भविष्य पुराण

सूर्यनारायणकी महिमा, अर्घ्य प्रदान करनेका फल तथा आदित्य-पूजनकी विधियाँ

महाराज शतानीकने कहा-सुमन्तु मुने! इस लोकमें ऐसे कौन देवता हैं, जिनकी पूजा-स्तुति करके सभी मनुष्य शुभ पुण्य और सुखका अनुभव करते हैं। सभी धर्मों में श्रेष्ठ धर्म कौन है? आपके विचारसे कौन पूजनीय है तथा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवता किसकी पूजा-अर्चना करते हैं और आदिदेव किस देवताको कहा जाता है?

सुमन्तुजी बोले-राजन् ! मैं इस विषय भगवान् वेदव्यास और भीष्मपितामहके उस संवादको कह रहा हूँ जो सभी पापोंका नाश करनेवाला तथा सुख प्रदान करनेवाला है, उसे आप सुनें। एक समय गडाके किनारे वेदव्यासजी बैठे हुए थे। वे अग्निके समान जाज्वल्यमान, तेजमें आदित्यो समान साक्षात् नारायणतुल्य दिखायी रहे थे। भगवान् वेदव्यास महाभारतके कला तथा दो अथको पाशा करनेवाले हैं और अधियों तथा राजबियोके आचार्ग है, कुरुवंशके स्रष्टा हैं, साथ ही मेरे परमपूज्य हैं। इन वेदव्यासजीके पास कुरु श्रेष्ठ महातेजस्वी भीष्मजी आये और उन्हें प्रणाम कर कहने लगे।

भीष्मपितामहने पूछा-हे महामते पखशरनन्दन ! आपने सम्पूर्ण वाङ्मयकी व्याख्या मुझसे की है, किंतु मुझे भगवान् भास्करके सम्बन्धमें संशय उत्पन्न हो गया है। सर्वप्रथम भगवान् आदित्यको नमस्कार करने के पश्चात् ही अन्य देवताओंको नमस्कार किया जाता है। इसमें क्या कारण है? ये भगवान् भास्कर कौन हैं? कहाँसे उत्पन्न हुए हैं? है द्विज श्रेष्ठ ! इस लोकके कल्याणके लिये उस परम तत्त्वको कहिये। मुझे जानने की बड़ी ही अभिलामा है।

व्यासजीने कहा-भीष्म! आप अवश्य ही किंकर्तव्यविमृद्ध हो गये है, इसमें कोई संदेह नहीं है कि भगवान् भास्करकी मति, पूजन अर्चन सभी सिद्ध और ब्रह्मादि देवता करते हैं। सभी देवताओंमें आदिदेव भगवान् भास्करको ही कहा जाता है। ये संसार-सागरके अन्धकारको दूरकर सब लोकों और दिशाओंको प्रकाशित करते हैं। ये सभी धर्मोमें श्रेष्ठ धर्मस्वरूप हैं। ये पूज्यतम हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि सभी देवता आदिदेव भगवान् आदित्यकी ही पूजा करते हैं। आदित्य ही अदिति और कश्यपके पुत्र हैं। ये आदिकर्ता हैं, इसलिये भी आदित्य कहे जाते हैं। भगवान् आदित्यने ही सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न किया है । देवता, असुर, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, पक्षी आदि तथा इन्द्रादि देवता, ब्रह्मा, दक्ष, कश्यप सभीके आदिकारण भगवान् आदित्य ही हैं। भगवान् आदित्य सभी देवताओंमें श्रेष्ठ और पूजित हैं। भीष्मपितामहने पूछा-पराशरनन्दन महर्षि व्यासजी ! यदि भगवान् सूर्यनारायणका इतना अधिक प्रभाव है तो प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल-इन तीनों कालोंमें राक्षसादि कैसे इन्हें संत्रस्त करते हैं तथा भगवान् आदित्य फिर कैसे चक्रवत् घूमते रहते हैं? हे द्विजोत्तम! राहु उन्हें कैसे ग्रसित करता है?

