भगवान् श्रीकृष्ण कहते है-राजन् ! अब मैं पापहारी एवं श्रेष्ठ सुवर्णाचलकी दान-विधि बतला रहा हूँ, जिससे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। एक हजार पलका सुवर्णाचल उत्तम, पाँच सौ पलका मध्यम और ढाई सौ पलका अधम (साधारण) माना गया है। अल्प वित्तवाला भी अपनी शक्तिके अनुसार गर्वरहित होकर एक पलसे कुछ अधिक सोनेका पर्वत बनवा सकता है। नृपश्रेष्ठ ! शेष सारे कार्योका विधान धान्यपर्वतकी भाँति ही करना चाहिये। उसी प्रकार विष्कम्भपर्वतोंकी भी स्थापना कर इन मन्त्रोंसे प्रार्थना करे-
नमस्ते ब्रह्मबीजाय ब्रह्मगर्भाय वै नमः॥
यस्मादनन्तफलदस्तस्मात् पाहि शिलोच्चय।
यस्मादग्नेरपत्यं त्वं यस्मात् तेजो जगत्पतेः ।।
हेमपर्वतरूपेण तस्मात् पाहि नगोत्तम।
(उत्तरपर्व १९८।४-६)
'शिलोच्चय! तुम ब्रह्मके बीजरूप हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारे गर्भमें ब्रह्मा स्थित रहते हैं, अत: तुम्हें प्रणाम है। तुम अनन्त फलके दाता हो, इसलिये मेरी रक्षा करो। जगत्पति पर्वतोत्तम! तुम अग्निकी संतान और जगदीश्वर शिवके तेज:स्वरूप हो, अत: सुवर्णाचलके रूपसे मेरा पालन करो।'
जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे सुवर्णाचलका दान करता है, वह परम शिवलोकमें जाता है और वहाँ सौ वर्षोंतक निवास करनेके पक्षात् परमगतिको प्राप्त होता है।
राजन्! इसके बाद मैं तिलशैलदान-विधि बतला रहा हूँ, जिससे मनुष्य उत्तम विष्णुलोकको प्राप्त होता है। तिल अत्यन्त पवित्र हैं, पवित्रोको भी पवित्र करनेवाले हैं। तिलकी उत्पत्ति विष्णुके शरीरसे हुई है, इसलिये इन्हें उत्तम बतलाया गया है। मधु-कैटभ नामके दो राक्षस दितिके पुत्र थे। भगवान् विष्णुके साथ मधु दैत्यका अनवरत युद्ध चलता रहा। फिर भी दानव मरा नहीं। इसपर भगवान् विष्णु अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। उनके शरीरसे स्वेदको बूंदें पृथिवीपर गिरी और इधर-उधर बिखर गयी। उसीसे तिल, उड़द एवं कुश उत्पन्न हुए। भगवान् विष्णुने बलवानोंमें बली उस मधुको मार डाला। उसी मधुके मेद (चर्बी)-से सम्पूर्ण पृथ्वी रैंग गयी। इसलिये पर्वतोंको धारण करनेवाली पृथ्वीका नाम मेदिनी पड़ा । जब मधु दैत्य मारा गया तो सभी देवता प्रसन्न हो भगवान् विष्णुकी स्तुति करते हुए कहने लगे-'देव! आपने ही संसारको धारण किया है। संसारकी सृष्टि आपने ही की है। मधुसूदन! यह सारा संसार अन्तमें आपमें ही लीन होता है। संसारका कल्याण करनेके लिये ये तिल आपके ही अङ्गसे उद्भूत हैं। देवेश! आप हम सबकी रक्षा करें।'
देवताओंकी यह स्तुति सुनकर भगवान् विष्णुने कहा-देवगणो! ये तिल तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले हैं। शुक्लपक्षमें देवताओंको और कृष्णपक्षमें पितरोंको तिलोदक देना चाहिये। सात या आठ बार तिलोदककी अञ्जलि देनेसे देवता और पितर संतुष्ट हो जाते हैं और देनेवालेका मङ्गल करते हैं। कुते, कौए और पतितोंसे दूषित वस्तु तिलोंके अभ्युक्षण करनेसे पवित्र हो जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं। इस प्रकार जो तिलपर्वतका दान ब्राह्मणको करता है, उसका दिया हुआ दान अक्षय होता है।
राजेन्द्र ! दस द्रोण तिलका बना हुआ तिलशैल
१-देवीभागवत, हरिवंश आदि पुराणोंमें मधुके मेदसे उत्पन्न होने के कारण पृथ्वीका नाम मादना पड़ा। यहां भी बड़ा पाव
२-श्वकाकोपहतं यच्च पतितादिभिरेव च ।
तिलरभ्युक्षितं सर्व पवित्रं स्यान्न संशयः ।।
(उत्तरपर्व १९९ । १५)
उत्तम, पाँच द्रोणका मध्यम और तीन द्रोणका कनिष्ठ बतलाया गया है। इसके चारों दिशाओंमें विष्कम्भपर्वतोंकी स्थापना तथा अन्यान्य सारा कार्य पूर्ववत् करना चाहिये। नृपश्रेष्ठ ! तिलाचलकी प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिये-
यस्मान्मधुवधे विष्णोर्देहस्वेदसमुद्भवाः।
तिलाः कुशाच माघाश्च तस्माच्छं नो भवन्त्विह॥
हव्ये कव्ये च यस्माच्च तिलैस्वाभिमन्त्रणम्।
भवादुद्धर शैलेन्द्र तिलाचल नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व १९९ । १९-२०)
'चूँकि मधुदैत्यके वधके समय भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुए पसीनेकी बूंदोंसे तिल, कुश और उड़दकी उत्पत्ति हुई थी, इसलिये तुम इस लोकमें हम सबका कल्याण करो। शैलेन्द्र तिलाचल! चूंकि देवताओंके हव्य और पितरोंके कव्य-दोनोंमें तिलोंसे ही अभिमन्त्रण किया जाता है, इसलिये तुम मेरा भवसागरसे उद्धार करो, तुम्हें नमस्कार है।'
इस प्रकार आमन्त्रित कर जो मनुष्य श्रेष्ठ तिलाचलका दान करता है, वह पुनरागमनरहित विष्णुपदको प्राप्त हो जाता है। उसे इस लोकमें दीर्घायुकी प्राप्ति होती है, वह पुत्र एवं पौत्रोंको प्राप्त कर उनके साथ आनन्द मनाता है तथा अन्तमें देवताओं, गन्धर्वो और पितरोंद्वारा पूजित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है। इस दानके माहात्म्यको सुननेसे कपिलादानका पुण्य प्राप्त होता है। (अध्याय १९८-१९२)