भविष्य पुराण

द्वादश रविवारोंका वर्णन और नन्दादित्य-व्रतकी विधि

दिण्डीने ब्रह्माजीसे पूछा-ब्रह्मन् ! जो मनुष्य पुन आदित्यवारके दिन श्रद्धा-भक्तिसे सूर्यदेवका स्रान दानादि कर पूजन करते हैं, उनको कौन-सा फल प्राप्त होता है? और जिस वारके संयोगसे सप्तमी  तिथि विजया कहलाती है, उसके माहात्म्यका आप

पुनः वर्णन करें।

ब्रह्माजीने कहा-दिण्डिन्! जो मनुष्य आदित्यवारको श्राद्ध करते हैं, वे सात जन्मतक नीरोग रहते हैं तथा जो नक्तव्रत एवं आदित्यहदयकार पाठ करते हैं, वे रोगसे मुक्त हो जाते हैं और सूर्यलोकमें

१-प्रणिधाय शिरो भूमौ नमस्कारपरो रवेः ।

तत्क्षणात् सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥

(ब्राह्मपर्व ८०।१०)

२-भविष्यपुराणके नाम से प्राप्त होनेवाले स्तोत्रोंमें 'प्रोआदित्यइदय-स्तोत्र' का अत्यधिक प्रचार है और इसकी प्रसिद्धि प्राचीन कालमें भी इतनी अधिक थी कि महर्षि पराशरने सूर्यकी दशा-अन्नदशाओंमें शान्ति के लिये सर्वत्र इसी स्तोत्रके उपका निर्देश दिया यह स्तोत्र प्राय: दो सौ श्लोकोंमें उपनिबद्ध है। इसके पाठसे मनुष्य दुःख-दारिदय तथा कुष्ठ आदि असाध्य रोगोंसे मुक्त होकर महासिद्धिको प्राप्त कर लेता है। इस स्तोत्रमें भगवान् सूर्यको महिमा, अर्घ्यदानविधि आदिका सुन्दर वर्णन है। इसका मण्डलाष्टक न्यड़ा हो सुन्दर है। इसके पाठसे भगवान् सूर्यमें श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। सूर्योपासना इस 'आदित्यहृदय' का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

निवास करते हैं। उपवास रखकर जो महाश्वेता मन्त्रका जप करते हैं, वे मनोवाञ्छित फलको प्राप्त करते हैं। आदित्यवारके दिन महाश्वेता-मन्त्र तथा षडक्षर- मन्त्र 'ॐ खखोल्काय स्वाहा' का जप करनेसे नि:संदेह सूर्यलोकको प्राप्ति होती है।

सूर्यनारायणके द्वादश वार इस प्रकार हैं- नन्द, भद्र, सौम्य, कामद, पुत्रद, जय, जयन्त, विजय, आदित्याभिमुख, हृदय, रोगहा एवं महाश्वेता- प्रिय। माघ शुक्लपक्षकी षष्ठीकी नन्दसंज्ञा है। ठस दिन नक्तव्रत करके घृतसे सूर्यनारायणको स्रान कराना चाहिये तथा श्वेत चन्दन, अगस्त्यके है पुष्प, गुग्गुल-धूपं आदिसे पूजन करके अपूप आदिका नैवेद्य समर्पित करना चाहिये। ब्राह्मणको  अपूप देकर स्वयं भी मौन धारण कर भोजन करना चाहिये। गेहूँके अथवा यवके चूर्णमें घृत  तथा खाँड़ या शक्कर मिलाकर अपूप बनाना चाहिये और उसीका नैवेद्य सूर्यनारायणको निवेदित  कर निम्र मन्त्र पढ़ते हुए ब्राह्मणको वह नैवेद्य दे देना चाहिये-

आदित्यतेजसोत्पत्र राजीकरविनिर्मितम्।

श्रेयसे मम विप्र त्वं प्रतीक्षापूपमुत्तमम्॥

(ब्राह्मपर्व ८२।१८)

ब्राह्मण नैवेद्य ग्रहण कर ले, तदनन्तर उस नैवेद्यको निम्न मन्त्र पढ़ते हुए पूजकको दे-

कामदं सुखद धयं धनदं पुत्रदं तथा।

सदास्तु ते प्रतीच्छामि मण्डक भास्करप्रियम्॥

(ब्राह्मपर्व ८२११९)

उपर्युक्त दोनों मन्त्र ग्रहण करने और समर्पित करनेके लिये हैं। नन्दवारका यह विधान कल्याणकारी है। जो इस विधिसे सूर्यदेवकी पूजा करता है, उसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। उसकी संततिका कभी क्षय नहीं होता अर्थात् उसकी कुल परम्परा पृथ्वीपर चलती रहती है तथा उसके वंशमें दारिद्रय एवं रोग भी नहीं होते। सूर्यलोक प्राप्त करनेके पक्षात् पुनर्जन्म होनेपर वह पृथ्वीका राजा होता  है। इस पूजन-विधानको पढ्ने अथवा श्रवण करनेसे भी कल्याण होता है एवं दिव्य अचल लक्ष्मीको प्राप्ति होती है। (अध्याय ८२)