महाराज युधिष्ठिरने कहा-भगवन्! आपके द्वारा अन्नदानके माहात्म्यको सुनकर मुझे भी एक बात स्मरण आ रही है। जिसे मैंने अपनी आँखोंसे देखा है, उसे मैं आपको सुनाता हूँ। जिस समय दुर्योधन, कर्ण, शकुनि आदिने द्यूतक्रीडामें छलसे हमारे राज्यको छीन लिया और हमलोग द्रौपदीके साथ वल्कल वस्त्र तथा मृगचर्म धारण कर वनको जा रहे थे, उस समय नगरके लोग और सदाचारी ब्राह्मण नेहसे हमारे साथ चलने लगे। उन्हें देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ और मैं यह सोचने लगा कि जो व्यक्ति ब्राह्मण, मित्र, भृत्य आदिका पोषण करता है, उसीका जीवन सफल है। अपना पेट तो मनुष्य, जीव, जन्तु, पशु, पक्षी सभी भर लेते हैं। अभ्यागत सुवर्ग और कुटुम्बको छोड़कर जो व्यक्ति केवल अपना ही पेट भरता है, वह जीवित होते हुए भी मरे हुएके समान है। यही सोचकर मैंने उन ब्राह्मणोंसे कहा कि आपलोग त्रिकालज्ञ और ज्ञान-विज्ञान में पारंगत हैं और मेरे स्नेहके वशीभूत होकर ही आये हैं। अब कोई ऐसा उपाय बतानेको कृपा कीजिये जिससे कि भाई, बन्धु, मित्र, भृत्यसहित आपलोगोंके लिये भी भोजन आदिका प्रबन्ध हो सके, क्योंकि इस निर्जन वनमें हमें बारह वर्ष बिताना है। मेरे इस प्रकारके वचनको सुनकर मैत्रेयमुनिने मुझसे कहा कि कौन्तेय! एक प्राचीन वृत्तान्त मैने दिव्य दृष्टिसे देखा है, जिसे मैं कह रहा हूँ आप ध्यानसे सुनें।
किसी समय एक तपोवनमें कोई दुर्भगा दरिद्र प्रहाचारिणी ब्राह्मणी निवास कर रही थी। वासा भी प्रतिदिन ब्राहाणों का पूजन किया करती। उसकी शम-दमसे परिपूर्ण श्रद्धाको देखकर एक दिन ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर उससे कहा-'सुव्रते! हमलोग तुमसे बहुत प्रसन्न हैं, तुम कोई वर माँगो।' तब ब्राह्मणीने कहा- 'महाराज! किसी व्रत अथवा दानकी ऐसी विधि बतानेकी कृपा कीजिये जिसके करनेसे मैं पतिकी प्रिय, पुत्रवती, सौभाग्यवती, धनाढ्य तथा लोकमें प्रशंसाके योग्य हो जाऊँ।'
ब्राह्मणीका यह वचन सुनकर वसिष्ठजीने कहा कि बाह्माणि! मैं तुम्हें सभी मनोरोंको पूर्ण करनेवाले स्थालीदानकी विधि बता रहा हूँ। पाँच सौ पल, दो सौ पचास पल अथवा एक सौ पचीस पल ताँबेका पात्र बनाये या सामर्थ्य न हो तो मिट्टीकी उत्तम हाँड़ी बना ले। वह गहरी और सुदृढ़ हो। उसे मूंग तथा चावलसे बने पदार्थसे भरकर चन्दनसे चर्चित कर एक मण्डलके मध्यमें स्थापित कर ले तथा उसके समीप सब प्रकार शाक, जलपात्र, घीका पात्र रखे और पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र आदिसे उसका पूजन करे और इस प्रकार उस पात्रकी प्रार्थना करे-
ज्वलज्वलनपार्श्वस्यैस्तण्डुलै; सजलैरपि।
न भवेद्धोज्यसंसिद्धिर्भूतानां पिठरी विना॥
त्वं सिद्धिः सिद्धिकामानां त्वं पुष्टिः पुष्टिमिच्छताम्।
अतस्त्वां प्रणमाम्याशु सत्यं कुरु वचो मम ।।
ज्ञातिबन्धुसुद्धर्गे विप्रे प्रेष्यजने तथा।
अभुक्तवति नाश्रीयात् तथा भव वरप्रदा।।
(उत्तरपर्व १७०।२२-२४)
इसका भाव यह है कि समीप ही प्रज्वलित अग्नि हो, चावल हो तथा जल भी हो, किंतु यदि न स्थाली (बटलोई) न हो तो भोजन नहीं पकाया
जा सकता । स्थाली! तुम सिद्धि चाहनेवालोंके लिये सिद्धि तथा पुष्टि चाहनेवालोंके लिये पुष्टिस्वरूप हो। मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। मेरी बातको सत्य करो। मेरे ज्ञातिवर्ग, सुहद्वर्ग, बन्धुवर्ग तथा भृत्यवर्ग आदि जबतक भोजन न कर लें, तबतक तुममें- से भोजन घटे नहीं-ऐसा वर प्रदान करो।
यह मन्त्र पढ़कर वह पात्र द्विज श्रेष्ठको दान कर दे। यह दान रविवार, संक्रान्ति, चतुर्दशी, अष्टमी, एकादशी अथवा तृतीयाको करना चाहिये। वसिष्ठजीका यह उपदेश मानकर वह ब्राह्मणी नित्य ब्राह्मणोंको दक्षिणासहित स्थालीपात्र देने लगी। पार्थ! उसी पुण्यके प्रभावसे जन्मान्तरमें वही ब्राह्मणी द्रौपदीरूपमें तुम्हारी भार्या हुई है और दान देनेमें द्रौपदीका हाथ कभी शून्य नहीं रहेगा; क्योंकि यह द्रौपदी, सती, शची, स्वाहा, सावित्री, भू, अरुन्धती तथा लक्ष्मीके रूपमें जहाँ रह रही हो, वहाँ फिर कौन-सा पदार्थ दुर्लभ हो सकता है। इतना कहकर मैत्रेयमुनिने कहा कि महाराज युधिष्ठिर! यह द्रौपदी अपनी स्थालीसे अन्न दे तो सम्पूर्ण जगत्को तृप्त कर सकती है, फिर इन थोड़े-से ब्राह्मणोंके भोजन आदिके विषयमें आप क्यों चिन्तित होते हैं?
मैत्रेयजीका ऐसा वचन सुनकर भगवन् ! हमलोगोंने भी वैसा ही किया और सभी परिजनोंके साथ ब्राह्मणोंको नित्य भोजन कराने लगे। प्रभो! अन्नदानके प्रसंगसे यह स्थालीदानकी विधि मैंने कही, इसलिये आप मेरी धृष्टताको क्षमा करें। जो व्यक्ति सुन्दर ताम्रकी स्थाली बनाकर चावलोंसे उसे भरकर पर्व-दिनमें इस विधिसे ब्राह्मणको देता है, उसके घर सुहद्, सम्बन्धी, बान्धव, मित्र, भृत्य और अतिथि नित्य भोजन करें तो भी भोजनकी कमी नहीं होती। (अध्याय १७०)