भगवान् श्रीकृष्ण बोले-भारत! अब आप सर्वफलत्याग-चतुर्दशीव्रतका माहात्म्य सुनें। यह सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। इस व्रतका नियम मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको अथवा अन्य मासोंकी अष्टमीको ग्रहण करना चाहिये। उस दिन ब्राह्मणोंको पायस-भोजन कराकर दक्षिणा दे। इस व्रतका आरम्भ कर वर्षभर कोई निन्द्य फल-मूल तथा अठारह प्रकारके धान्य* भक्षण न करे। वर्षके अन्तमें चतुर्दशी अथवा अष्टमीके दिन सुवर्णके रुद्र एवं धर्मराजकी प्रतिमा बनाकर दो कलशोंके ऊपर स्थापित कर उनका पूजन करे। सोनेके सोलह कूष्माण्ड और मातुलुङ्ग, बैगन, कटहल, आम्र, आमड़ा, कैथ, कलिंग (तरबूज), ककड़ी, श्रीफल, वट, अश्वत्थ, जम्बीरी नींबू केला, बेर तथा दाडिम (अनार)- ये फल बनवाये। मूली, आँवला, जामुन, कमलगट्टा, करौंदा, गूलर, नारियल, अंगूर, दो बनभंटा, कंकोल, काकमाची, खीरा, करील, कुटज तथा शमी-ये सोलह फल चाँदीके बनवाये और दाल, आगस्त्य, पिड़ार, खजूर, सूरण, कंदक, कटहल, लकुच, खेकसा, इमली, चित्रावल्ली, कूटशाल्मलिका, महुआ, कारवेल्ल, वल्ली तथा गुदपटोलक-ये सोलह फल ताँबेके बनवाये। इन फलोंका व्रतपर्यन्त भक्षण न करे अर्थात् इन फलोंके त्यागंका व्रतमें
ये अठारह वाय-याज्ञवल्क्य स्म ।।२०८ की अपरार्क व्याख्या, व्याकरणमहाभाथ्य पारा४, बावसक संहिता १८६११, दानममुख तथा विधानपारिजात आदिके अनुसार इस प्रकार है- सावाँ, धान, जौ, मूंग, तिल, अणु, (कैगनी), हट्, गेहूँ, कोदो, कुलथी, सवीन (शोरी मटर), सेम, आदकी (अरहर) या मदुष्ट (उजसी मटर), चना, कलाय, मटर, प्रिया (सरसों, राई या गुन) और मसूर । अन्य मामले मयुशदिको जगह अकसी और नीवार प्राद्य है।
संकल्प करे। व्रतकी पूर्णतापर धर्मराज एवं रुद्रकी प्रतिमा तथा स्वर्ण, रौप्य एवं ताम्रसे बनाये गये इन पौंको वेदज्ञ, शान्त, सपत्नीक ब्राह्मणको भगवान् की प्रसन्नताके लिये प्रार्थनापूर्वक दान कर दे। सभी उपकरणोंसहित उत्तम शय्या, भूषण, दक्षिणा भी ब्राह्मणको देकर यथाशक्ति ब्राह्मण- भोजन कराये। स्वयं भी तैल-क्षारवर्जित भोजन करे। यदि सभी फौंको न त्याग सके तो एक ही फलका त्याग करे और सुवर्ण आदिका बनवाकर इसी विधानसे ब्राह्मणको दे। उन फलोंमें जितने परमाणु होते हैं, उतने हजार युग वर्षतक इस व्रतको करनेवाला व्यक्ति रुद्रलोकमें पूजित होता है। स्त्रियोंको भी यह व्रत करना चाहिये। इस व्रतके करनेवालोंको किसी जन्ममें इष्टका वियोग नहीं होता और अन्तमें वह स्वर्गमें निवास करता है। (अध्याय ९८)