भविष्य पुराण

साम्बोपाख्यानके प्रसंगमें सूर्यकी अभिषेक-विधि

नारदजी बोले- अब मैं भगवान् सूर्यके स्नपनकी विधि बताता हूँ। वेदपाठी, पवित्र आचारनिष्ठ, शास्त्रमर्मज्ञ, सूर्यभक्त भोजक अथवा अन्य ब्राह्मणों के साथ मण्डलके ईशानकोणमें एक हाथ लम्बा-चौड़ा और ऊँचा भद्रपीठ स्थापित कर देव-प्रतिमाको प्रासादमें लाये और प्रतिमाको उस पीठपर स्थापित करे। मार्गमें 'भद्रं कर्णेभिः आदि माङ्गलिक मन्त्रोंकी ध्वनि होती रहे तथा भाँति-भौतिके वाद्य बजते रहें। अनन्तर समुद्र, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, चन्द्रभागा, सिन्धु, पुष्कर आदि तीर्थों, नदी, सरोवर, पर्वतीय झरनोंके जलसे भगवान् सूर्यको स्नान कराये। आठ ब्राहाण और आठ भोजक सोनेके कलशोंके जलसे स्नान करायें। स्नानके जलमें रख, सुवर्ण, गन्ध, सर्वबीज, सौषधि, पुष्प, ब्राह्मी, सुवर्चला (सूर्यमुखी), मुस्ता, विष्णुकाचा, शतावरी, दूर्वा, मदार, हल्दो, प्रियंग, वच आदि सभी ओषधियाँ डाले। कलशों के मुखपर वट, पीपल और शिरोधके कोमल पल्लवोंको कुशके साथ रखे। भगवान् सूर्यको अध्यय देकर

गायत्री मन्त्रसे अभिमन्त्रित सोलह कलशोंसे स्नान कराये। सुवर्ण कलशके अभावमें चाँदी, ताँबा, मृत्तिकाके कलशोंसे ही स्नान कराना चाहिये। इसके अनन्तर पक्के ईटोंसे बनी हुई वेदीके ऊपर कुश बिछाकर मूर्तिको दो वस्त्र पहनाकर स्थापित करना चाहिये। उस दिन व्रत रखे। मूर्ति स्थापित करनेके पश्चात् निम्र मन्त्राँसे प्रतिमाका अभिषेक करे-

'देव श्रेष्ठ! ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवगण आकाश-गङ्गासे परिपूर्ण जलद्वारा आपका अभिषेक करें। दिवस्यते । भक्तिमान् मरुद्रण मेघजलसे परिपूर्ण द्वितीय कलशसे आपका अभिषेक करें। सुरोत्तम ! विद्याधर सरस्वती के जलसे परिपूर्ण तृतीय कलशके द्वारी आपका अभिषेक करें। देव श्रेष्ठ । इन्द्र आदि लोकपालगण समुद्रके जलसे परिपूर्ण चतुर्थ कलाले आपका अभिषेक करें। नागगण कमलके परागसे सुगन्धित जालसे परिपूर्ण पक्षम फलशसे आपका अभिषेक को। हिमवान् एव सुवर्णाशवरखाले सुमेर आदि पर्वतगण दक्षिण-पश्चिममें स्थित ने मला आकार करें। आकाशचारी समर्धिगण पद्मपरागसे सुगन्धित सम्पूर्ण तीर्थ-जलोंसे परिपूर्ण सप्तम घटके द्वारा आपका आभिषेक करें। आठ प्रकारके मङ्गलसे समन्वित अष्टम कलशसे वसुगण आपका अभिषेक करें। हे देवदेव! आपको नमस्कार है*।'

इसी प्रकार एक ताम्रके पात्र में पञ्चगव्य बनाकर स्नान कराये। वैदिक मन्त्रोंसे गोमूत्र, गोमय, दूध, दही, कुशोदक लेकर ताम्रके नवीन पात्रमें पञ्चगव्य बनाकर सूर्यनारायणको स्नान कराये। मन्त्रसे गन्धयुक्त जलसे स्नान कराये, अनन्तर शुद्धोदक-स्नान कराये तथा रक्त वस्त्र एवं अलंकारसे अलंकृत कर इस प्रकार आवाहन करे-

एह्येहि भगवन् भानो लोकानुग्रहकारक।

यज्ञभागं गृहाण त्वमग्निदेव नमोऽस्तु ते॥

'भगवन् ! लोकानुग्रहकारक भानो! आप आयें, इस यज्ञभागको ग्रहण करें, भगवान् सूर्यदेव! आपको नमस्कार है।'

तदनन्तर सुवर्णपात्रके द्वारा सूर्यदेवको अर्घ्य प्रदान करें। पहले मिट्टीके कलशसे, अनन्तर ताम्र- कलशसे फिर पंजत कलशसे और अन्तमें सुवर्णके कलशसे मन्त्रीद्वारा अभिषेक करे। सम्पूर्ण तीर्थोदक

और सर्वांषधिसे युक्त शङ्कको सूर्यदेवके मस्तकपर भ्रमण कराये और उसके जलसे स्नान कराये, अनन्तर पुष्प और धूप देकर जल, दूष, घृत, शहद और इक्षुरससे स्नान कराये।

इस प्रकारसे सूर्यदेवको स्नान करानेवाला पुरुष अनिष्टोम, ज्योतिष्टोम, वाजपेय, राजसूय और अश्वमेध-यज्ञके फलको प्राप्त करता है। जो स्रानके समय सूर्यदेवका भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह भी पूर्वोक्त फल प्राप्त करता है। ऐसे स्थान में स्नान कराना चाहिये जहाँ स्नानके जलका कोई लङ्घन न कर सके और स्नानके जल, दही, दूधको कुत्ता, कौआ आदि निन्दित जीव भक्षण न कर सकें।

इस प्रकारके मानविधिके सम्पादनके लिये जिस प्रकारके ब्राह्मण और भोजककी आवश्यकता होती है, उनका लक्षण सुनें-

वह व्यक्ति विकलाङ्ग अर्थात् न्यूनाधिक अङ्गवाला न हो। वेदादि-शास्त्रों का ज्ञाता, सुन्दर, कुलीन और आर्यावर्त देशमें उत्पन्न हो। गुरुभक्त, जितेन्द्रिय, तत्त्ववेता और सूर्यसम्बन्धी शास्त्रोंका ज्ञाता हो। ऐसे श्रेष्ठ ब्राहाणसे मान और प्रतिष्ठा करानी चाहिये। (अध्याय १३५)