व्यासजीने कहा-पिशाच, सर्प, डाकिनी, दानव आदि जो क्रोधसे उन्मत्त हो भगवान् सूर्यनारायणपर आक्रमण करते हैं, भगवान् सूर्यनारायण उन्हें प्रताडित करते हैं। यह मुहूर्तादि कालस्वरूप भगवान् सूर्यका ही प्रभाव है। संसारमें धर्म एकमात्र भगवान् सूर्यका आधार लेकर प्रवर्तित होता है। ब्रह्मादि देवता सूर्यमण्डलमें स्थित रहते हैं। भगवान् सूर्यनारायणको नमस्कार करनेमासे हो सभी देवताओंको नमस्कार प्राप्त हो जाता है। तीनों कालों में संध्या करनेवाले ब्राह्मणजन भगवान् आदित्यको ही प्रणाम करते हैं। भगवान् भास्करके विम्बके नीचे राहु स्थित है। अमृतको इच्छा करनेवाला राहु विमानस्थ अमृत भटसे थोड़ा भी अमृत छलकनेपर उस अमृतको पार करने के उद्देश्यसे जब विमानके अति संनिकट पहुंचता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि राहुने सूर्यनारायणको ग्रसित कर लिया है, उसे ही ग्रहण कहा जाता है। आदित्यभगवान्को कोई ग्रसित नहीं कर सकता; क्योंकि वे ही इस चराचर जगत्का विनाश करनेवाले हैं । दिन, रात्रि, मुहूर्त आदि सब आदित्यभगवान् के ही प्रभावसे प्रकाशित होते हैं। दिन, रात्रि, धर्म, अधर्म जो कुछ भी इस संसारमें दृष्टिगोचर हो रहा है, उन सबको भगवान् आदित्य ही उत्पन्न करते हैं। वे ही उसका विनाश भी करते हैं। जो व्यक्ति भगवान् आदित्यकी भक्तिपूर्वक पूजा करता है, उस व्यक्तिको भगवान् आदित्य शीघ्र ही संतुष्ट होकर वर प्रदान करते हैं तथा बल, वीर्य, सिद्धि, ओषधि, धन-धान्य, सुवर्ण, रूप, सौभाग्य, आरोग्य, यश, कीर्ति, पुत्र, पौत्रादि और मोक्ष आदि सब कुछ प्रदान करते हैं, इसमें संदेह नहीं है।

भीष्मने कहा-महात्मन् ! अब आप मुझसे सौर धर्मके स्नानकी विधि रहस्यसहित बतलायें। जिससे भगवान् आदित्यकी पूजा कर मनुष्य सभी प्रकारके दोषोंसे छुटकारा पास कर लेता है।

व्यासजी बोले-भीम! मैं सौर स्नानकी संक्षिप्त विधि बतला रहा हूँ, जो सभी प्रकारके पापोंको दूर कर देती है। सर्वप्रथम पवित्र स्थानसे मृत्तिका ग्रहण करे, तदनन्तर उस मृत्तिकाको शरीरमें लगाये। फिर जलको अभिमन्त्रित कर स्नान करे। शङ्क, तुरही आदिसे ध्वनि करते हुए सूर्यनारायणका ध्यान करना चाहिये। भगवान् सूर्यके 'ह्रां ह्रौं सः'इस मन्त्रराजसे आचमन करना चाहिये। फिर देवताओं एवं ऋषियोंका तर्पण और स्तुति करनी चाहिये। अपसव्य होकर पितरोंका तर्पण करे। अनन्तर संध्या बन्दन करे। उसके बाद भगवान् भास्करको अमालिसे जल देना चाहिये। ससान करनेके बाद यक्षर मन्त्र 'ह्रां ह्रीं सः' अथवा षडक्षर-मन्त्र 'खखोल्काय नम:' का जप करना चाहिये। जिस मन्त्रराजको पूर्वमें कहा है उस मन्त्रराजसे हृदयादि-न्यास करना चाहिये । मन्त्रको हृदयङ्गम कर भगवान् सूर्यनारायणको अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। एक ताम्रपात्रमें गन्ध, लाल चन्दन आदिसे सूर्य-मण्डल बनाकर उसमें करवीर (कनेर) आदिके पुष्प, गन्धोदक, रक्त चन्दन, कुश, तिल, चावल आदि स्थापित कर घुटनेको मोड़ उस ताम्रपात्रको उठाकर सिरसे लगाये और भक्तिपूर्वक 'ह्रां ह्रौं सः' इस मन्त्रराजसे भगवान् सूर्यनारायणको अर्घ्य प्रदान करे। जो व्यक्ति इस विधिसे भगवान् आदित्यको अर्घ्य निवेदन करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। हजारों संक्रान्तियों, हजारों चन्द्रग्रहणों, हजारों गोदानों तथा पुष्कर एवं कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों में स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल केवल सूर्यनारायणको अर्घ्य प्रदान करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। सौरदीक्षाविहीन व्यक्ति भी यदि भगवान् आदित्यको संवत्सरपर्यन्त अर्घ्य प्रदान करता है तो उसे भी वही फल प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। फिर दीक्षाको ग्रहण कर जो विधिपूर्वक अर्घ्य प्रदान करता है, वह व्यक्ति इस संसार सागरको पारकर भगवान् 'भास्करमें विलीन हो जाता है।

