सुमन्तु मुनि बोले-राजन् ! इस प्रकार साम्ब सूर्यनारायणसे वर प्राप्तकर अतिशय प्रसन्न हुए और वर-प्राप्तिको आश्चर्य मानते हुए अन्य तपस्वियों के साथ समीपमें स्थित चन्द्रभागा नदी में स्नान करने के लिये गये। वहाँ वे स्नानकर ब्रद्धाके साथ अपने हृदयमें मण्डलाकार भगवान् सूर्यको भावना कर मनमें यह सोचने लगे कि 'सूर्यनारायण की कैसी प्रतिमा हो और उसे किस प्रकार कहाँ स्थापित करूं।' इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि उन्होंने देखा-चन्द्रभागा नदीके ऊपरसे एक अत्यन्त देदीप्यमान प्रतिमा बहती हुई चली आ रही है। प्रतिमा देखकर साम्बको यह निश्चय हो गया कि यह भगवान् सूर्यको ही मूर्ति है। जैसी उन्होंने आज्ञा दी थी, वही यह सूर्य-प्रतिमा है, इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं। यह सोचकर नदीसे उस रोजसे चमकती हुई मूर्तिको निकालकर उन्होंने मित्रवन (मुल्तान) में एक स्थानपर तपस्वियों के साथ विधिपूर्वक उसकी स्थापना की। एक दिन साबने सूर्य प्रतिमाको प्रणामकर पूछा-'नाथ। आपको यह प्रतिमा किसने बनायी? इसकी आकृति बड़ी सुन्दर है। आप कृपाकर बतायें।
प्रतिमा बोली-साम्ब ! पूर्वकालमें मेरा रूप प्रचण्ड तेजोमय था। उससे व्याकुल होकर सभी देवताओंने प्रार्थना की कि 'आप अपना रूप सभी प्राणियोंके सहन करनेके योग्य बनायें, नहीं तो सभी लोग जल जायेंगे।' मैंने महातपस्वी विश्वकर्माको आदेश दिया कि मेरे तेजको कम कर मेरा निर्माण करो। मेरा आदेश प्राप्त कर उन्होंने शाकद्वीपमें चक्रको घुमाकर मेरे तेजको खराद दिया। उसी विश्वकर्माने कल्पवृक्षके काष्ठसे यह मेरी सुलक्षणा प्रतिमा बनायी है। तुम्हारा उद्धार करनेके लिये मेरी आज्ञाके अनुसार विश्वकर्माने ही सिद्धसेवित हिमालयपर इसे निर्मितकर चन्द्रभागा नदी में प्रवाहित कर दिया है। साम्ब! यह स्थान बड़ा शुभ है, सुन्दर है। यहाँ सदा मेरा सानिध्य रहेगा। प्रातः मनुष्यगण इत चन्द्रभागाके तटपर मेरा सांनिध्य प्राप्त करेंगे। मध्याह्नमें कालप्रियमें (कालपीमें) और अनन्तर यहाँ प्रतिदिन मेरा दर्शन प्राप्त करेंगे। पूर्वाह्नमें ब्रह्मा, मध्याहमें विष्णु और अपराहमें शंकर सदा पूजा करेंगे। महाबाहो। इस प्रकार भगवान् सूर्यक ऐसा कहनेपर साम्ब अत्यन्त प्रसन्न हुए और भगवान् सूर्य भी अन्तर्धान हो गये। (अध्याय १२९)