भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! महानवमी सम तिथियों में श्रेष्ठ है। सभी प्रकारके मङ्गल और भगवतीकी प्रसन्नताके लिये सब लोगोंको और विशेषकर राजाओंको महानवमीका उत्सव अवश्य मनाना चाहिये।
युधिष्ठिसने पूछा- भगवन्! इस महानवमी-व्रतका आरम्भ कबसे हुआ? क्या यशोदाके गर्भसे प्रादुर्भूत होनेके समयसे महानवमी-व्रतका प्रचलन हुआ अथवा इसके पूर्व सत्ययुग आदिमें भी यह महानवमी-व्रत था? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! वह परमशक्ति सर्वव्यापिनी, भावगम्या, अनन्ता और आद्या आदि नामसे विश्वविख्यात है। उनका काली, सर्वमङ्गला, माया, कात्यायिनी, दुर्गा, चामुण्डा तथा शंकरप्रिया आदि अनेक नाम रूपोंसे ध्यान और पूजन किया जाता है।
देव, दानव, राक्षस, गन्धर्व, नाग, यक्ष, किार, नर आदि सभी अष्टमी तथा नवमीको उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। कन्याके सूर्यमें आश्विन मासके शुक्ल पक्षमें अष्टमीको यदि मूल नक्षत्र हो तो उसका नाम महानवमी है। यह महानवमी तिथि तीनों लोकोंमें अत्यन्त दुर्लभ है। आश्विन गासके शुवल पक्षकी अष्टमी और नवमीको जगन्माता भगवती श्रीअम्बिकाका पूजन करनेसे सभी शत्रुओंपर विजय प्रांत हो जाती है। यह तिथि पुण्य, पवित्रता, धर्म और सुखको देनेवाली है। इस दिन मुण्डमालिनी चामुण्डाका पूजन अवश्य करना चाहिये। सभी कल्पों और मन्वन्तसमें देव दैल्य आदि अभेक प्रकारके उपचारोरो नवमी तिथिको भगवतीको पूजा किया करते है और तीनों लोकोंगे अवतार लेकर भगवती मर्यादाका का पालन करती रहती है। राजन्! यही पराम्बा जगन्माता भगवती यशोदाके गर्भसे उत्पन्न हुई थीं और वे कंसके मस्तकपर पैर रखकर आकाशमें चली गयीं और फिर विन्ध्याचलमें स्थापित हुई, तभीसे यह पूजा प्रवर्तित हुई।
भगवतीका यह उत्सव पहलेसे ही प्रसिद्ध था, परंतु सभी प्राणियोंके उपकारके लिये तथा सभी विघ्र-बाधाओंकी शान्तिके लिये ही मैंने अपनी बहनके रूपमें भगवती विन्ध्यवासिनीदेवीकी महिमाका विशेषरूपसे प्रचार किया। विन्ध्यवासिनी भगवतीके स्थानमें नौ रात्रि, तीन रात्रि, एक रात्रि उपवास या अयाचितव्रत अथवा नक्तव्रत कर अनेक प्रकारके उपचारोंसे भगवतीकी आराधना करनी चाहिये। ग्राम-ग्राम, नगर-नगर और घर-घरमें सभी लोगोको स्रान कर प्रसन्नचित्त होकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री आदि सभीको भगवतीकी पूजा करनी चाहिये। विशेषकर राजाओंको तो यह पूजन अवश्य करना चाहिये।
विजयकी इच्छा रखनेवाले राजाको प्रतिपदासे अष्टमीपर्यन्त लोहाभिहारिक कर्म (अस्त्र-शस्त्र- पूजन) करना चाहिये। सर्वप्रथम पूर्वोत्तर ढालवाली भूमिमें नौ अथवा सात हाथ लम्बा-चौड़ा, पताकाओंसे सुसज्जित एक मण्डप बनाना चाहिये। उसमें अग्निकोणमें तीन मेखला और पीपलके समान योनिसे युक्त एक अति सुन्दर एक हाथके कुण्डकी रचना करनी चाहिये। राजाके चिह्न-छत्र, चामर, सिंहासन, अश्व, वजा, पताका आदि और सभी प्रकारके अस्त्र-शस्त्र मण्डपमें लाकर रखे। उन सबका अधिवासन करे। इसके अनन्तर ब्राह्माणको चाहिये कि वह स्नानकर श्वेत वस्त्र धारणकर मण्डपादिको पूजा करे और फिर ओंकारपूर्वक राजचिह्नोंके निर्दिा मन्त्रोद्वारा धृतसे संयुक्त पायससे हवन-कर्म करे। पूर्वकालमें बहुत