भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! मैंने जो भीषण नरकोंका विस्तारसे वर्णन किया है, उन्हें व्रत-उपवासरूपी नौकासे मनुष्य पार कर सकता है। प्राणीको अति दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे पश्चात्ताप न करना पड़े और यह जन्म भी व्यर्थ न जाय एवं फिर जन्म भी न लेना पड़े। जिस मनुष्यकी कीर्ति, दान, व्रत, उपवास आदिकी परम्परा बनी है, वह परलोकमें उन्हीं कौके द्वारा सुख भोगता है। व्रत तथा स्वाध्याय न करनेवालेकी कहीं भी गति नहीं है। इसके विपरीत व्रत-स्वाध्याय करनेवाले पुरुष सदा सुखी होते हैं। इसलिये व्रत-स्वाध्याय अवश्य करने चाहिये।
राजन्! यहाँ एक प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ-योगको सिद्ध किया हुआ एक सिद्ध अति भयंकर विकृत रूप धारणकर पृथ्वीपर विचरण करता था। उसके लम्बे ओंठ, टूटे दाँत, पिङ्गल नेत्र, चपटे कान, फटा मुख, लम्बा पेट, टेढ़े पैर और सम्पूर्ण अङ्ग कुरूप थे। उसे मूलजालिक नामके एक ब्राह्मणने देखा और उससे पूछा कि आप स्वर्गसे कब आये और किस प्रयोजनसे यहाँ आपका आगमन हुआ? क्या आपने देवताओंके चित्तको मोहित करनेवाली और स्वर्गकी अलंकार-स्वरूपिणी रम्भाको देखा है? अब आप स्वर्गन में जायँ तो रम्भासे कहें कि अवन्तिपुरीका निवासी ब्राह्मण तुम्हारा कुशल पूछता था। बाहाणका वचन सुनकर सिद्धने चकित हो पूछा कि 'ब्राह्मण! तुमने मुझे कैसे पहचाना?' तब ब्राह्मणने कहा कि 'महाराज! कुरूप पुरुषोंके एक-दो अङ्ग विकृत होते हैं, पर आपके सभी अगटेढ़े और विकत है।' इसीसे मैंने अनुमान किया कि इतना रूप गुप्त किये कोई स्वर्गके निवासी सिद्ध ही हैं। ब्राह्मणका वचन सुनते ही वह सिद्ध वहाँसे अन्तर्धान हो गया और कई दिनोंके बाद पुनः ब्राह्मणके समीप आया और कहने लगा-'ब्राह्मण! हम स्वर्गमें गये और इन्द्रको सभामें जब नृत्य हो चुका, उसके बाद मैंने एकान्तमें रम्भासे तुम्हारा संदेश कहा, परंतु रम्भाने यह कहा कि मैं उस ब्राह्मणको नहीं जानती। यहाँ तो उसीका नाम जानते हैं जो निर्मल विद्या, पौरुष, दान, तप, यज्ञ अथवा व्रत आदिसे युक्त होता है। उसका नाम स्वर्गभरमें चिरकालतक स्थिर रहता है।' रम्भाका सिद्धके मुखसे यह वचन सुनकर ब्राह्मणने कहा कि हम शकटवतको नियमसे करते हैं, आप रम्भासे कह दीजिये। यह सुनते ही सिद्ध फिर अन्तर्धान हो गया और स्वर्ग में जाकर उसने रम्भासे ब्राह्मणका संदेश कहा. और जब उसने उसके गुण वर्णन किये तब रम्भा प्रसन्न होकर कहने लाही-'सिद्ध महाकाल ! मैं वनके निवासी उस शकट ब्रह्मचारीको जानती हूँ। दर्शनसे, सम्भाषणसे, एकत्र निवाससे और उपकार करनेसे मनुष्यों का परस्पर नेह होता है, परंतु मुझे उस ब्राह्माणका दर्शन-सम्भाषण आदि कुछ भी नहीं हुआ। केवल नाम श्रवणारे इतना स्नेह हो गया है। सिद्धसे इतना कहकर रम्भा इन्द्रके समीप गयी और ब्राह्मणके व्रत आदि करने तथा अपने ऊपर अनुरक्त होने का वर्णन किया। इन्द्रने भी प्रसन्न हो सम्भासे पूछक्का उस उत्तम ब्राहाणको वस्त्राभूषाण आदिसे अलंकृत कर दिव्य विमान में बैठाकर स्वर्ग में बुलाया और वहाँ सत्कारपूर्वक स्वाकि दिव्य भोगोंको उसे प्रदान किया। ब्राह्मण चिरकालतक वहाँ दिव्य भोग भोगता रहा। यह शकट-व्रतका माहात्म्य हमने संक्षेपमें वर्णन किया है। दृढ़व्रती पुरुषके लिये राजलक्ष्मी, वैकुण्ठलोक, मनोवाञ्छित फल आदि दुर्लभ पदार्थ भी जगत्में सुलभ हैं। इसलिये सदा सत्परायण पुरुषको व्रतमें संलग्न रहना चाहिये। (अध्याय ७)