राजा युधिष्ठिरने पूछा- श्रीकृष्ण ! व्रतोपवास, दान, धर्म आदिमें जो कुछ वैकल्य अर्थात् किसी बातकी न्यूनता रह जाय तो क्या फल होता है ?इसे आप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज ! राज्य पाकर भी जो निर्धन, उत्तम रूप पाकर भी काने, अंधे, लँगड़े हो जाते हैं, वे सब धर्म-वैकल्यके प्रभावसे ही होते हैं। धर्म-वैकल्यसे हो स्त्री पुरुषों में वियोग एवं दुर्भगत्व होता है, उत्तम कुलमें जन्म पाकर भी लोग दुःशील हो जाते हैं, धनादय होकर भी धनका भोग तथा दान नहीं कर सकते तथा वस्त्र-आभूषणोंसे हीन रहते हैं। वे सुख प्राप्त नहीं कर पाते। अतः यज्ञमें, व्रतमें और भी अन्य धर्म-कृत्योंमें कभी कोई त्रुटि नहीं होने देनी चाहिये।
युधिष्ठिरने पुन: कहा- भगवन् । यदि कदाचित् उपवास आदिमें कोई त्रुटि हो ही जाय तो उसके निवारणार्थ क्या करना चाहिये ?
श्रीकृष्णा बोले-महाराज! अखण्ड द्वादशी- व्रत करनेसे सभी प्रकारको धार्मिक त्रुटियाँ दूर हो जाती हैं। अब आप उसका भी विधान सुनें। मार्गशीर्ष
मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको स्नानकर जनार्दन भगवान् का भक्तिपूर्वक पूजन कर उपवास रखना चाहिये और नारायणका सतत स्मरण करते रहना चाहिये। जितेन्द्रिय पुरुष पञ्चगव्यमिश्रित जलसे स्नान करके जौ और व्रीहि (धान)-से भरा पात्र ब्राह्मणको दान करे और फिर भगवानसे यह प्रार्थना करे
सप्तजन्मनि यत्किंचिन्मया खण्डव्रतं कृतम्।
भगवन् त्वत्प्रसादेन तदखण्डमिहास्तु मे॥
यथाखण्डं जगत् सर्वं त्वयैव पुरुषोत्तम ।
तथाखिलान्यखण्डानि व्रतानि मम सन्तु वै
(उत्तरपर्व ७९ । १४-१५)
'भगवन्! मुझसे सात जन्मों में जो भी व्रत करनेमें न्यूनता हुई हो, वह सब आपके अनुग्रहसे परिपूर्ण हो जाय । पुरुषोत्तम ! जिस प्रकार आपसे यह सारा जगत् परिपूर्ण है, उसी प्रकार मेरे खण्डित सभी व्रत पूर्ण हो जायें।'
इस व्रतमें चार महीने में व्रतकी पारणा करनी चाहिये। चैत्रादि चार मासके अनन्तर दूसरी धारणा कर सत्तू-पात्र ब्राह्मणको देनेका विधान है। श्रावणादि चार मासके अनन्तर तीसरा पारण कर नारायणका पूजन करते हुए अपनी शक्ति अनुसार सुवर्ण, चाँदी, मृतिका अथवा पलाश-पत्रके पात्र में घृत- दान करना चाहिये। संवत्सर पूर्ण होने पर जितेन्द्रिय बारह ब्राह्मणोंको खीरका भोजन कराकर वस्त्राभूषण देकर त्रुटियोंके लिये क्षमा मांगनी चाहिये। इसमें आचार्यका विधिपूर्वक पूजन करनेका भी विधान है। इस तरहसे जो अखण्ड द्वादशीका व्रत करता है, उसके सात जन्मतक किये हुए व्रत सम्पूर्ण फलदायक हो जाते हैं। अतः स्त्री-पुरुषोंको व्रतोंका वैकल्य दूर करनेके लिये अवश्य हो इस व्रतको सम्पादित करना चाहिये।
भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा-महाराज! स्त्री अथवा पुरुष दोनों को फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षको एकादशीको उपवारा कर जगत्पति भगवान्का पूजन-भजन और उठते-बैठते नित्य हरिका स्मरण करते रहना चाहिये। द्वादशीके दिन प्रभातमें ही स्नान-पूजन तथा घृतसे हवनके बाद ब्राह्मणको दक्षिणा देनेका विधान है। तदनन्तर भगवानसे अपने अभीष्ट मनोरथोंकी