सूतजी बोले-शौनक ! अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके मध्याह्नकाल आनेपर चाक्षुषान्तर (मन्वन्तर)-में बड़ा भारी झंझावात आया। यहाँतक कि उसके प्रभावसे हिमालय पर्वत भी काँपने लगा। इससे प्रायः सृष्टिके अधिकांश प्राणियोंका विनाश हो गया। सतद्वोपा वसुमती और समुद्र जलमय हो गये। बस उत्तर दिशास्थित लोकालोक पर्वत मात्र शेष रह गया। मुने। मन्वन्तरके लय होनेपर सम्पूर्ण भूमिका लय हो गया। एक हजार वर्षतक पृथ्वी जलके मध्य में स्थित रही। तब भगवान् विष्णुने शंकर तथा ब्रह्माके साथ आकाशमें शिशुमारचक्रको स्थित किया और सभी नक्षत्र मण्डल तथा ग्रहोंको पूर्ववत् यथास्थान स्थित किया। उन ज्योतिशनोंके द्वारा पृथ्वीका जल सूख गया और पृथ्वी भी सुस्थिर हो गयो। एक अबुत वर्ष बीतनेके पश्चात् पृथ्वी स्थलके रूपमें दिखायी दी। तब भगवान् ब्रह्माने अपने मुख से महामनीषी एवं सर्वविद्याविशारद द्विजराज सोमको उत्पन्न किया, दोनों भुजाओंसे महाबलशाली, राजनीतिमें पारङ्गत क्षत्रियराज सूर्यको उत्पन्न किया तथा ऊरु ओसे सरिताओंके पति रजाकर वैश्यराज समुद्रको उत्पन किया एवं पैरोसे कलाविशारद, शास्त्रविहित कम करनेवाले, उत्तम विश्व के रचयिता शूदराज दक्षको उत्पन्न किया सोपसे ब्राह्मणी स्थापियो, सहसे सभी वैश्या और दक्षसे शूद्रोकी उत्तपति हुई। सूर्यमण्डलकसे स्वयं वैवस्वत मनु उत्पन्न हुए। उनका सभी प्राणियोंपर राज्य हुआ। विश्वरुप भगवान् विष्णु पूर्वार्धसे तथा वामन परार्धसे उत्पन्न हुए। सत्ययुगमें जो भगवान् सनातन विष्णु विश्वरुपमें अवतार लेते हैं, वे बालस्वरूपमें रहते हैं। उस समय मनुष्योंकी परम आयु चार सौ वर्ष थी। त्रेतामें युवावस्था- प्राप्त श्रीहरि पूर्वार्धसे अवतरित हुए। इस युगमें मनुष्यकी परम आयु तीन सौ वर्ष थी। द्वापर में वार्धक्यभावप्रास देव श्रीहरि हुए। इस समय मनुष्यकी आयु दो सौ वर्ष थी। कलियुगमें विश्वरूप भगवान् मरणधर्मारूपमें थे और धर्मशील व्यक्तियोंकी परम आयु सौ वर्ष हो गयी।
ब्रह्माके परार्धमें जब वामनका अवतार हुआ, तब वे भगवान् विष्णु महेन्द्र (इन्द्र)-के अनुज वामन बने। वे चार भुजाधारी, श्यामवर्ण एवं गरुड़के ऊपर विराजमान थे। विश्वरूपके हितके लिये ये त्रियुगी बने। सत्ययुगमें वामनके अर्धभागसे साक्षात् त्रियुगीनारायण श्वेतरूप हरि 'हंस' नामसे उत्पन्न हुए । त्रेतामें भगवान् यज्ञ रक्तरूप धारणकर उत्पन्न हुए। द्वापरमें स्वर्णगर्भ हरि पीतवर्ण-रूपमें उत्पन्न हुए। द्वापरयुगकी संध्या में कलियुगके आनेपर विष्णुकी तथा वामनकी सभी कलाओंके एकीभूत होनेपर साक्षात् विष्णु देवकीके गर्भसे वसुदेवके घर मथुरामें उत्पन्न हुए। ब्रह्मा आदिने सनातन ब्रह्मकी स्तुति की। उस समय प्रसन्न हो भगवान्ने देवताओंसे यह कहा-'देवगणो। देवोंके हित और दैत्योंकि विनाशके लिये मैं कलियुगमें उत्पन्न होऊँगा और कलियुगमें भूतलपर स्थित सूक्ष्म रमणीय दिव्य वृन्दावन में रहस्यमय एकान्त-क्रीडा करूंगा। घोर कलियुग में सभी बुतियाँ गोपीके रूपमें आकर रासमण्डलामें मेरे साथ रामकीडा करेगी। कलियुगके अन्ता गधारो प्राधित । इस रहस्यमयी गोडाको समाप्त कर पस्किो रूपम अवतीर्ण होऊँगा*।
सर्वे वेदाः कली घोरे गोपीभूताः समन्तः ।
संस्थो हि मया सार्थ त्याल्या भूमण्डतं तदा ॥
राधया प्रार्थितो वै यदा कलियुगान्तके ।
समाथ्य च रह:क्रीडां कल्की च भावतारम्यहम्॥
(प्रतिसर्गपर्व ४।५।२७-२८)
कलियुगके अन्तमें प्रलयके बाद पुनः सत्ययुगमें सत्यधर्मक रूपमें प्रतिष्ठित होऊँगा।' यह सुनकर देवगण वहीं अन्तर्लीन हो गये।
मुने! इस प्रकार युग-युगमें भगवान् श्रीहरिकी क्रीडाएँ होती रहती हैं। विश्वव्यापक भगवान् के इस रहस्यको विष्णुभक्त ही जानते हैं। विष्णुकी इच्छाके अनुसार ही सनातनी विष्णुमाया विविध लोकोंकी रचना कर महाकाली हो सम्पूर्ण चराचर विश्वको कालकवलित कर महागौरीके रूपमें हो जायेंगी। (अध्याय ५)