भविष्य पुराण

अचलासप्तमी-व्रत-कथा तथा व्रत-विधि

राजा युधिष्ठिरने पूछा-भगवन्! आपने सभी उत्तम फलोंको देनेवाले माघस्नानका विधान बतलाया था, परंतु जो प्रात:काल स्नान करने में समर्थ न हो तो वह क्या करे? स्त्रियाँ अति सुकुमारी होती हैं, वे किस प्रकार मानानका कष्ट सहन कर सकती हैं ? इसलिये आप कोई ऐसा उपाय बतायें कि थोड़ेसे परिश्रमसे भी नारियोंको रूप, सौभाग्य, संतान और अनन्त पुण्य प्रास हो जाय।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज ! मैं अचला-सप्तमीका अत्यन्त गोपनीय विधान आपको बतलाता हूँ, जिसके करनेसे सब उत्तम फल प्राप्त हो जाते हैं। इस सम्बन्धमें आप एक कथा सुने

मगध देशामें अति रूपवती इन्दुमतो नामको एक वेश्या रहती थी। एक दिन वह वेश्या प्रात:काल बैठी-बैठी संसारकी अनवस्थिति (नवरता)-का इस प्रकार चिन्तन करने लगी-देखो। यह विषवरूपी संसार सागर कैसा भयंकर है, जिसमें डूबा हुए जीव जन्म मृत्यु जरा आदिरो तथा जल जन्तुओसे पीड़ित होते हुए भी किसी प्रकार पार उतर नहीं पाते। अहाजीके द्वारा निर्मित यह प्राणिसमुदाय अपने किये गये कर्मरूपी ईधनसे एवं कालरूपी अग्निसे दग्ध कर दिया जाता है। प्राणियोंके जो धर्म, अर्थ, कामसे रहित दिन व्यतीत होते हैं, फिर वे कहाँ वापस आते हैं? जिस दिन स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण आदि सत्कर्म नहीं किया जाता, वह दिन व्यर्थ है। पुत्र, स्त्री, घर, क्षेत्र तथा धन आदिको चिन्ता में सारी आयु बीत जाती है और मृत्यु आकर धर दबोचती है।

 इस प्रकार कुछ निर्विषण-उद्विग्न होकर सोचती विचारती हुई वह इन्दुमती वेश्या महर्षि वसिष्ठ के आश्रम में गयी और उन्हें प्रणामकर हाथ जोड़कर कहने लगी 'महाराज ! मैंने न तो कभी कोई दान दिया, न जप, तप, ब्रत, उपवास आदि सत्कर्मोका अनुष्ठान किया और न शिव, विष्णु आदि किन्हीं देवताओंकी आराधना की, अब मैं इस भयंकर संसारसे भयभीत होकर आपकी शरण आयी हूँ, आप मुझे कोई ऐसा ब्रत बतलायें, जिससे मेरा उद्धार हो जाय।'

वसिष्ठजी बोले-'वरानने ! तुम माघ मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमीको स्नान करो, जिससे रूप, सौभाग्य और सदति आदि सभी फल प्रास होते

१-आरोग्य भास्करादिच्छेदनमिच्छेद्भुताशनात् ।

शंकराचानामिकेतु गतिमिच्छेज-गर्दनात्।।

(उत्तरपर्व ५२।३९)

२-भविष्यपुराणका यह अध्याय मत्स्यपुराण (अ०६८)-से प्रायः मिलता है।

३-यह रातमी पुराणोंमें रथ, सूर्य, भानु, अकं, महतो, पुत्रसाम्मा आदि अनेक नाहोंको विख्यात है और अनेक पुराणों में उन-उन नामोंसे अलग-अलग विधियाँ निदिए हैं, जिनसे सभी अभिलाषाएं पूरी होती है।

४-पुराणों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध ।। नापमानाको विस्तृत विधि यद्यपुराण के उत्तरगड एवं वायुपुराणमें प्राप्त होता है। इनमें बड़ी सुन्दर एवं क्षेत्र कथाएँ हैं।

