राजा शतानीकने पूछा-मुने! साम्बने भगवान् । सूर्यकी प्रतिमाकी प्रतिष्ठा किस प्रकार की ? किसके कथनानुसार उन्होंने भगवान् आदित्यके प्रासादका निर्माण कराया।
सुमन्तु मुनि बोले-चन्द्रभागा नदीसे प्रतिमा प्राप्त करनेके बाद साम्बने देवर्षि नारदका स्मरण किया। स्मरण करते ही वे वहाँ उपस्थित हो गये। साम्बने विधिवत् उनका पूजन-सत्कार आदि करके उनसे पूछा-महाराज! भगवान्के मन्दिरको जो बनवाता है तथा प्रतिमाकी जो प्रतिष्ठा करता है, उन दोनोंका क्या फल है?'
नारदजीने कहा- नरशार्दूल ! जो रमणीय स्थानमें सूर्य-मन्दिरका निर्माण कराता है, वह व्यक्ति सूर्यलोकमें जाता है, इसमें संदेह नहीं।
साम्बने पूछा-सूर्य-मन्दिरका निर्माण किस प्रकार तथा किस स्थानपर कराना चाहिये? आप इसे बतायें। नारद बोले- जहाँ जलराशि निरन्तर विद्यमान रहे, वहाँ मन्दिर बनवाना चाहिये अर्थात् सर्वप्रथम एक विशाल जलाशयका निर्माण कराना चाहिये। यश और धर्मकी अभिवृद्धिके लिये वहीं देवमन्दिरका निर्माण कराना चाहिये। उसके समीप उद्यान एवं पुष्पवाटिका भी लगवाने चाहिये। ब्राह्मण आदि वोंके लिये जैसी भूमि वास्तुशास्त्रको दृष्टिसे प्रासाद निर्माणके लिये वर्णित है, वैसी ही भूमि देवप्रासादके लिये भी प्रशस्त मानी गयी है
सूर्यनारायणका मन्दिर पूर्वाभिमुख बनवाना चाहिये, पूर्वकी ओर द्वार रखने का स्था। न हो तो पश्चिमाभिमुख चनवाये। परंतु मुख्य पूर्वाभिमुख ही है। स्थानको इस प्रकारसे कल्पना करे कि मुख्य मन्दिरसे दक्षिणकी ओर भगवान् सूर्यका स्नान-गृह और उत्तरकी ओर यज्ञशाला रहे । भगवान् शिव और मातृकाका मन्दिर उत्तराभिमुख, ब्रह्माका पश्चिम और विष्णुका उत्तर-मुख बनवाना चाहिये। भगवान् सूर्यके दाहिने पार्श्वमें निक्षुभा तथा बायें पार्श्वमें राज्ञीको स्थापित करना चाहिये। सूर्यनारायणके दक्षिणभागमें पिङ्गल, वामभागमें दण्डनायक, सम्मुख श्री और महाश्वेताकी स्थापना करनी चाहिये। देवगृहके बाहर अश्विनीकुमारोंका स्थान बनाना चाहिये। मन्दिरके दूसरे कक्षमें राज्ञ और औष, तौसरे कक्षमें कल्माष और पक्षी, दक्षिणमें दण्ड और माठर, उत्तरमें लोकपूजित कुबेरको स्थापित करना चाहिये। कुबेरसे उत्तर रेवन्त एवं विनायककी स्थापना करनी चाहिये या जिस दिशामें उत्तम स्थान हो वहींपर उनकी स्थापना करे दाहिनी एवं बायीं ओर अर्ध्य प्रदान करनेके लिये दो मण्डल बनवाये। उदयके समय दक्षिण महल में और अस्तके समय कम मण्डलमें भगवान्को अर्घ्य दे। चक्राकार पीठके ऊपर स्नानगृह में चार कलशोंसे भगवान सूर्य की प्रतिमाको सविधि स्नान कराये। स्नानके समय शङ्ग आदि मङ्गल बाह्य बजाने चाहिये। तीसरे मण्डल में सूर्यनारायणकी पूजा करे। सूर्यनारायणके सामने दिण्डीकी स्थानक (खड़ी हुई) प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। सूर्यनारायणके सम्मुख समीपमें ही सर्वदेवमय व्योमकी रचना करनी चाहिये। मध्याह्न के समय वहाँ सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये अथवा मध्याह्नमें अध्यं देने के लिये चन्द्र नामक तृतीय मण्डल बनाये। प्रथम स्नान कराकर बादमें अध्यं । भगवान सूर्यक समीप ही उचित स्थानपर पुराण का पात करने के लिये स्थान बनाना चाहिये। यह देवताओंके स्थापनका विधान है। गृहराज और सर्वतोभद्र-ये दो प्रासाद सूर्यनारायणको अतिशय प्रिय हैं। (अध्याय १३०)