भविष्य पुराण

साम्बोपाख्यानमें मगोंका वर्णन

साम्बने कहा-नारदजी ! आपकी कृपासे मुझे सूर्यभगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ, उतम रूप भी प्राप्त हुआ, किंतु मेरा मन चिन्ताले आकुल है, इस मूर्तिका पूजन और रक्षण कौन करेगा? इसे आप बतानेकी कृपा करें।

नारदजी बोले-साम्ब !  इस कार्यको कोई भी ब्राह्मण स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि देवपूजा अर्थात् देवधनसे अपना निर्वाह करनेवाले ब्राह्मण देवलक कहे जाते हैं। जो लोग लोभवश देवधन और ब्राह्मणधनको ग्रहण करते हैं. वे नरकमें जाते हैं, अतः कोई भी ब्राह्मण देवताका पूजक नहीं बनना चाहता । तुम भगवान् सूर्यको शरणमें जाओ और उन्हीसे पूछो कि कौन उनका विधि विधानसे पूजन करेगा? अथवा राजा उससेनके पुरोहितसे कहो, सम्पच है कि वे इस कार्यको स्वीकार कर लें।

नारदजीको इस बात को सुनकर जाम्बवतीपुत्र साम्ब उपसेनाके पोहित पौरखके पास गये और उन्होंने उन्हें सादर प्रणामकर का 'महाराज !

मैंने सूर्यभगवान्का एक विशाल मन्दिर बनवाया है, उसमें समस्त परिवार तथा परिच्छदों एवं पत्रियोसहित उनकी प्रतिमा स्थापित की है और अपने नामसे वहाँ एक नगर भी बसाया है। आपसे मेरा यह विना निवेदन है कि आप उन्हें ग्रहण करें।

गौरमुखने कहा- साम्ब ! मैं ब्राह्मण हूँ और आप राजा हैं। आपके द्वारा दिये गये इस प्रतिग्रहको लेनेपर मेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हो जायगा। दान लेना ब्राह्मणका धर्म है, किंतु देवप्रतिग्रह ब्राह्मणाको नहीं लेना चाहिये। आप यह दान किसी भगको दे दें, वही सूर्यदेवकी पूजाको अधिकारी है।

साम्बने पूछा -महाराज ! मग कौन हैं? कहाँ रहते हैं ? किसके पुत्र है? इनका क्या आचार है। आप कृपाकर बताये।

गौरमुख बोले-मग भगवान सूर्य (अग्रि) तथा शुभाजनमें निक्षमा महर्षि ऋग्जिजह्रकी अत्यन्त सुन्दर पुत्री थी। एक बार उससे अग्रिका उल्लङ्गन हो गया। फलस्वरुप भगवान् सूर्य (अग्निस्वरूप) रुष्ट हो गये। बादमें अग्निरूप भगवान् सूर्यके द्वारा निक्षुभाका जो हुआ, वही मग कहलाया। भगवान् सूर्यके वरदानसे ये ही अग्निवंशमें उत्पन्न अव्यङ्गको धारण करनेवाले मग सूर्यके परम भक्त हुए और सूर्यको पूजाके लिये नियुक्त हुए। भगवान् सूर्यकी पूजा करनेवाले मग शाकद्वीपमें निवास करते हैं, आप भगवान् सूर्यके पूजकके रूपमें उन्हें प्राप्त करनेके लिये शाकद्वीप जायँ।

अनन्तर साम्बने द्वारका जाकर अपने पिता भगवान् श्रीकृष्णको सब समाचार सुनाया। फिर वे उनकी आज्ञा प्राप्तकर गरुडपर सवार हो शीघ्र ही शाकद्वीप पहुँच गये। वहाँ जाकर उन्होंने अतिशय तेजस्वी महात्मा गोंको सूर्य भगवान् की आराधनामें संलग्न देखा। साम्बने उन्हें सादर प्रणामकर उनकी प्रदक्षिणा की।

साम्बने कहा- आपलोग धन्य हैं। आप सबका दर्शन सबके लिये कल्याणकारी है, आपलोग सदा भगवान् सूर्यकी आराधनामें लगे हुए हैं। मैं भगवान् श्रीकृष्णका पुत्र हूँ, मेरा नाम साम्ब है। मैंने चन्द्रभागा नदीके तटपर सूर्यदेवकी मूर्तिकी स्थापना की है। उनकी आज्ञाके अनुसार उनकी विधिवत् आराधनाके निमित्त शाकद्वीपसे जम्बूद्वीपमें ले जानेके लिये मैं आपकी सेवामें उपस्थित हुआ हूँ। मेरी सविनय प्रार्थना है कि आपलोग कृपाकर जम्बूद्वीपमें पधारें और भगवान् सूर्यको पूजा करें।

मगोंने कहा-'साम्ब! इस बातकी जानकारी भगवान् सूर्यने हमें पहले ही दे दी है।' यह सुनकर साम्ब बहुत प्रसन्न हुए और गरुडपर उन्हें बैठाकर वहाँसे मित्रवन (मूलस्थान- मुल्तान) ले आये। सूर्यभगवान् मगोंको वहाँ उपस्थित देखकर बहुत प्रसन्न हुए और साम्बसे बोले- 'साम्ब ! अब तुम चिन्ता छोड़ दो, ये मग मेरी विधिवत् पूजा सम्पन्न करेंगे।'

इस प्रकार साम्बने शाकद्वीपसे अव्यङ्ग धारण करनेवाले मगोंको लाकर धन-धान्यसे परिपूर्ण इस साम्बपुरको उन्हें समर्पित कर दिया। वे सब भगवान् सूर्यको सेवामें तत्पर हो गये और साम्न भी सूर्यदेव एवं मगोंको प्रणामकर आनन्दचित्तसे द्वारका लौट आये। ( अध्याय १३९-१४१)