भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी यष्ठीको यह व्रत होता है। उस दिन उत्तम रूप, सौभाग्य और संतानकी इच्छावाली स्त्रीको चाहिये कि वह नदीमें स्नान करे और एक नये बाँसके पात्रमें बालू लेकर घर आये। फिर वस्त्रका मण्डप बनाकर उसमें दीप प्रचलित करे। मण्डपमें वह बाँसका बालुकामय पात्र स्थापित कर उसमें बालुकामयो, तपोवन-निवासिनी भगवती ललितागौरीका ध्यानकर पूजन करे और उस दिन उपवास रहे, तदनन्तर चम्पक, करवीर, अशोक, मालती, नीलोत्पल, केतकी तेथा तगर- पुष्प-इनमेंसे प्रत्येककी १०८ या २८ पुष्पाञ्जलि अक्षतोंके साथ निलिखित मन्त्रसे दे-
ललिते ललिते देवि सौख्यसौभाग्यदायिनि।
या सौभाग्यसमुत्पन्ना तस्यै देव्यै नमो नमः ॥
(उत्तरपर्व ४१14)
इस प्रकारसे पूजन करके पश्चात् तरह-तरहके सोहाल, मोदक आदि पकान, कूष्माण्ड ककड़ी, बिल्व, करेला, बैगन, करंज आदि फल भगवती ललिताको निवेदित करे और धूप, दीप, वस्त्राभूषण आदि भी समर्पित करे। इस विधिसे पूजनकर रात्रिको जागरण करे तथा गीत-नृत्यादि उत्सव करे। दूसरे दिन प्रातः गीत-वाद्यसहित मूर्तिको नदीके समीप ले जाय। वहाँ पूजनकर पूजन सामग्री ब्राह्मणको निवेदित कर दे और भगवती ललिताकी बालुकामयी मूर्तिको नदीमें विसर्जित कर दे। घर आकर हवन करे और देवता, पितर, मनुष्य तथा सुवासिनी स्त्रियोंका पूजन करे। पंद्रह कुमारी कन्याओंको और उतने ही ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके स्वादिष्ट भोजनोंसे संतुष्ट कर दक्षिणा प्रदान करे और 'ललिता प्रीतियुक्ता अस्तु' यह कहकर उन्हें बिदा करे। जो पुरुष अथवा स्त्री इस ललिताषष्ठी-व्रतको करते हैं, उन्हें संसार में कोई पदार्थ दुर्लभ नहीं रहता। व्रत करनेवाली स्त्री बहुत कालपर्यन्त सुख सौभाग्यसे सम्पन्न रहकर अन्तमें गौरीलोकमें निवास करती है। (अध्याय ४१)
* मत्यपुराणके अध्याय 79 में मन्दारप्तमी नामसे इसी व्रतका वर्णन हुआ है।