ही बलवान, शक्तिशाली लोह नामका एक दैत्य पैदा हुआ था। उसको देवताओंने मारकर खण्ड- खण्ड कर पृथ्वीपर गिरा दिया। वही दैत्य आज लोहाके रूपमें दिखायी पड़ता है। उसीके अक्रोंसे ही विभिन्न प्रकारके लोहेकी उत्पत्ति हुई है। इसलिये उसी समयसे लोहाभिहारिक कर्म राजाओंको विजय प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हुआ, ऐसा ऋषियोंने बतलाया है। हवनका बचा हुआ शेष पायस हाथी और घोड़ोंको खिलाकर उनको अलंकृत कर माङ्गलिक घोष करते हुए रक्षकों के साथ समारोहपूर्वक नगरमें घुमाना चाहिये। राजाको भी प्रतिदिन मानकर पितरों और देवताओंकी पूजा करनेके बाद राजचिह्नोंकी भी भलीभांति पूजा करनी चाहिये। इससे राजाको विजय, कीर्ति, आयु, यश तथा बलकी प्रासि होती है। इस प्रकार लोहाभिहारिक कर्म करनेके अनन्तर अष्टमीके दिन पूर्वाहमें स्नान कर नियमपूर्वक सुवर्ण, चाँदी, पीतल, ताँबा, मृत्तिका, पाषाण, काष्ठ आदिको दुर्गाकी सुन्दर मूर्ति बनाकर उत्तम सुसज्जित स्थानके बीच सिंहासनके ऊपर स्थापित करे। कुंकुम, चन्दन, सिन्दूर आदिसे उस मूर्तिको चर्चित कर कमल आदि पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य आदिसे अनेक बाजे-गाजेके साथ उनका पूजन करना चाहिये। वन्दीजन स्तुति करें। बहुतरो लोग छत्र चामर आदि राजचिह्न लेकर चारों ओर खड़े होकर स्थित रहें। दीक्षायुक्त राजा पुरोहितके साथ बिल्वपत्रोंसे भगवतीकी इस मन्त्रसे पूजा करे-
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
अमृतोद्भव श्रीवृक्षो महादेवीप्रिय
बिल्वपत्रं प्रयच्छागि पवित्र ते सुरेश्वरि ।।
(उत्तरपर्व ३८।८-८)
इस प्रकार पूजनकर उसी दिनसे द्रोणपुष्पी (गूमा)-से पूजा करनी चाहिये। असुरोंके साथ युद्ध करनेसे जो क्षति भगवतीके शरीरको हुई उसकी पूर्ति द्रोणपुष्पीसे ही हुई। इसलिये द्रोणपुष्पी भगवतीको अत्यन्त प्रिय है। फिर शत्रुओंके वधके लिये खड्गको प्रणामकर सुभिक्ष, राज्य और अपने विजयकी प्राप्ति-हेतु भगवतीसे प्रार्थना करनी चाहिये और उनका ध्यान तथा इस स्तुतिका पाठ करना चाहिये-
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
कुंकुमेन समारनव्ये चन्दनेन विलेपिते।
बिल्वपत्रकृतामाले दुर्गेऽहं शरणं गतः ।।
(उत्तरपर्व १३८ । ९३-९४)
इस प्रकार अष्टमीको सब प्रकार से भगवतीका पूजन कर रात्रिको जागरण करना चाहिये और नृत्यादिक उत्सव कराना चाहिये। प्रसन्नतापूर्वक रात्रिके बीत जाने पर नवमीको प्रातःकाल भगवतीकी बड़े समारोहके साथ विशेष पूजा करनी चाहिये। अपराह-समयमें रथके बीच भगवती दुर्गा की प्रतिमाको स्थापित कर पूरे राज्यभरमें भ्रमण कराना चाहिये। अपनी सेनासहित राजाको भी साथ रहना चाहिये। सभी प्रकार के विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये भूतशान्ति करनी चाहिये। जिससे यात्रा निर्विघ्न पूर्ण हो । इस विधिसे जो राजा अथवा सामान्य व्यक्ति भगवतीकी यात्रा करता है, वह सभी प्रकारके पापोले छूटकर भगवतीके लोकको प्राप्त कर लेता है और उस व्यक्तिको शत्रु, दोर, ग्रह, विन आदिका भय नहीं होता। भगवतीके भक्त सदा नीरोग, सुखी और निर्भय हो जाते हैं। जो व्यक्ति भगवतीके उत्सव- विधिका श्रवण करता है या पढ़ता है, उसके भी सभी अमङ्गल दूर हो जाते है। (अध्याय १५८)