राजा युधिष्ठिरने पूछा-यदुसत्तम! पुरुष और स्त्रियोंको उत्तम रूप किस कर्मके करनेसे प्रात होता है? आप सर्वाङ्गसुन्दर श्रेष्ठ रूपकी पासिका उपाय बताइये।
भगवान् श्रीकृष्णाने कहा-महाराज! यही बात अरुन्धती वसिष्ठजीसे पूछी थी और महर्षि वसिष्ठने उनसे कहा था-'पिये। विष्णुभगवान् की बिना आराधना और पूजन किये उत्तम रूप प्राप्त नहीं हो सकता। जो पुरुष अथवा स्त्री उत्तम रूप, ऐश्वर्य और संतानकी अभिलाषा करे, उसे नक्षत्रपुरुषरूप भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये।' इसपर अरुन्धतीने नक्षत्रपुरुष व्रतका विधान पूछा। वसिहजीने कहा-'प्रिये। चैत्र माससे लेकर भगवान्के पाद आदि अङ्गोंका उपवासपूर्वक पूजन करे। नानादिसे पवित्र होकर नक्षत्रपुरुषरूपी भगवान् विष्णुको प्रतिमा बनाकर उनके पादसे सिरतकके अङ्गोंका इस विधिसे पूजन करे। मूल नक्षत्रमें दोनों पैर, रोहिणी नक्षत्रमें दोनों जंघा, अश्विनीमें दोनों घुटनों, आषाढमें दोनों ऊरुओं, दोनों फाल्गुनीमें गुहास्थान, कृत्तिका में कटिप्रदेश, दोनों भाद्रपदाओंमें पार्श्वभाग और टखना, रेवली में दोनों कुक्षि, अनुराधामें का स्वाल, अनिष्टामें पीत, विशाखामें दोनों भुजाएँ, हस्तमें दोनों हाथ, पुनर्वसुमें अंगुली, आश्लेषा नख शामें ग्रीवा, श्रवण कर्ण, पुष्य में मुख स्वाती में गौत, साभिचामे मुख, मयामें नासिका, मृगशिरा नेत्र चिनामे ललाट भरणीमें सिब और आर्द्रामें केशोंका पूजन करे। उपवास के दिन तैलाभ्यङ्ग न करे। नक्षत्रके देवताओं और नक्षत्रराज चन्द्रमाका भी प्रति नक्षत्रमें पूजन करे और विद्वान् ब्राह्मणको भोजन कराये। यदि व्रतमें अशौच आदि हो जाय तो दूसरे नक्षत्रमें उपवास कर पूजन करे। इस प्रकार माघ मासमें व्रत पूरा हो जानेपर उद्यापन करे। अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णका नक्षत्रपुरुष बनाकर उसे अलंकृत करे, एक उत्तम शय्यापर प्रतिमा स्थापित करे और ब्राह्मण-दम्पतिको शय्यापर बैठाकर वस्त्राभूषण आदिसे उनका पूजन कर सप्तधान्य, सवत्सा गौ, छत्तरी, जूता, घृतपात्र और दक्षिणासहित वह नक्षत्रपुरुषकी प्रतिमा उन्हें दान कर दे। श्रद्धापूर्वक इस व्रतके करनेसे सर्वाङ्गसुन्दर रूप, मनकी प्रसन्नता, आरोग्य, उत्तम संतान, मधुर वाणी और जन्म-जन्मान्तरतक अखण्ड ऐश्वर्य प्राप्त होता है और सभी पाप निवृत्त हो जाते हैं। इतनी कथा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण बोले-'महाराज! इस प्रकार नक्षत्रपुरुष-व्रतका विधान वसिष्टजोने अरुन्धतीको बतलाया। वही मैंने आपको सुनाया। जो इस विधिसे नक्षत्ररूप भगवान्का पूजन करते हैं, वे अवश्य ही उत्तम रूप पाते हैं।'
राजा युधिष्ठिरने पुनः पूछा- भगवन् ! शिवभक्तोंके कल्याणके लिये आपं शैवनक्षत्रपुरुष-व्रतका विधान बतायें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज ! शैवनक्षत्र- पुरुष- (-व्रतके दिन भगवान् शंकरके अजोका पूजन और उपवास अथवा पकवत करना चाहिये। फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षसे जब हस्त नक्षत्र हो, उस दिनसे शैवनक्षत्रपुरुष-व्रतका नियम ग्रहण करना चाहिये और रातमें भगवान् शिवका पूजन करना चाहिये। हस्त आदि सत्ताईस नक्षत्रों में भगवान् शंकरके सत्ताईस नामोंसे उनके चरणसे लेकर सिरतककी क्रमशः अङ्ग-पूजा करनी चाहिये। रात्रिके समय तैल-क्षाररहित भोजन करे। प्रतिनक्षत्रमें सेरभर शालि-चावल और घृतपात्र ब्राह्मणको 'प्रदान करे। दो नक्षत्र एक दिन हो जाये तो दो अङ्गोंका दो नामोंसे एक ही दिन पूजन करे। इस प्रकार व्रतकर पारणामें ब्राह्मणोंको भोजन, दक्षिणा आदिसे संतुष्ट करना चाहिये। सुवर्णको शिव-पार्वतीकी प्रतिमा बनाकर उसे उत्तम शय्यावर स्थापित करे। बादमें सभी उपचारोंसे पूजनकर कपिला गौ, बर्तन, छत्र, चामर, दर्पण, जूता, वस्त्र, आभूषण, अनुलेपन आदिसहित वह प्रतिमा बाहाणको निवेदित कर दे। बादमें प्रदक्षिणा कर विसर्जन करे और शय्या, गौ आदि सन्त्र सामग्री ब्राह्मणके घर पहुँचा दे। महाराज! दुश्शील, दाम्भिक, कुताकिंक, निन्दक, लोभी आदिको यह व्रत नहीं बताना चाहिये। शान्त स्वभाव, सद्गुणी, शिवभक्त इस व्रतके अधिकारी हैं। इस व्रतके करनेसे गहापातक भी निवृत्त हो जाते हैं। जो स्त्री पतिको आज्ञा प्राप्त कर इस व्रतको सम्पन्न करती है, उसे कभी इट-वियोग नहीं होता। जो इस व्रतके माहात्म्यको पढ़ता जाथवा श्रवण करता है, उसके भी पितरका नरकसे उद्धार हो जाता है।