारके सभी सुखोंको भोगकर अन्तमें अपने पतिके साथ गौरीके लोकमें निवास करती है। (अध्याय २७)