संसिद्धिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये। तत्पश्चात् हविष्य-भोजन ग्रहण करना चाहिये। इस व्रतमें फाल्गुनसे ज्येष्ठतक प्रथम चार महीनोंमें रक्त पुष्प, गुग्गुल-धूप और हविष्यान-नैवेद्यसे भगवान् की पूजा-अर्चनाके बाद गोशृङ्गछालित जल तथा हविष्यान्न ग्रहण करनेका विधान है। फिर आषाढ़से आश्विनतक चार महीनोंमें चमेलीके पुष्प, धूप और शाल्यन्न (साठी धान) आदिके नैवेद्योंद्वारा भगवान्की पूजा-स्तुति करनेके बाद कुशोदकका प्राशन तथा निवेदित नैवेद्य भक्षण करना चाहिये। कार्तिकसे माघ मासतक तीसरी पारणामें जपापुष्प (अड़हुल), उत्तम धूप और कसारके नैवेद्यसे नारायणके पूजनोपरान्त मोमूत्र- प्राशन तथा कसार-भक्षण करनेका विधान है। प्रतिमास ब्राह्मणोंको दक्षिणा देनी चाहिये। वर्षके अन्तमें एक कर्ष (माशा) सुवर्णकी भगवान् नारायणकी प्रतिमाका पूजन कर, दो वस्त्र और दक्षिणासहित ब्राह्मणको निवेदित करना चाहिये। इसीके साथ बारह ब्राह्मणोंको भी भोजन कराकर प्रत्येकको अन्न, जलका घट, छतरी, जूता, वस्त्र और दक्षिणा देनी चाहिये। इस द्वादशी व्रतके करनेसे सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। इसीसे इसका नाम मनोरथ-द्वादशी है। इन्द्रको त्रैलोक्यका राज्य भी इसी व्रतके परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ है। शुक्राचार्यने धन तथा महर्षि धौम्यने निर्विघ्न विद्या प्राप्त की है। अन्य श्रेष्ठ पुरुषोंने तथा स्त्रियोंने भी इस व्रतके प्रभावसे अपने अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त किया है। जो कोई भी जिस-किसी अभिलाषासे इस व्रतको करता है, वह अवश्य पूर्ण होती है। जो पुरुष भगवान् पुरुषोत्तमका पूजन नहीं करते, गौ, बाह्मण आदिकी सेवा नहीं करते और मनोरथ-द्वादशीका व्रत नहीं रखते, वे किसी भी प्रकारसे अपना अभीष्ट-फल प्राप्त नहीं कर सकते।
राजा युधिष्ठिरने कहा-भगवन्। थोड़े-से परिश्रमसे अथवा स्वल्पदानसे सभी पाप कट जायें ऐसा कोई उपाय आप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! तिल-द्वादशी नामक एक व्रत है, जो परम पवित्र है और सभी पापोंका नाश करनेवाला है। माघ मासके कृष्ण पक्षकी द्वादशीको जब मूल अथवा पूर्वाषाढ़ नक्षत्र प्राप्त हो, तब उसके एक दिन पूर्व अर्थात् एकादशीको उपवास रखकर व्रत ग्रहण करना चाहिये। द्वादशीको भगवान् श्रीकृष्णका पूजन कर ब्राह्मणको कृष्ण तिलोंका दान करना चाहिये। व्रतीको भी स्नानकर काले तिलका ही भोजन करना चाहिये। इस प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक कृष्ण द्वादशीमें व्रतकर अन्तमें तिलोंसे पूर्ण कृष्णवर्णक कुम्भ, पकवान, छत्र, जूता, वस्त्र और दक्षिणा बारह ब्राह्मणोंको देना चाहिये। उन तिलोंके बोनेसे जितने तिल उत्पन्न होते हैं, उतने वर्षपर्यन्त इस व्रतको करनेवाला स्वर्गमें पूजित होता है और किसी जन्ममें अध, बधिर, कुष्ठी आदि नहीं होता, सदा नीरोग रहता है। इस तिल-दानसे बड़े-बड़े पाप कट जाते हैं। इस व्रतमें न बहुत परिश्रम है और न ही बहुत अधिक व्यय । इसमें तिलोंसे हो स्नान, तिल- दान और तिल हो भोजन करनेपर अवश्य सदति मिलती है*। ( अध्याय ७९ -८५)