भविष्य पुराण

काश्यपके उपाध्याय, दीक्षित आदि दस पुत्रोंका नामोल्लेख, मगधके राजवंश  और बौद्ध राजाओंका तथा चौहान  और परमार आदि राजवंशोका वर्णन

शौनकजीने पूछा-महाराज! ब्रह्मावर्तम म्लेच्छगण क्यों नहीं आ सके, इसका कारण बतायें।

सूतजी बोले-मुने! सरस्वतीके प्रभावसे वे सब वहाँ नहीं आ सके। वहाँ काश्यप नामके एक ब्राह्मण रहते थे। वे कलिके हजार वर्ष बीतनेपर देवताओंकी आज्ञासे स्वर्गलोकसे ब्रह्मावर्तमें आये। उनकी धर्म-पत्नीका नाम था आर्यावती। उससे काश्यपके दस पुत्र उत्पन्न हुए, उनके नाम इस प्रकार हैं-उपाध्याय, दीक्षित, पाठक, शुक्ल, मिश्र, अग्निहोत्री, द्विवेदी, त्रिवेदी, पाण्ड्य तथा चतुर्वेदी। वे अपने नामके अनुरूप गुणवाले थे। उनके पिता काश्यप, जो सभी ज्ञानोंसे समन्वित और सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता थे, उनके बीच रहकर उन्हें ज्ञान देते रहते थे। काश्यपने काश्मीरमें जाकर जगज्जननी सरस्वतीको रक्त पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य तथा पुष्पाञ्जलिके द्वारा संतुष्ट किया। देवीकी स्तुति करते हुए काश्यपने कहा- 'मातः! शंकरप्रिये! मुझपर आपकी करुणा क्यों नहीं होती? देवि! आप सारे संसारकी माता हैं, फिर मुझे जगत्से बाहर क्यों मानती हैं? देवि! देवताओंके लिये धर्मद्रोहियोंको आप क्यों नहीं मारती हैं? म्लेच्छोंको मोहित कीजिये और उत्तम संस्कृत भाषाका विस्तार कीजिये। अम्ब! आप अनेक रूपोंको धारण करनेवाली है. हुंकारस्वरूपा हैं, आपने धूम्रलोचनको मारा है। दुर्गारूप में आपने भयंकर दैत्योंको मारकर जगत्में सुख प्रदान किया है। माता| आप दम्भ, मोह तथा भयंकर गर्वका नाशकर सुख प्रदान करें और दुष्टोंका नाश करें तथा संसारमें ज्ञान प्रदान करें।'

इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर सरस्वतीदेवीने उन काश्यप मुनिके मनमें निवासकर उन्हें ज्ञान प्रदान किया। वे मुनि मिन देशमें चले गये और उन्होंने वहाँ म्लेच्छोंको मोहित कर उन्हें द्विजन्मा बना लिया। सरस्वतीके अनुग्रहसे उन लोगोंके साथ सदा मुनिवृत्तिमें तत्पर मुनिश्रेष्ठ काश्यपने आर्यदेशमै निवास किया। उन आर्योकी देवीके वरदानस्से बहुत वृद्धि हुई। काश्यप मुनिका राज्यकाल एक सौ बीस वर्षतक रहा। राज्यपुत्र नामक देशमें आठ हजार शूद्र हुए। उनके राजा आर्य पृथु हुए। उनसे ही मागधकी उत्पत्ति हुई। मागध नामके पुत्रका अभिषेककर पृथु चले गये। यह सुनकर भृगु श्रेष्ठ शौनक आदि ऋषि प्रसन्न हो गये। फिर वे पौराणिक सूतको नमस्कार कर विष्णुके ध्यानमें तत्पर हो गये। चार वर्षतक ध्यान में रहकर वे उठे और नित्य नैमित्तिक क्रियाओंको सम्पन्न कर पुनः सूतजीके पास गये और बोले- 'लोमहर्षणजी। अब आप मागध राजाओंका वर्णन करें। किन मागधोंने कलियुगमें राज्य किया, हे व्यासशिष्य। आप हमें यह बतायें।'

सूतजीने कहा- मगध-प्रदेशमें काश्यपपुत्र मागधने पितासे ग्राम राज्यका भार वहन किया। उन्होंने आर्यदेशको अलग कर दिया। पाशाल (पंजाब) से पूर्वका देश मामय देश कहा जाता है। भगवती मानस दिशामे कलिंग (उड़ीसा) दक्षिणा विदेशबाना (गुजरात)

 मुख्यरुपसे गङ्गका उत्तरी भाग है, जो यिजनौरसे लेकर प्रयागतक और उत्तरमें नैमिषारण्यतक फैला है।