भीष्मने कहा- ब्रह्मन्! आपने पाप-हरण उनकी पूजा-करनेवाली स्नान विधि तो बता दी, अब कृपाकर -विधि बतायें, जिससे मैं भगवान् सूर्य की पूजा कर सकूँ।

व्यासजी बोले-भीष्म! अब मैं आदित्य- पूजनकी विधि कह रहा हूँ, आप सुनें आदित्यपूजकको चाहिये कि स्नानादिसे पवित्र होकर किसी शुद्ध एकान्त स्थानमें प्रसन्न होकर भास्करको पूजा करे। वह श्रेष्ठ सुन्दर आसनपर पूर्वाधावा बैठे। सूर्य मोसे करन्यास एवं हृदयादि न्यास करे। इस प्रकार आत्मशुद्धिकर न्यासद्वारा भगवान् सूर्यको अपनेमें भावना करे। अपनेको भास्कर समझकर स्थण्डिलपर भानुकी स्थापना करके विधिवत् पूजा करे। दक्षिण पार्श्वमें पुष्पकी टोकरी एवं वाम पार्श्वमें जलसे परिपूर्ण ताम्रपात्र स्थापित करे। पूजाके लिये उपकल्पित सभी द्रव्योंका अर्घ्यपात्रके जलसे प्रोक्षण कर पूजन करे, अनन्तर मन्त्रवेत्ता एकाग्रचित्त होकर सूर्यमन्त्रोंका जप करे।

भीष्मने कहा- भगवन् ! अब आप भगवान् सूर्यकी वैदिक अर्चाविधि बतलायें।

व्यासजी बोले- भीष्म! आप इस सम्बन्धमें सुरज्येष्ठ ब्रह्मा तथा विष्णुके मध्य हुए संवादको सुनें। एक बार ब्रह्माजी मेरुपर्वतपर स्थित अपनी मनोवती नामकी सभामें सुखपूर्वक बैठे हुए थे। उसी समय विष्णुभगवान्ने प्रणाम कर उनसे कहा-'ब्रह्मन् ! आप भगवान् भास्करकी आराधनाविधि बतायें और मण्डलस्थ भगवान् सूर्यनारायणकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये, इसे कहें।'

ब्रह्माने कहा- महाबाहो ! आपने बहुत उत्तम बात पूछी हैं, आप एकाग्रचित्त होकर भगवान् भास्करकी पूजनविधि सुनिये। सर्वप्रथम शास्त्रोक्त विधिसे भूमिका विधिवत् शोधनकर केसर आदि गन्धोंसे सात आवरणोंसे युक्त कर्णिकासमन्वित एक अष्टदलकमल बनाये। उसमें दीप्ता आदि सूर्यकी दिव्य अष्ट शक्तियोंको पूर्वादि क्रमसे ईशानकोणतक स्थापित करे । बीचमें सर्वतोमुखी देवीकी स्थापना करे। दीप्ता, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विधुता और सर्वतोमुखी-ये नौ सूर्यशक्तियाँ हैं। इन शक्तियोंका आवाहन कर पदाकी कणिकाके ऊपर भगवान् भास्करको स्थापित करना चाहिये। 'उदु त्यं जातवेदसं ' (यजु ७।४१) तथा अग्नि दूत' यजु०२२।१७) ये मन्य आवाहन और उपस्थानके कहे गये हैं। आ कृष्णेन रजसा' (यजु० ३३ । ४३) तथा 'हर सः शुचिषद्' (यजु० १० । २४) इन मन्त्रोंसे भगवान् सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। अपप्से तारक' मन्त्रसे दीप्तादेवीकी पूजा करे। 'अदृश्रमस्य केतवो.' (यजु०.८।४०) मन्त्रसे सूक्ष्मादेवीकी, 'तरणिर्विश्वदर्शतो०' (यजु० ३३ । ३६)-से जयाकी, 'प्रत्यङ्देवानाः' इस मन्त्रसे भद्राकी, 'येना पावक चक्षसाः' (यजु० ३३ । ३२) इस मन्त्रसे विभूतिकी, 'विद्यामेषिः' इस मन्त्रसे विमलादेवीकी पूजा करनी चाहिये। इसी प्रकारसे अमोघा, विद्युता तथा सर्वतोमुखी देवियोंकी भी पूजा करनी चाहिये। अनन्तर वैदिक मन्त्रोंसे सप्तावरण पूजनपूर्वक मध्यमें भगवान् सूर्यकी पूजा करे। भगवान् सूर्य एक चक्रवाले रथपर बैठकर श्वेत कमलपर स्थित हैं। उनका लाल वर्ण है। वे सर्वाभरणभूषित तथा सभी लक्षणोंसे समन्वित और महातेजस्वी हैं। उनका बिम्ब वर्तुलाकार है। वे अपने हाथों में कमल और धनुष लिये हैं। ऐसे उनके स्वरूपका ध्यानकर नित्य ऋद्धा भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये ।

