भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! अब मैं भक्ति और स्नेहसे दासीदानकी विधि बता रहा हूँ। चारों आश्रमोंमें गृहस्थ आश्रम श्रेष्ठ है। इसमें गृह ही मुख्य है, गृहमें भी गृहिणीकी प्रधानता है। वह स्त्री भी यदि शील तथा विनय आदिसे सम्पन्न और सदाचारिणी हो तो फिर क्या कहना? जिस घरमें स्त्रियोंका आदर-सत्कार होता है, वहाँ देवगण आनन्दमग्न होकर निवास करते हैं और जहाँ इनका अनादर होता है, वह घर नष्ट हो जाता है। अपमानित नारी जिस घरको शाप देती है, वह घर मानो कृत्याके द्वारा शीघ्र ही पराभवको प्राप्त हो जाता है*। सदाचारिणी श्रेष्ठ स्त्रीको कोई पुण्यवान् ही प्राप्त करता है। जिस घरमें सुवर्ण, श्रेष्ठ दासी, अन्न, बालक और दही, दूध आदि गव्य पदार्थ न हों, उस घरको साक्षात् नरक ही जानना चाहिये। अधिपतिके बिना गाँव, दासीके बिना घर और घीके बिना भोजन-ये तीनों व्यर्थ हैं। जिस घरमें दासियाँ सत्कृत होती हों, वहाँ साक्षात् कमलहस्ता लक्ष्मीका वास होता है। जिस घरमें शौच, आचार, व्यवहार शुद्ध हो, दास-दासियोंका भलीभाँति पोषण होता हो, उस घरमें लक्ष्मी निवास करती हैं। जिसकी बुद्धि धर्ममें लगी हुई है, उसका चित्त कभी आकुल नहीं होता। जिस घरमें भार्या गृहस्थ व्यवहारमें
*जामयो पत्र पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रतास्तु न पूज्यन्ते विनश्यत्याशु तद् गृहम् ॥
जामयो यानि गेहानि शपत्यप्रतिपूजिताः ।
तानि कृत्याहतानीय सद्यो यान्ति पराभवम् ।
(उत्तरपर्व ११॥४-५)
कुशल हो, दासियों अपने-अपने काममें तत्पर हों और सेवक सदा उद्यमी हों, उस घरमें धर्म, अर्थ एवं कामका निवास होता है। वेदोंमें कहा गया है कि जो स्वयंको प्रिय हों, उन पदार्थोंका दान देना चाहिये। इस बातका विचारकर पर्वकाल सौम्यग्रहयुक्त स्थिर नकत्रों में श्रेष्ठ दासीका ब्राह्मणको दान करना चाहिये। दासी-दान करनेवाला अप्सरालोकमें निवास करता है। (अध्याय १७१)