हैं। षष्ठीके दिन एक बार भोजनकर सप्तमीको प्रात:काल ही ऐसे नदीतट अथवा जलाशयपर जाकर दीपदान और मान करो, जिसके जलको किसीने सानकर हिलाया न हो, क्योंकि जल मलको प्रश्चालित कर देता है। बादमें यथाशक्ति दान भी करो। इससे तुम्हारा कल्याण होगा।' वसिष्ठजीका ऐसा वचन सुनकर इन्दुमती अपने घर वापस लौट आयी और उनके द्वारा बतायी गयी विधिके अनुसार उसने स्नान-ध्यान आदि कर्मोंको सम्पत्र किया। ससमीके नानके प्रभावसे बहुत दिनोंतक सांसारिक सुखोंका उपभोग करती हुई वह देह त्यागके पश्चात् देवराज इन्द्रकी सभी अप्सराओंमें प्रधान नायिकाके पदपर अधिष्ठित हुई। यह अचलासप्तमी सम्पूर्ण पापोंका प्रशमन करनेवाली तथा सुख-सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाली है।

राजा युधिष्ठिरने पूछा- भगवन्! अचलासप्तमीका माहात्म्य तो आपने बतलाया, कृपाकर अब नानका विधान भी बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज षष्ठौके दिन एकभुक्त होकर सूर्यनारायणका पूजन करे। यथासम्भव ससमीको प्रात:काल हो उठकर नदी या सरोवरपर जाकर अरुणोदय आदि वेलामें बहुत सबेरे ही स्नान करनेकी चेष्टा करे। सुवर्ण, चाँदी अथवा ताम्रके पानमें कुसुम्भको रँगी हुई बत्ती और तिलका तेल डालकर दीपक प्रज्वलित करे। उस दीपकको सिरपर रखकर हृदयमें भगवान् सूर्यका इस प्रकार ध्यान करे-

नमस्ते रुद्रूपाय रसानाम्पतये नमः।

वरुणाय नमस्तेऽस्तु हरिवास नमोऽस्तु ते॥

यावजन्म कृतं पापं मया जन्मस् सप्तम्।

तो रोगं च शोकं च माकरी हन्तु सप्तमी।

जननी सर्वभूतानां ससमी सातसप्लिके।

सर्वव्याधिहरे देवि नमस्ते रविमण्डले ॥

(उत्तरपर्व ५३।३३-३५)

तदनन्तर दीपकको जलके ऊपर तैरा दे, फिर स्नानकर देवता और पितरोंका तर्पण करे और चन्दनसे कर्णिकासहित अष्टदल-कमल बनाये। उस कमलके मध्यमें शिव-पार्वतीकी स्थापना कर प्रणव-मन्त्रसे पूजा करे और पूर्वादि आठ दलोंमें क्रमसे भानु, रवि, विवस्वान्, भास्कर, सविता, अर्क, सहखकिरण तथा सर्वात्माका पूजन करे। इन नामोंके आदिमें 'ॐ' कार तथा अन्त में 'नमः' पद लगाये। यथा-'ॐ भानवे नमः', 'ॐ रवये नमः' इत्यादि। इस प्रकार पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा वस्त्र आदि उपचारोंसे विधिपूर्वक भगवान् सूर्यको पूजाकर 'स्वस्थानं गम्यताम्' यह कहकर विसर्जित कर दे। बादमें ताम्र अथवा मिट्टीके पात्रमें गुड़ और घृतसहित तिलचूर्ण तथा सुवर्णका ताल-पत्राकार एक कानका आभूषण बनाकर पात्रमें रख दे। अनन्तर रक्त वस्त्रसे उसे ढंककर पुष्प-धूपादिसे पूजन करे और वह पात्र दौर्भाग्य तथा दुःखोंके विनाशकी कामनासे ब्राह्मणको दे दे। अनन्तर 'सपुत्रपशुभृत्याय मेऽर्कोऽयं प्रीयताम्' पुत्र, पशु, भृत्यसमन्वित मेरे ऊपर भगवान् सूर्य प्रसन्न हो जायँ-ऐसी प्रार्थना करे। फिर गुरुको वस्त्र, तिल, गौ और दक्षिणा देकर तथा यथाशक्ति अन्य ब्राह्मणोंको भोजन कराकर व्रत समाप्त करे।

जो पुरुष इस विधिसे अचलाससमीको स्नान करता है, उसे सम्पूर्ण माध-स्नानका फल प्राप्त होता है। जो इस माहात्यको भक्तिसे कहेगा या सुनेगा तथा लोगोंको इसका उपदेश करेगा, वह उत्तम लोकको अवश्य प्राप्त करेगा। (अध्याय ५३)