[भविष्यपुराणके प्रतिसर्गपर्वके इस चतुर्थ खण्डका इतिहासकी दृष्टिसे विशेष महत्व है। इसमें मुख्यरूपसे सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा विशेषरूपसे कलियुगके चारों चरणोंका इतिहास, राजवंश और युगधर्म निरूपित है। साथ ही अनेक आचार्यों, संतों, भक्त कवियों तथा पुरी, भारती आदि साधुओंके पूर्वजन्मोंका इतिवृत्त भी संगृहीत हुआ है। इन्हें प्रायः द्वादश आदित्यों, एकादश रुद्रो, अष्ट वसुओं तथा अश्विनीद्वयका अवतार बतलाया गया है। चैतन्य महाप्रभुको महिमाका इसमें विशेष निरूपण हुआ है और जगन्नाधजीमें उनके लय होनेकी बात मी आयौ है, साथ ही पूर्वापरके सभी आचार्यों तथा संतोंको उनके भक्तिभावसे विशेष प्रभावित दिखलाया गया है। पर वास्तवर्ने देश- कालको दृष्टिसे कई विसंगतियां दिखलानी पड़ती हैं, जिससे इन अंशोंको मौलिकतापर संदेह होना भी स्वाभाविक है। 'कल्याण' का सभी आचार्यों, संतों, महात्माओं और सम्प्रदायोंके प्रति समान आदरभाव है और समान श्रद्धा है। अत: इन विसंगतियोंपर ध्यान न देकर सत्संगकी दृष्टिसे संत, महात्माओं एवं भक्तोंकी पवित्र कथाओंको यथासम्भव उपलब्ध मूल संस्करणके अनुसार संक्षिप्त भावानुवादके रूपमें यहाँ प्रस्तुत किया गया है-सम्पादक]