भविष्य पुराण

शुभाशुभ स्वप्र और उनके फल

ब्रह्माजी बोले-याज्ञवल्क्य! जो व्यक्ति सप्तमीमें उपवास करके विधिपूर्वक सूर्यनारायणका पूजन, जप एवं हवन आदि क्रियाएँ सम्पनकर रात्रिके समय भगवान् सूर्यका ध्यान करते हुए शयन करता है, तब उसे रात्रिमें जो स्वप्न दिखायी देते हैं, उन स्वप्न-फलोंका मैं अब वर्णन कर रहा हूँ। यदि स्वप्रमें सूर्यका उदय, इन्द्रध्वज और चन्द्रमा दिखायी दे तो सभी समृद्धियाँ प्राप्त होती हैं। माला पहने व्यक्ति, गाय या वंशीकी आवाज, श्वेत कमल, चामर, दर्पण, सोना, तलवार, पुत्रकी प्राप्ति, रुधिरका थोड़ा या अधिक मात्रामें निकलना तथा पान करना ऐसा स्वप्र देखनेसे ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। घृताक्त प्रजापतिकें दर्शनसे पुत्र-प्राप्तिका फल होता है। स्वप्रमें प्रशस्त वृक्षपर चढ़े अथवा अपने मुख में महिषी, गौ या सिंहनीका दोहन करे तो शीघ्र ही ऐश्वर्य प्राप्त होता है। सोने या चाँदीके पात्रमें अथवा कमल-पत्र में जो स्वप्रमें खीर खाता है उसे बलकी प्राप्ति होती है। द्यूत, वाद तथा युद्धमें विजयप्राप्तिका जो स्वप्न देखता है, वह सुख प्राप्त करता है। स्वप्रमें जो अग्नि-पान करता है, उसके जठराग्निकी वृद्धि होती है। यदि स्वपमें अपने अङ्ग प्रज्वलित होते दिखायी दें और सिरमें पीड़ा हो तो सम्पत्ति मिलती है। श्वेतवर्णके वस्त्र, माला और प्रशस्त पक्षीका दर्शन शुभ होता है। देवता-ब्राह्मण, आचार्य, गुरु, वृस तथा तपस्वी स्वप्रमें जो कुछ कहते हैं, वह सत्य होता है। स्वप्रमें सिरका कटना अथवा फटना, पैरोंमें बेड़ीका पड़ना, राज्य-प्रासिका संकेतक है। स्वप्रमें रोनेसे हर्षकी प्राप्ति होती है। घोड़ा, बैल, वेत कमल तथा श्रेष्ठ हाथीपर निडर होकर चढ़नेसे महान् ऐश्वर्य प्राप्त होता है। ग्रह और ताराओंका ग्रास देखे, पृथ्वीको उलट दे और पर्वतको उखाड़ फेंके तो राज्यका लाभ होता है। पेटसे आँत निकले और उससे वृक्षको लपेटे, पर्वत-समुद्र तथा नदी पार करे तो अत्यधिक ऐश्वर्यकी प्राप्ति  होती है। सुन्दर स्त्रीको गोदमें बैठे और बहुत-  सी स्त्रियाँ आशीर्वाद दें, शरीरको कीड़े भक्षण करें, स्वप्रमें स्वप्रका ज्ञान हो, अभीष्ट बात सुनने और कहने में आये तथा मङ्गलदायक पदार्थोका दर्शन एवं प्राप्ति हो तो धन और आरोग्यका लाभ होता है। जिन स्वप्रका फल राज्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति है, यदि उन स्वनोंको रोगी देखता है तो वह रोगसे मुक्त हो जाता है। इस प्रकार रात्रिमें स्वप्र देखनेके पश्चात् प्रात:काल स्नानकर राजा-ब्राह्मण अथवा भोजकको अपना स्वप्र. सुनाना चाहिये ।(अध्याय ६९)

१-देवहिलजनाचार्थगुरूवडतपस्विनः

यद्यदन्ति तत्सर्व सत्यमेय हि निर्दिशेत् ।

(पाझपर्व ६९ । १४-१५)

२-भारत तथा विदेशोंमें भी मैटिनी आदिके डिक्शनरी ऑफ सौम्स' आदि अनेक ग्रन्थ हैं । बृहस्पतिप्रोक्त स्वप्राश्याय' ग्रन्थ विशेष प्रसिद्ध है। बाल्मीकीय रामायणमें त्रिजटाके स्वप्रका वर्णन ध्येय है। स्वप्रका योगसे घनिष्ठ सम्बन्ध है। सभी संयुङ अध्ययनमें साधकोंको विशेष लाभ हो सकता है।