भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-राजन् ! अब मैं श्रेष्ठ लवणाचलके दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिससे मनुष्य शिवलोकको प्राप्त करता है। सोलह द्रोण नमकसे लवणाचल बनाना चाहिये, क्योंकि यही उत्तम है। उसके आधे आठ द्रोणसे मध्यम 'और चार द्रीणसे बना हुआ लवणाचल अधम माना गया है। निर्धन मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार आधा या एक द्रोणका बनवाना चाहिये। इसके अतिरिक्त (पर्वत-परिमाणके) चौथाई द्रोणसे पृथक् पृथक् (चार) विष्कम्भ (सहायक)-पर्वतोंका निर्माण कराना चाहिये। ब्रह्मा आदि देवताओंके पूजनका विधान सदा पूर्ववत् होना चाहिये। उसी प्रकार सभी स्वर्णमय वृक्ष एवं लोकपालोंके भी स्थापनका विधान है। पहलेकी तरह इसमें भी कामदेव आदि देवों और सरोवरोका निर्माण कराना चाहिये तथा रातमें जागरण भी करना चाहिये। अब दान मन्त्रोको सुनिये-
सौभाग्यरससम्भूतो यतोऽयं लवणो रसः ।
दानात्मकत्वेन च मां पाहि पापात्रगोत्तम ॥
तस्मादन्नरसाः सर्वे नोत्कृष्टा लवर्ण विना।
प्रियं च शिवयोर्नित्यं तस्माच्छान्तिप्रदो भव ।।
विष्णुदेहसमुद्भूतं यस्मादारोग्यवर्धनम्।
तस्मात् पर्वतरूपेण पाहि संसारसागरात्॥
(उत्तरपर्व १९६।६-८)
'पर्वत श्रेष्ठ ! चूँकि यह नमकरूप रस सौभाग्य- सरोवरसे प्रादुर्भूत हुआ है, इसलिये इसके दानसे तुम मेरी रक्षा करो। चूँकि सभी प्रकारके अन्न एवं रस नमकके बिना उत्कृष्ट नहीं होते अर्थात् स्वादिष्ट नहीं लगते तथा तुम शिव और पार्वतीको सदा परम प्रिय हो, अत: मुझे शान्ति प्रदान करो। चूंकि तुम भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पत्र हुए हो और आरोग्यकी वृद्धि करनेवाले हो, इसलिये तुम पर्वतरूपसे मेरा संसार-सागरसे उद्धार करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे लवणपर्वतका दान करता है, वह एक कल्पतक पार्वतीलोकमें निवास करता है और अन्तमें परमगति-मोक्षको प्राप्त हो जाता है।
भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले-महाराज । अब मैं उत्तम गुडपर्वतके दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिससे पनी मनुष्य देवपूजित हो स्वर्गलोकको प्रारा कर लेता है। दस भार गुडसे बना हुआ गुडपर्वत उत्तम, पाँच भारसे बना हुआ मध्यम और तीन भारसे बना हुआ कनिष्ठ कहा जाता है। स्वल्प वित्तवाला मनुष्य इसके आधे परिमाणसे भी काम चला सकता है। इसमें भी देवताओंका आमन्त्रण, पूजन, स्वर्णमय वृक्ष, देव-पूजन, विष्काभपर्वत, सरोवर, वन, देवता, हवन, जागरण और लोकपालोंकी स्थापना आदि. धान्यपर्वतकी ही भाँति करनी चाहिये। उस समय यह मन्त्र उच्चारण करे-
यथा देवेषु विश्वात्मा प्रवरोऽयं जनार्दनः ।
सामवेदस्तु वेदानां महादेवस्तु योगिनाम्॥
प्रणवः सर्वमन्त्राणां नारीणां पार्वती यथा।
तथा रसानां प्रवरः सदा चेक्षुरमो मतः ।।
मम तस्मात् परों लक्ष्मी प्रयच्छ गुडपर्वत।
सुरासुराणां सर्वेषां नागयक्षायन्त्रिणाम् ॥
निवासश्चापि पार्वत्यास्तस्मान्मां पाहि सर्वदा।
(उत्तरपर्व १९७।५-८)
'जिस प्रकार देवगणोंमें ये विश्वात्मा जनार्दन, वेदोंमें सामवेद, योगियोंमें महादेव, समस्त मन्त्रोंमें ॐकार और नारियोंमें पार्वती श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार रसोंमें इक्षुरस सदा श्रेष्ठ माना गया है। इसलिये गुडपर्वत ! तुम मुझे उत्कृष्ट लक्ष्मी प्रदान करो। गुडपर्वत। चूँकि तुम देवताओं, असुरों, नागों, यक्षों, ऋषों तथा पार्वतीके भी निवासस्थान हो, अत: मुझे शान्ति प्रदान करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार गुडपर्वतका दान करता है, वह गन्धवों द्वारा पूजित होकर गौरीलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा सौ कल्प व्यतीत होनेपर दीर्घायु एवं नीरोगतासे सम्पन्न होकर भूतलपर जन्म ग्रहण करता है और शत्रुओंके लिये अजेय होकर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है। राबन्। इस गुडपर्वतदानकी महिमामें एक आख्यान है, उसे आप सुनें।
सुलभा नामकी एक महाभाग्यशालिनी व्रतपरायणा रानी थी। वह राजा मरुत्तकी प्यारी पत्नी थी और रूप-यौवनसे सम्पन्न थी। राजा मरुत्तके सात सौ रानियाँ थीं। ये सभी रानियाँ सुलभाकी आज्ञामें रहती थीं और राजा मरुत्त भी सुलभाके परामर्शको मानते थे। रानी भी राजासे अत्यन्त स्नेह करती थी। एक बारकी बात है कि दुर्वासामुनि राजाके यहाँ आये। राजा मरुत्तने अर्ध्य-पाद्यादिसे मुनिका सत्कार किया। दुर्वासाजीसे सुलभाने पूछा-'भगवन् ! किस पुण्यकर्मके प्रभावसे राजा मुझे अत्यन्त प्यार करते हैं। मेरा ही मुख देखते रहते हैं और मेरे वशमें हैं, मेरी सौतें भी मेरा प्रिय करने में तत्पर रहती हैं ? ब्रह्मन्! यह सब आप बतलायें, इस विषयमें मुझे महान् कौतूहल है।'
दुर्वासाजी बोले-सुभगे! तुम अपने पूर्वजन्मके वृत्तान्तको सावधान होकर सुनो। मैं तुम्हारे पूर्वजन्मोंकी बातों को अच्छी तरह जानता हूँ। पूर्वजन्ममें तुम गिरिव्रजपुर (राजगृह-विहार) में निवास करनेवाले एक वैश्यकी स्त्री थी। तुम धार्मिक, सत्यशील और पतिव्रता थी। वहाँ तुमने अपने पतिके साथ ब्राह्मणोंसे गुडपर्वत दानके माहात्म्य और विधिको सुना था। तब तुमने गुडपर्वतका विधिवत् दान किया। वरानने ! उसीके प्रभावसे तुम यह सुखभोग प्राप्त कर रही हो।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज! उस सुलभाने अन्तमें सहति प्राप्त की। इस गुडपर्वतका दान स्त्रियोंके लिये विशेषरूपसे बताया गया है। (अध्याय १९६-१९७)