भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! अब मैं सर्वपापनाशक तथा सर्वसौख्यपद हलपंक्ति- दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिससे सभी प्रकारके दानोंका फल प्राप्त हो जाता है। एक हलके लिये चार बैलोंकी आवश्यकता होती है और दस हलोंकी एक पंक्ति होती है। साखूकी लकड़ीसे दस हल बनवाकर उन्हें सुवर्ण-पट्ट और रनोंसे मढ़कर अलंकृत कर ले। वस्त्र, स्वर्ण, पुष्प तथा चन्दन आदिसे मण्डित तरुण, सुन्दर, हट-पुष्ट, उत्तम वृष उन हलोंमें जोतने चाहिये। बैलोके कन्धों पर जुआ भी रखे, साथमें कील लगा हुआ अंकुश आदि उपकरण भी रहने चाहिये। पर्वकालमें हलपंक्ति के साथ सस्यसम्पन्न बड़ा ग्राम, छोटा ग्राम अथवा सौ निवर्तन (सौ बीघा) अथवा पचास निवर्तन भूमि देनी चाहिये। इसका दान विशेषरूपसे कार्तिकी, वैशाखी, अयनसंक्रान्ति, जन्मनक्षत्र, ग्रहण, विषुवयोगमें करे। वेदवेत्ता, सदाचारी, सम्पूर्णाङ्ग अलंकृत दस ब्राह्मणों को निमन्त्रित करे। दस हाथ प्रमाणवाला एक मण्डप बनाकर उसमें पूर्व दिशा में एक हाथ प्रमाणवाले दो अथवा एक कुण्ड बनवायें। निमन्त्रित ब्राह्मणोंसे पलाशकी समिधा, घी, काला
तिल और खीरसे व्याहृतियों, पर्जन्यसूक्त, आदित्यसूक्त और रुद्रमन्त्रोंसे हवन कराये। तदनन्तर यजमान नानकर शुक्ल वस्त्र आदिसे अलंकृत हो सप्तधान्यके ऊपर हलपंक्तिको स्थापित करे और उसमें बैलोंको जोते। उस समय विविध प्रकारके वाद्य-यन्त्रोंको बजाना चाहिये और ब्राह्मणवर्ग वेद-पाठ करें। यजमान दानके समय पुष्पाञ्जलि ग्रहण कर इन मन्त्रोंको पढ़े-
यस्माद् देवगणाः सर्वे हले तिष्ठन्ति सर्वदा।
वृषस्कन्धे संनिहितास्तस्माद्धक्तिः शिवेऽस्तु मे।
यस्माच्च भूमिदानस्य कला नाहन्ति षोडशीम्।
दानान्यन्यानि मे भक्तिधर्मे चास्तु दृढा सदा॥
(उत्तरपर्व १६६ । १६-१७)
'चूँकि बैलके कन्धेपर स्थित हलमें सभी देवगण सदा स्थित रहते हैं, अतः भगवान् शंकरमें मेरी भक्ति हो । अन्य समस्त दान भूमिदानकी सोलहवीं कलाके भी तुल्य नहीं हैं, अत: धर्ममें मेरी सुदृढ़ भक्ति हो।' इसके बाद भूमि और हल उन ब्राह्मणों को दे दे। इस प्रकार जो व्यक्तिहलपंक्तिका दान करता है, वह अपने इक्कीस कुलोसहित स्वर्ग जाता है। सात जन्मतक उस व्यक्तिको निर्धनता, दुर्भाग्य, व्याधि आदि दु:ख नहीं भोगने पड़ते और वह पृथ्वीका अधिपति होता है। युधिष्ठिर! दान करते समय जो भक्तिपूर्वक इस दानकर्मका दर्शन करता है, वह भी जन्मभर किये गये पापोंसे मुक्त हो जाता है। इस दानको महाराज दिलीप, ययाति, शिबि, निमि तथा भरत आदि सभी श्रेष्ठ राजर्षियोंने किया, जिसके प्रभावसे वे राजा आज भी स्वर्गका सुख भोग रहे हैं। इसलिये भक्तिपूर्वक सभी स्त्री- पुरुषोंको यह दान करना चाहिये। यदि दस हलपंक्तिका दान करनेमें समर्थ न हो तो पाँच, चार अथवा एक ही हलका दान करे। हलपंक्तिका दान करनेवाले हलसे जितनी मिट्टी उठती है और बैलोंके शरीरमें जितने भी रोम होते हैं, उतने ही हजार वर्षतक शिवलोकमें निवासकर अन्तमें पृथ्वीपर श्रेष्ठ राजा होते हैं। (अध्याय १६६)