राजा शतानीकने पूछा-मुने! सोके कितने रूप हैं, क्या लक्षण हैं, कितने रंग हैं और उनकी कितनी जातियाँ हैं? इसका आप वर्णन करें।
सुमन्तु मुनिने कहा- राजन्! इस विषयमें सुमेरु पर्वतपर महर्षि कश्यप और गौतमका जो संवाद हुआ था, उसका मैं वर्णन करता हूँ। महर्षि कश्यप किसी समय अपने आश्रममें बैठे थे। उस समय वहाँ उपस्थित महर्षि गौतमले उन्हें प्रणामकर विनयपूर्वक पूजा-महाराज। सपोंके लक्षण, जाति, वर्षा और स्वभाव किस प्रकारके हैं, उनका आप वर्णन करें तथा उनको उत्पत्ति
किस प्रकार हुई है यह भी बतायें। वे विष किस प्रकार छोड़ते हैं, विषके कितने वेग हैं, विषकी कितनी नाड़ियाँ हैं, साँपोंके दाँत कितने प्रकारके होते हैं, सर्पिणीको गर्भ कत्र होता है और वह कितने दिनों में प्रसव करती है, पुरुष और नपुंसक सर्पका क्या लक्षण है, ये क्यों काटते हैं। इन सब बातोंको आप कृपाकर मुझे बतायें।
कश्यपजी बोले-मुने ! आप ध्यान देकर सुनें मैं सों के सभी भेदोंका वर्णन करता हूँ। ज्येष्ठ और आषाढ़ मासमें सोको मद होता है। उस समय वे मैथुन करते हैं। वर्षा महतुके चार महीनेतक
१-वर्तमान में नागपश्मी प्रायः सभी पटाङ्गों तथा व्रतके निबन्ध-ग्रन्थों के अनुसार आवण शुक्ल पक्षमाको होती है। यहाँ या पाठ अशुद्ध है या कालान्तरमें कभी भाद्रपद में नागाप शमी मनायी जारी रही होगी।
शिवतत्व-रत्नाकर और अभिलषिताओं-दिन्तामणि तथा आयुर्वेद ग्रन्थों-सुथु, चरक, बाभट्टक चिकित्साख्नामें में इस विषयका वर्णन मिलता है।
सर्पिणी गर्भ धारण करती है, कार्तिकमें दो सौ चालीस अंडे देती है और उनमें से कुछको स्वयं प्रतिदिन खाने लगती है। प्रकृतिकी कृपासे कुछेक अंडे इधर-उधर ढुलककर बच जाते हैं। सोनेकी तरह चमकनेवाले अंडोंमें पुरुष, स्वर्णकेतक वर्णक समान आभावाले और लम्बी रेखाओंसे युक्त अंडोंसे स्त्री तथा शिरीषपुष्पके समान रंगवाले अंडोंके बीच नपुंसक सर्प होता है। उन अंडोंको सर्पिणी छ: महीनेतक सेती है। अनन्तर अंडोंके फूटनेपर उनसे सर्प निकलते हैं और वे बच्चे अपनी मातासे स्नेह करते हैं। अंडेके बाहर निकलनेके सात दिन में बच्चोंका कृष्णवर्ण हो जाता है। सर्पकी आयु एक सौ बीस वर्थकी होती है और इनकी मृत्यु आठ प्रकारसे होती है-मोरसे, मनुष्यसे, चकोर पक्षीसे, बिल्लीसे, नकुलसे, शूकरसे, वृश्चिकसे और गौ, भैस, घोड़े, ऊँट आदि पशुओंके खुरोंसे दब जानेपर। इनसे बचनेपर सर्ष एक सौ बीस वर्षतक जीवित रहते हैं। सात दिनके बाद दाँत उगते हैं और इक्कीस दिनमें विष हो जाता है। साँप काटनेके तुरंत बाद अपने जबड़ेसे तीक्ष्ण विषका त्याग करता है और फिर विष इकट्ठा हो जाता है। सर्पिणीके साथ घूमनेवाला सर्प बालसर्प कहा जाता है। पचीस दिनमें वह बच्चा भी विषके द्वारा दूसरे प्राणियों के प्राण हरने में समर्थ हो जाता है। छ: महीने में कंचुक- (केंचुल ) का त्याग करता है। साँपके दो सौ चालीस पैर होते हैं, परंतु चे पैर गायके रोयेंके समान बहुत सूक्ष्म होते हैं, इसीलिये दिखायी नहीं देते। चलनेके समय निकल आते हैं और अन्य समय भीतर प्रविष्ट हो जाते हैं। उनके शरीरमें दो सौ बीस अहुलियों और दो सौ बीस रूधियों होती है। अपने समय के बिना जो सर्प उत्पन्न होते हैं उनमें कम विष रहता है और वे पचहत्तर वर्षसे अधिक जीते भी नही हैं। जिस साँपके दाँत लाल,
