सूतजी कहते हैं-द्विजगणो! अब मैं यागादिके निमित्त निर्मित होनेवाले मण्डपोंकी प्रतिष्ठा-विधि मतलाता हूँ। वह मण्डप शिलामय हो या काष्ठमय अथवा तृण-पत्रादिसे निर्मित हो। ऐसी स्थिति में अधिवासनके प्रारम्भमें शुभ-लग्न-मुहूर्तमें घट-स्थापन करे। उस कलशपर सूर्य, सोम और विष्णुको अर्चना करे। 'आपो हि ष्ठा' (यजुः ११।५०) इस मन्त्रद्वारा कुशोदकसे तथा आप्यायस्कः' (यजु० १२।११४) इस मन्त्रद्वारा सुगन्ध-जलसे प्रोक्षण करे। 'गन्धद्वारा०' (श्रीसूक्त ९) इस ऋचासे चन्दन, सिन्दूर, आलता और अञ्जन समर्पण करे। फिर दूसरे दिन प्रात: वृद्धि-श्राद्ध करे। शुभ लक्षणवाले मण्डपमें दिक्पालाकी स्थापना करे। मध्यमें वेदीके ऊपर मण्डल चित्रित करे। उसमें सूर्य, सोम, विष्णुको तथा कलशपर गणेश, नवग्रह आदिकी पूजा करे। सूर्यके लिये १०८ बार पायस-होम करे। विष्णु और सोमका उद्देश्य कर बारह आहुतियाँ एवं पायस-बलि दे। वास्तु-देवताका पूजन करें और उनको अर्घ्य देकर विधिवत् आहुति प्रदान करे, फिर उस मण्डलको संकल्पपूर्वक योग्य ब्राह्मणके लिये समर्पित कर दे। उसे विधिवत् दक्षिणा दे और सूर्यके लिये अर्ध्य प्रदान करे। तृण-मण्डपमें विशेषरूपसे वासुदेवके साथ भगवान् सूर्यको पूजा करे। एक घटके ऊपर वरदायक भगवान् गणेशजीको पूजा कर विसर्जन करे। ईशानकोणमें यूप स्थापित कर सभी दिशाओमें ध्वजा फहराये।
नाहाणो। अब मैं चार हाथसे लेकर सोलह हाथके प्रमाणमें निर्मित महायूपको एवं पौसला
तथा कुएँ आदिकी प्रतिष्ठा-विधि बतला रहा हूँ। इनकी प्रतिष्ठामें गर्ग-त्रिरात्र यज्ञ करना चाहिये। पौंसलेके पश्चिम भागमें श्वेत कुम्भपर भगवान् वरुणको स्थापित कर 'गायत्री' मन्त्र तथा 'आपो हि ष्ठा' (यजु ११ । ५०) इन मन्त्रोंसे उन्हें स्नान कराना चाहिये। उसके बाद गन्ध, तेल, पुष्प और धूप आदिसे मन्त्रपूर्वक उनकी अर्चना कर उन्हें वस्त्र, नैवेद्य, दीप तथा चन्दन आदि निवेदित करना चाहिये। प्रतिष्ठाके अन्तमें श्राद्ध कर एक ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराना चाहिये। आठ हाथका एक मण्डप बनाकर उसमें कलशकी स्थापना करे। उसपर नारायणके साथ वरुण, शिव, पृथ्वी आदिका तत्तद् मन्त्रोंसे पूजन करे, उसके बाद स्थालीपाक-विधानसे हवनके लिये कुशकण्डिका करे। भगवान् बरुणका पूजन कर खुवाद्वारा उन्हें 'वरुणस्य' (यजुः ४ । ३६) इत्यादि मन्त्रोंसे दस आहुतियाँ प्रदान करे। अन्य देवताओंके लिये क्रमश: एक-एक आहुति दे। उसके बाद स्विष्टकृत् हवन करे और अग्निकी सप्तजिह्वाओंके नामसे चरुका हवन करे। तदनन्तर सभीको नैवेद्य और बलि प्रदान करें। इसके पश्चात् संकल्प-वाक्य पढ़कर कूपका उत्सर्जन कर दे। ब्राहाणोंको पयस्विनी गाय एवं दक्षिणा प्रदान करे। यदि छोटे कूपकी प्रतिष्ठा करनी हो तो गणेश तथा वरुणदेवताकी कलशके ऊपर विधिवत् पूजा करनी चाहिये। लाल सूत्रसे कलशको वेरित करना चाहिये। यूप स्थापित करनेके पश्चात् संकल्पपूर्वक कूपका उत्सर्जन करना चाहिये। ब्राहाणोंको विधिवत् सम्मानपूर्वक दक्षिणा देनी चाहिये। (आध्याय १२-१३)