सुमन्तु मुनि बोले-राजन्! अपने वित्तके अनुसार मिट्टी, लकड़ी, पत्थर तथा पके हुए ईंटोंसे जो मठ या गृहका निर्माण कर उसे सभी उपकरणोंसे युक्त करके भगवान् सूर्यके लिये समर्पित करता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। माघ माखमें तन्द्रारहित होकर एक भुक्तवत करे और मासके अन्त में एक रथका निर्माण करे जो विचित्र वस्त्रसे सुशोभित चार श्वेत असे अलंकृत, बेल ध्वज, पताका एवं छ चापर दर्पणसे युक हो। उस स्थपर ढाई सेर पायलचे चूर्णसे सूर्य की प्रतिमाका निर्माण कर उसे संज्ञा देवीके साथ रथके पिछले भागमें (जहाँ रथी बैठता है) स्थापित कर शङ्ख, भेरी आदि ध्वनियों के साथ रात्रिमें राजमार्गमें उस रथको घुमाकर क्रमश: धीरे-धीरे सूर्य-मन्दिरमें ले जाय। वहाँ जागरण एवं पूजा करे तथा दीपक एवं दर्पण आदिसे अलंकृत कर रात्रि व्यतीत करे। प्रात: मधु, शीर और घृतसे उस प्रतिमाको स्नान कराकर दीन, अन्ध एवं अनाथोंको अपनी शक्तिके अनुसार भोजन कराकर दक्षिणा दे और संवाहनसे युक्त रथ भगवान् भास्करको निवेदित करे तथा अपने बन्धुओंके साथ भोजन करे।
मन्त्र और धर्मसे समन्वित अपने सभी व्रतों में श्रेष्ठ यह सूर्यरथ प्रत समस्त कामनाओं तथा अर्थकी सिद्धि करनेवाला है। सभी व्रतोंके पुण्य और सभी गजोंके फल इसी व्रतके करनेसे प्राप्त हो जाते हैं। जो भगवान् सूर्यके निमित्त एक सकत्सा गौ दान करता है, वह सप्तद्वीपवती वसुन्धराके दानका फल प्राप्त करता है। (अध्याय १६९-१७०)