पीले एवं सफेद हों और विषका वेग भी मंद हो, वे अल्पायु और बहुत डरपोक होते हैं।
साँपको एक मुँह, दो जीभ, बत्तीस दाँत और विषसे भरी हुई चार दाढ़ें होती हैं। उन दाड़ोंके नाम मकरी, कराली, कालरात्री और यमदूती है। इनके क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और यम-ये चार देवता हैं। यमदूती नामकी दाढ़ सबसे छोटी होती है। इससे साँप जिसे काटता है वह तत्क्षण मर जाता है। इसपर मन्त्र, तन्त्र, ओषधि आदिका कुछ भी असर नहीं होता। मकरी दाढ़का चिह्न शस्त्रके समान, करालोका काकके पैरके समान तथा कालरात्रौका हाथके समान चिह्न होता है और यमदूती कूर्मके समान होती है। ये क्रमशः एक, दो, तीन और चार महीनों में उत्पन्न होती हैं और क्रमश: वात, पित्त, कफ और संनिपात इनमें होता है। क्रमशः गुड्युक्त भात, कथाययुक्त अन्न, कटु पदार्थ, संनिपातमें दिया जानेवाला पथ्य इनके द्वारा काटे गये व्यक्तिको देना चाहिये। वेत, रक्त, पीत और कृष्णा-इन चार दाढोंके क्रमश: रंग हैं। इनके वर्ण क्रमश: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। सर्पोके दाढ़ोंमें सदा विन नहीं रहता। दाहिने नेत्रके समीप विष रहनेका स्थान है। क्रोध करनेपर वह विष पहले मस्तकमें जाता है, मस्तकसे धमनी और फिर नाड़ियों के द्वारा दाढ़में पहुँच जाता है।
आठ कारणोंसे साँप काटता है—दबनेसे, पहलेके वैरसे, भयुसे, मदसे, भूखसे, विषका वेग होनेसे, संतानकी रक्षाके लिये तथा कालकी प्रेरणासे। जब सर्प काटते ही पेटकी ओर उलट जाता है और उसकी दाढ़ टेढ़ी हो जाती है, तब उसे दबा हुआ हरमहरना चाहिये। जिसके काटनेसे बहुत बड़ा धाव हो जाय, उसको अत्यन्त देषसे काटा है, ऐसा समझना चाहिये। एक दादका चिहो जाय, किंतु वह भी भलीभांति दिखायी पड़े तो सबसे काटामा
समझना चाहिये। इसी प्रकार रेखाकी तरह दाढ़ दिखायी दे तो मदसे काय हुआ, दो दाद दिखायी दे और बड़ा घाव भर जाय तो भूखसे काटा हुआ, दो दाढ़ दिखायी दे और घावमें रक्त हो जाय तो विषके वेगसे काटा हुआ, दो दाढ़ दिखायी दे, किंतु घाव न रहे तो संतानकी रक्षाके लिये काटा हुआ मानना चाहिये। काकके पैरकी तरह तीन दाढ़ गहरे दिखायी दें या चार दाढ़ दिखायी दें तो कालकी प्रेरणासे काटा हुआ जानना चाहिये। यह असाध्य है, इसकी कोई भी चिकित्सा नहीं है।
सर्पके काटनेके दंष्ट, दंष्टानुपीत और दंष्टोद्धत- ये तीन भेद हैं। सर्पके काटनेके बाद ग्रीवा यदि झुके तो दंष्ट तथा काटकर पार करे तो दंष्टानुपीत कहते हैं। इसमें तिहाई विष चढ़ता है और काटकर सब विष उगल दे तथा स्वयं निर्विष होकर उलट जाय-पीठके बल उलटा हो जाय, उसका पेट दिखायी दे तो उसे दंष्टोद्धत कहते हैं। (अध्याय ३३)
Summary of chapter 23 of the Bhavishya Purāṇa is as follows:
The vrata cycle covers the thirteenth and fourteenth tithi vratas — the Trayodaśī sacred to Yama and associated with pitṛ-tarpāṇa, and the Caturdaśī associated with Śiva — before concluding the regular tithi cycle with the full-moon (Paurṇamāsī) observances. The Paurṇamāsī vratas include the major annual festivals connected with Kārtika, Māgha, Phālguna, and Jyeṣṭha, and they carry among the highest phala in the entire vrata calendar.