भंगवान् विष्णुने कहा-हे सुरश्रेष्ठ! मण्डलस्थ भगवान् भास्करकी प्रतिमारूपमें किस प्रकारसे पूजा की जाय, उसे आप बतलानेकी कृपा करें।

ब्रह्माजी बोले-हे सुव्रत! आप एकाग्रचित्त-मनसे प्रतिमा पूजन विधिको सुनिये। 'इषे त्वो' (यजु० १।१) इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यके सिर प्रदेशका पूजन करना चाहिये। 'अग्निमीळे ( १ । १ । १) इस मन्बसे भगवान् सूर्वके दक्षिण हाथ की पूजा करनी चाहिये। 'आग्न आ याहि (420 ६।१६। १० ) इस मनसे सूर्गभगवान्के दोनों चरणोंको पूजा करनी चाहिये। आ जिन ' ( यजु. ८।४९) इस मन्त्रसे मामाला समर्पित करनी चाहिये। योगे योग-( १९१०) इस मन्त्रले पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये। समुद्रगच्छ' (यजु० ६।२१) तथा 'इमं मे गङ्गे' (ऋ० १० । ७५ ।५) तथा 'समुद्रज्येष्ठा: '(ऋ०७। ४९।१) इन मन्त्रोंसे उन्हें अङ्गराग लगाये। आप्यायस्क' (यजु० १२॥ ११२) इस मन्त्रसे दुग्ध-स्नान, 'दधिक्रायो (यजु० २३ । ३२) इस मन्त्रसे दधिस्नान, 'तेजोऽसि शुक्र' (यजु० २२ । १) इस मन्त्रसे घृत-स्नान तथा 'या ओषधी:-' (यजु० १२।७५) इस मन्त्रद्वारा ओषधि-स्नान कराये। इसके बाद 'द्विपदा०' (यजु० २३ । ३४) इस मन्त्रसे भगवान्का उद्धर्तन करे। फिर 'मा नस्तोके०' (यजु० १६ । १६) इस मन्त्रसे पुनः स्नान कराये। 'विष्णो रराट' (यजु० ५। २१) इस मन्त्रसे गन्ध तथा जलसे स्नान कराये। स्वर्ण धर्म: ' (यजु० १८१५०) इस मन्त्रसे पाद्य देना चाहिये। 'इदं विष्णुर्वि चक्रमे (यजु० ५। १५) इस मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। वेदोऽसि.' (यजु० २।२१) इस मन्त्रसे यज्ञोपवीत और 'बृहस्पते ( यजु० २६ । २३) इस मन्त्रसे वस्त्र उपवस्त्र आदि भगवान् सूर्यको चढ़ाना चाहिये। इसके अनन्तर पुष्पमाला चढ़ाये। धूरसि धूर्वः' (यजु०११८) इस मन्त्रसे गुग्गुलसहित धूप दिखाना चाहिये। समिद्धो' (यजु० २९ । १) इस मन्त्रसे रोचना लगाये। दीर्घायुस्तः' (यजु० १२॥ १००) इस मन्त्रसे आलक्त (आलता) लगाये। सहस्त्रशीर्षा' (यजु०३१११) इस मन्जसे भगवान् सूर्यके सिरका पूजन करना चाहिये। 'संभावयाः' इस गन्बसे दोनों -नेत्री और 'विशुतशक्ष' (यजु०१७।१९) इल मन्त्रसे भावान् सूर्य के सम्पूर्ण शरीरका स्पर्श करना चाहिये। श्रीच ते लक्ष्मी' (यजु० ३१ । २२) इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए विधिपूर्वक भगवान गर्वनारायाणका बडा अधिपूर्वक पूजा अर्चन करना चाहिये अध्याय