यहाँ से लेकर आगे उदया श्वतक मगधके राजवंशका वर्णन है, जिनकी राजधानी राजगृह थी।

पश्चिममें सिन्धुदेश, वायव्य दिशामें कैकयदेश,  उत्तरमें मद्रदेश और ईशानमें कुलिन्द देश है। इस प्रकार आर्यदेशका उन्होंने भेद किया। इस देशका नामकरण महात्मा मागधके पुत्रने किया था। अनन्तर राजाने यज्ञके द्वारा बलरामजीको प्रसन्न किया, इसके फलस्वरूप बलभद्रके अंशसे शिशुनागका जन्म हुआ, उसने सौ वर्षतक राज्य किया। उसे काकवर्मा नामका पुत्र हुआ, उसने नब्बे वर्षतक राज्य किया। उसे क्षेमधर्मा नामका पुत्र हुआ, उसने अस्सी वर्ष राज्य किया। उसका पुत्र क्षेत्रौजा हुआ, उसने सत्तर वर्षतक राज्य किया। उसके वेदमिश्र नामक पुत्र हुआ, उसने साठ वर्षतक शासन किया। उसे अजातरिपु (अजातशत्रु) नामक पुत्र हुआ, उसने पचास वर्षतक राज्य किया। उसका पुत्र दर्भक हुआ, उसने चालीस वर्षतक राज्य किया। उसे उदयाश्वर नामका पुत्र हुआ, उसने तीस वर्षतक शासन किया। उसका पुत्र नन्दवर्धन हुआ, उसने बीस वर्धतक शासन किया। नन्दवर्धनका पुत्र नन्द हुआ, उसने पिताके तुल्य वर्षोंतक राज्य किया। नन्दके प्रनन्द हुआ, जिसने दस वर्ष राज्य किया। उससे परनन्द हुआ, उसने अपने पिताके तुल्य वर्षातक ही राज्य किया। उससे समानन्द हुआ, उसने बीस वर्ष राज्य किया। उससे प्रियानन्द हुआ, उसने भी पिताके समान वर्षांतक राज्य किया। उसका पुत्र देवानन्द हुआ, उसने भी पिताके समान राज्य किया। देवानन्दका पुत्र यज्ञभंग हुआ, उसने अपने पिताके आधे वर्षांतक (दस वर्ष) राज्य किया। उसका पुत्र  मौर्यानन्द और उसका पुत्र महानन्द हुआ। दोनोंने अपने-अपने पिताके समान वर्षांतक राज्य किया। इसी समय कलिने हरिका स्मरण किया। अनन्तर प्रसिद्ध गौतम नामक देवताकी काश्यपसे उत्पत्ति हुई। उसने बौद्धधर्मको संस्कृतकर पट्टण नगर (कपिलवस्तु)-में प्रचार किया और दस वर्षतक राज्य किया। उससे शाक्यमुनिका जन्म हुआ, उसने भी बीस वर्षतक राज्य किया। उससे शुद्धोदन नामक पुत्र हुआ, उसने तीस वर्षतक शासन किया। उससे शक्यसिंहका जन्म हुआ। कलियुगके दो हजार वर्ष व्यतीत हो जानेके बाद शताद्रिमें उसने शासन किया। कलिके प्रथम चरणमें वेदमार्गको उसने विनष्ट कर दिया और साठ वर्षतक उसने राज्य किया। उस समय प्रायः सभी बौद्ध हो गये। विष्णुस्वरूप उसके राजा होनेपर जैसा राजा था, वैसी ही प्रजा हो गयी, क्योंकि विष्णुको शक्तिके अनुसार ही जगत्में धर्मको प्रवृत्ति होती है। जो मनुष्य मायापति हरिकी शरणमें जाते हैं, वे उनकी कृपाके प्रभावसे मोक्षके भागी हो जाते हैं । शक्यसिंहका पुत्र बुद्धसिंह हुआ, उसने तीस वर्ष राज्य किया। उसका पुत्र (शिष्य) चन्द्रगुप्त हुआ, जिसने पारसीदेशके राजा सुलूब (सेल्यूकस) की पुत्रीके साथ विवाह कर यवन- सम्बन्धी बौद्धधर्मका प्रचार किया। उसने साठ वर्षतक शासन किया। चन्द्रगुप्तका पुत्र बिन्दुसार (निम्बसार) हुआ। उसने भी पिताके समान राज्या किया। उसका पुत्र अशोक हुआ। उसी समय कान्यकुब्ज देशला एक आहाण आबू पर्वतपर

१-इसोने राजगृहसे हटाकर राजधानी गङ्गाके किनारे बसायी और उसका नाम पाटलिपुत्र या पटना पड़ा। इसके आनेके राजागण परनासे हो भारतका शासन करते थे।

३-यहाँसे आगे अब लिच्छवि राज्यवंशका वर्णन है, जिसको राजधानी कपिलवस्तु थी।

३-अब यहाँ फिर पार्यलपुत्र के राजवंशका वर्णन प्रारम्भ हूँ और वह चन्द्रगुम हो मौर्यवंशका पहला राजा था। जिसमें भारत के साथ अन्य देशोंपर अधिकार किया था, जिन्हें बाद अशोकने बौद्ध देश बना डाला। इन दिनों वे सभी देश भारतके ही उपनिवेश है। जिसका यहाँ आणे वर्णन है। चन्द्रगुपने ही सेल्यूकसकी पुत्री से शादी की थी।

चला गया और वहाँ उसने विधिपूर्वक ब्रह्महोत्र सम्पन्न किया। वेदमन्त्रोंके प्रभावसे यज्ञकुण्डसे चार क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई-प्रमर-परमार (सामवेदी), चपहानि-चौहान (कृष्णयजुर्वेदी), त्रिवेदी-गहरवार (शुक्ल यजुर्वेदी) और परिहारक (अथर्ववेदी) क्षत्रिय थे। वे सब ऐरावत-कुल में उत्पन्न गजोंपर आरूढ़ होते थे। इन लोगोंने अशोकके बंशजोंको अपने अधीन कर भारतवर्षके सभी बौद्धोंको नष्ट कर दिया।

अवन्तमें प्रमर-परमार राजा हुआ। उसने चार योजन विस्तृत अम्बावती नामक पुरीमें स्थित होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। (अध्याय ६)